Jagannath Temple: ओडिशा के पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर 12 अगस्त को 5 घंटे तक भक्तों के लिए बंद रहेगा. ‘चितलागी अमावस्या’ नाम की एक खास रस्म के कारण बुधवार दोपहर को यहां श्री जगन्नाथ मंदिर भक्तों के लिए पांच घंटे तक बंद रहेगा. श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने कहा कि 12 अगस्त को श्रावण कृष्ण अमावस्या तिथि पर देवताओं की ‘चितलागी नीति’ (रस्म) पूरी की जाएगी. इसलिए पहले भोग मंडप का भोग लगने के बाद दोपहर 2 बजे से शाम 7 बजे तक आम लोगों के दर्शन कुछ समय के लिए बंद रहेंगे.
श्रावण अमावस्या पर महाप्रभु की चितालागी पूजा
इस अवधि के दौरान मुख्य गर्भगृह में महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और देवी सुभद्रा का पवित्र ‘चितालागी नीति’ अनुष्ठान किया जाएगा. इस रस्म के तहत तीनों विग्रहों के ललाट पर रत्नजड़ित स्वर्ण ‘चिता’ (आभूषण) सुशोभित किए जाएंगे. यह आभूषण वार्षिक रथयात्रा और स्नान यात्रा से ठीक पहले मूर्तियों से हटा दिए गए थे, जिन्हें परंपरा के अनुसार पुनः स्थापित किया जा रहा है. हाल ही में जुलाई के महीने में संपन्न हुई भव्य रथयात्रा में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया था, जिसके बाद मंदिर में यह पहला बड़ा अनुष्ठान हो रहा है. प्रशासन ने पुरी आने वाले श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे इस समयावधि को ध्यान में रखकर ही अपने दर्शन की योजना बनाएं. ओडिशा में ‘चितलागी अमावस्या’ को खेती से जुड़े त्योहार के तौर पर भी मनाया जाता है, जिसमें लोग चावल से बना एक खास तरह का केक ‘चितौ पीठा’ बनाते हैं. बाद में किसान इस केक का कुछ हिस्सा खेतों में ले जाते हैं और धान के खेतों में रहने वाले कीड़ों और दूसरे जलीय जीवों में बांटते हैं.
कलयुग के देवता माने जाते हैं महाप्रभु जगन्नाथ
पुराणों में जगन्नाथ धाम की अपार महिमा का वर्णन किया गया है, जिसे पृथ्वी पर ‘वैकुंठ’ (भगवान विष्णु का धाम) भी कहा जाता है. जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ की पूजा उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ की जाती है. मंदिर के भीतर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति दाईं ओर स्थित है, उनकी बहन सुभद्रा की मूर्ति बीच में है और उनके बड़े भाई बलभद्र (बलराम) बाईं ओर विराजमान हैं. महाप्रभु जगन्नाथ (श्री कृष्ण) को कलयुग का देवता भी माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि मंदिर में मौजूद मूर्ति में स्वयं भगवान ब्रह्मा का वास है. जब भगवान श्री कृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया, तो उनमें दैवीय शक्तियां तो थीं, लेकिन उनका भौतिक स्वरूप मनुष्य का ही था. जब धरती पर उनका समय पूरा हुआ, तो उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया और अपने दिव्य धाम लौट गए. पांडवों ने उनका अंतिम संस्कार किया, लेकिन शरीर के दिव्य रूप में विलीन हो जाने के बाद भी उनका हृदय जलता रहा.
राजा इंद्रद्युम्न के सपने में आए थे श्री हरि
पांडवों ने उसे जल में प्रवाहित कर दिया. वहां, वह हृदय एक लट्ठे में बदल गया और बहते हुए ओडिशा के तट पर जा पहुंचा. इसी लट्ठे को राजा इंद्रद्युम्न ने खोजा था. मालवा के राजा इंद्रद्युम्न, जो भगवान विष्णु के भक्त थे, उन्हें सपने में स्वयं श्री हरि के दर्शन हुए. भगवान ने उन्हें बताया कि पुरी के समुद्र तट पर उन्हें एक ‘दारु’ (लकड़ी का लट्ठा) मिलेगा और उससे मूर्ति बनवाने का निर्देश दिया. तट पर पहुंचने पर राजा को वह लट्ठा मिल गया. इसके बाद उनके सामने यह सवाल आया कि मूर्ति बनाने का काम किसे सौंपा जाए. कहा जाता है कि भगवान विष्णु खुद भगवान विश्वकर्मा के साथ एक बूढ़े मूर्तिकार के रूप में प्रकट हुए थे. उस बूढ़े मूर्तिकार ने कहा कि वह एक महीने के अंदर मूर्तियां बना देगा, लेकिन वह यह काम एक बंद कमरे में करेगा.
अधूरे रूप में होती है मूर्तियों की पूजा
मूर्तिकार ने शर्त रखी कि उस महीने के दौरान कोई भी, यहां तक कि राजा भी कमरे के अंदर न तो जाएगा और न ही झांककर देखेगा. महीने का आखिरी दिन था, और कई दिनों से कमरे से कोई आवाज़ नहीं आई थी. उत्सुकता के कारण राजा खुद को रोक नहीं पाए और उन्होंने अंदर झाँका तभी बूढ़े मूर्तिकार ने दरवाज़ा खोला और बाहर आकर बताया कि मूर्तियां अभी अधूरी हैं, उनके हाथ-पैर अभी नहीं बने हैं. राजा को अपनी हरकत पर बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने मूर्तिकार से माफ़ी मांगी. मूर्तिकार ने जवाब दिया कि यह सब ईश्वर की इच्छा से हुआ है और उन मूर्तियों की पूजा उसी अधूरे रूप में की जाएगी. नतीजतन जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की उन्हीं मूर्तियों को मंदिर में स्थापित किया गया. आज भी भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां उसी अधूरी अवस्था में हैं.
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News Source: PTI
