Home धर्म हिंदुओं का शक्तिपीठ कैसे बना मुस्लिमों के लिए ‘नानी का मंदिर’, जानें सीमा पार स्थित हिंगलाज माता मंदिर का महत्व

हिंदुओं का शक्तिपीठ कैसे बना मुस्लिमों के लिए ‘नानी का मंदिर’, जानें सीमा पार स्थित हिंगलाज माता मंदिर का महत्व

by Neha Singh 19 August 2026, 4:15 PM IST
19 August 2026, 4:15 PM IST
Hinglaj Mata Mandir_

Hinglaj Mata Mandir: सनातन धर्म केवल भारत की सीमाओं के अंदर सीमित नहीं है. पूरी दुनिया में हिंदू देवी-देवताओं की पूजा की जाती है. पुरातत्वविदों को अक्सर हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां दूसरे देशों में मिलती हैं, तो कहीं पर दूसरे धर्म के लोग भी मंदिरों में पूजा करते हैं. ऐसा ही एक मंदिर है ‘हिंगलाज माता का मंदिर’. यह मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में है. यह मंदिर इतना प्रसिद्ध है कि दुनियाभर से भक्त देवी के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं. हिंगलाज माता के दर्शन करना आसान नहीं है, क्योंकि यह मंदिर बलूचिस्तान के पहाड़ी इलाके में है.

इस मंदिर के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि हिंदू देवी का मंदिर होने के बावजूद वहां के स्थानीय मुस्लिम इसे ‘नानी का मंदिर’ कहते हैं और पूजा करने आते हैं. हाल ही में बलूच नेता मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया पर कहा कि “भक्तों का यहां स्वागत है, आप बिना डर के माता के दर्शन के लिए आए”. इस खबर में आप जानेंगे कि हिंगलाज देवी के शक्तिपीठ के पीछे की पौराणिक कथा क्या है, हिंदुओं के लिए यह कितना महत्वपूर्ण है और यह बलूचों के लिए ‘नानी का मंदिर’ कैसे बना.

स्थानीय नेता ने किया भक्तों का स्वागत

बलूचिस्तान के स्थानीय नेता ने सोशल मीडिया पर हिंगलाज माता मंदिर की वीडियो पोस्ट की और भक्तों का स्वागत करते हुए लिखा ” यह हिंगलाज माता मंदिर है, जिसे बलूच लोग प्यार से नानी का मंदिर कहते हैं. यह एक पवित्र जगह है जहां हर साल लाखों भक्त मां भवानी का आशीर्वाद लेने आते हैं. यहां भक्त बिना किसी डर के अपनी आवाज बुलंद करते हैं: जय श्री राम! जय हिंगलाज माता! वे बलूचिस्तान के हाईवे, सड़कों, रेगिस्तानों और पहाड़ों पर पूरे भरोसे के साथ यात्रा करते हैं, इसलिए नहीं कि वे किसी विदेशी जमीन पर अजनबी हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमारे सम्मानित मेहमान हैं.

बलूचिस्तान पुरानी सभ्यताओं, विविधता और साथ रहने की जमीन है. हम हर धर्म, हर विश्वास और हर समुदाय का सम्मान करते हैं. हमारे दरवाजे उन लोगों के लिए खुले हैं जो शांति, भक्ति और दोस्ती के साथ आते हैं. हिंगलाज माता मंदिर एक पवित्र मंदिर से कहीं ज़्यादा है. यह हमारी साझी सभ्यता, धार्मिक मेलजोल, सहनशीलता और आपसी सम्मान की जीती-जागती निशानी है. हर भक्त, हर तीर्थयात्री और हर विजिटर बिना डरे आएं. विश्वास के साथ आएं. हमारे सम्मानित मेहमान के तौर पर आएं. बलूचिस्तान के लोग आपका खुले दिल से स्वागत करते हैं. हिंगोल माता मंदिर में आपका स्वागत है. हिंगोल में आपका स्वागत है.

मीर यार बलूच की पोस्ट में आने वाले सालों में हिंगलाज माता मंदिर के विस्तार और विकास का भी जिक्र है. इसका मकसद बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों का स्वागत करना है. इसके लिए, इसमें एक बड़ी पार्किंग की जगह, रहने की जगह, एक बाजार, टूरिज़्म से जुड़ी सुविधाएं और जरूरी सेवाएं देने की बात कही गई है. कहा गया है कि इन सुविधाओं से तीर्थयात्री और टूरिस्ट आराम, सम्मान और शांति के साथ अपनी यात्रा पूरी कर पाएंगे.

यहां गिरा था माता का मस्तक

हिंगलाज माता का मंदिर माता सति के 51 शक्तिपीठों में से सबसे पहला शक्तिपीठ माना जाता है. जब देवी सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति ने भव्य यज्ञ करवाया था, तब उन्होंने भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था, इससे देवी सति बहुत क्रोधित हो गई. अपने पति का अपमान न सह पाने के कारण उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्म दाह कर लिया. सती की मृत्यु के बाद क्रोधित भगवान शिव ने उनके पार्थिव शरीर को कंधे पर उठा लिया और तांडव करने लगे. शिव के तांडव से पूरी सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया. संसार की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए. माता सती के अंग धरती पर जहां-जहां गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए.

पौराणिक कथा के अनुसार, बलूचिस्तान की हिंगोल नदी के किनारे दुर्गम पहाड़ियों के बीच माता सती का सिर गिरा था. मस्तक गिरने के बाद वहां की प्राकृतिक गुफा में स्वयंभू शिला यानी माता की पिंडी स्थापित हो गई. इसी पिंडी को हिंगलाज माता का मूल स्वरूप माना जाता है. यहां कोई मानव निर्मित मूर्ति या मंदिर नहीं है. भक्त माता की पिंडी के दर्शन के लिए आते हैं और उसे ही सिंदूर अर्पित करते हैं. देवी को हिंगलाज माता, हिंगलाज देवी, हिंगुला देवी और कोट्टारी या कोटवी के रूप में भी जाना जाता है. भारत के मंदिरों की तरह वहां भी भक्तों को जमावड़ा लगता है. माता की पिंडी के साथ वहां अन्य देवी देवताओं की भी मूर्तियां स्थापित की गई हैं.

भारत में भी समर्पित हैं माता के मंदिर

बलूचिस्तान जाकर हिंगलाज माता के दर्शन करना सभी भक्तों के लिए मुमकिन नहीं होता. ऐसे में वे लोग भारत में स्थित हिंगलाज माता के मंदिर जा सकते हैं. बलूचिस्तान का मंदिर ही मुख्य शक्तिपीठ हैं, लेकिन भारत में भई माता को समर्पित मंदिर हैं. मध्य प्रदेश के अम्बाड़ा में मां हिंगलाज का प्रसिद्ध मंदिर है. माना जाता है कि यहां माता स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं. रायसेन में भी माता का मंदिर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना पाकिस्तान के मूल शक्तिपीठ की जोत से हुई थी. राजधानी दिल्ली के मधु विहार इलाके में उत्तर भारत का मशहूर हिंगलाज माता मंदिर है, जिसका उद्घाटन द्वारका के शंकराचार्य ने किया था. गुजरात और राजस्थान में चारणों, क्षत्रियों और अलग-अलग समुदायों के लोगों ने हिंगलाज माता का मंदिर बनावाया है, क्योंकि उन्हें राजवंशों और जातियों की कुलदेवी माना जाता है.

नानी का मंदिर

मुस्लिम देश में होने के बावजूद माता का यह शक्तिपीठ अभी तक सुरक्षित है. इसका कारण वहां के स्थानीय लोगों का माता के प्रति प्रेम और सम्मान है. भारत के बंटवारे के बाद यह मंदिर सीमा के पार चला गया. तब से स्थानीय बलूच और मुस्लिम समुदाय हिंगलाज माता के मंदिर की रक्षा करते आए हैं. वे माता को आदरपूर्वक ‘बीबी नानी’ कहते है और इस पवित्र मंदिर को ‘नानी का मंदिर’ कहते हैं. इस्लाम के आने से बहुत पहले, पश्चिम और मध्य एशिया में ‘नाना’ नाम की एक प्राचीन मातृ देवी की पूजा की जाती थी. बलूच संस्कृति में हिंगलाज माता को उसी मातृ शक्ति के रूप में माना जाता है. इसलिए माता के मंदिर को नानी का मंदिर कहा जाता है. जैसे मुस्लिम अपनी धार्मिक यात्रा को हज कहते हैं. वैसे जब वे हिंगलाज माता के मंदिर आते हैं तो इसे ‘नानी की हज’ कहते हैं. स्थानीय बलूच लोग और सूफी भी यहां बहुत श्रद्धा से आते हैं और अपने-अपने तरीकों से पूजा करते हैं. वे मंदिर में देवी मां को लाल फूल, इत्र, अगरबत्ती और मन्नत के धागे चढ़ाते हैं. वे गुफा के सामने सिर झुकाते हैं और मुरादें मांगते हैं.

हिंगलाज माता का मेला

भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद भी मंदिर के बचे रहने का श्रेय बलूच लोगों को ही जाता है. वे सालाना मेले के दौरान हिंदू तीर्थयात्रियों को पूरी सुरक्षा देते हैं, लंगर का इंतजाम करते हैं और उन्हें अपने खास मेहमान की तरह मानते हैं. हर साल अप्रैल के महीने में नवरात्रि के दौरान यहां चार दिन का बड़ा सालाना मेला लगता है, जिसमें पाकिस्तान के कोने-कोने से हजारों हिंदू और लोकल सिंधी-बलूच मुसलमान आते हैं.

मंदिर से जुड़े कुछ तथ्य

  • गुफा के मंदिर में एक अखंड ज्योति हमेशा जलती रहती है, जिसके स्रोत की कोई जानकारी नहीं है.
  • मुख्य मंदिर से कुछ दूरी पर एक कीचड़ और मिट्टी का ज्वालामुखी है, जिसे ‘बाबा चंद्रगुप्त भैरव’ कहा जाता है. परंपरा के अनुसार, भक्तों को मुख्य गुफा में जाने से पहले इस ज्वालामुखी पर नारियल और गुलाब की पंखुड़ियां अर्पित करनी होती है और उससे माता के दर्शन की आज्ञा लेनी पड़ती है.
  • मंदिर के पास बहने वाली हिंगोल नदी में स्नान करना उसी तरह पवित्र माना जाता है, जिस तरह भारत में गंगा नदी में स्नान करना माना जाता है.

भारत से कैसे जा सकते हैं भक्त

हिंगलाज माता का मुख्य शक्तिपीठ बलूचिस्तान के लासबेला जिले में हिंगोल नदी के किनारे दुर्गम पहाड़ी गुफा में स्थित है, जो कराची शहर से लगभग 250 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां जाने के लिए भक्तों को पहले कराची शहर जाना पड़ता है. कराची से भक्त कार, टैक्सी या बस से मकरान हाईवे के रास्ते हिंगोल नेशनल पार्क पहुंचते हैं, जिसमें उन्हें 4-5 घंटे लग जाते हैं. पार्क पहुंचने के बाद भक्तों को पहाड़ियों और सूखी नदी के रास्तों से होते हुए गुफा तक पैदल जाना पड़ता है. इसके बाद वे मुख्य गर्भगृह में पहुंचते हैं.

वहीं भारत से जाने वाले भक्तों को कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है. भारतीय नागरिकों को पाकिस्तान हाई कमीशन से तीर्थयात्री वीजा के लिए अप्लाई करना जरूरी है. वीजा आमतौर पर खास भारतीय ऑर्गनाइजेशन/ग्रुप (जैसे कटासराज या हिंगलाज माता तीर्थयात्री ग्रुप) के जरिए ग्रुप एप्लीकेशन से दिए जाते हैं, न कि अकेले यात्री को. वीजा मिलने के बाद भारत से भक्त दुबई या दूसरे खाड़ी देशों के रास्ते कराची के जिन्ना इंटरनेशनल एयरपोर्ट (KHI) के लिए फ्लाइट लेते हैं. कुछ खास ग्रुप अटारी-वाघा बॉर्डर के रास्ते सड़क या ट्रेन से लाहौर में आते हैं और वहां से वे डोमेस्टिक फ्लाइट या ट्रेन से कराची जाते हैं. इसके बाद उन्हें हिंगोल नेशनल पार्क पहुंचकर पैदल यात्रा करनी पड़ती है.

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