Home Lifestyle अब भी Garden City है भारत की सिलिकॉन वैली, खाने से लेकर घूमने की बेस्ट जगह तक; ये रहा शहर का पूरा ट्रेवल गाइड

अब भी Garden City है भारत की सिलिकॉन वैली, खाने से लेकर घूमने की बेस्ट जगह तक; ये रहा शहर का पूरा ट्रेवल गाइड

by Preeti Pal
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अब भी Garden City है भारत की सिलिकॉन वैली, खाना से लेकर घूमने की बेस्ट जगह तक;

Introduction

21 February, 2026

Garden City of India: आज जब हम बेंगलुरु का नाम सुनते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले ट्रैफिक जाम, ऊंची बिल्डिंग और आईटी कंपनियों के ऑफिस आते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शोर-शराबे के नीचे आज भी हरा-भरा दिल धड़कता है? वैसे भी, बेंगलुरु एक ऐसा शहर है जो अपनी रफ्तार, ट्रैफिक और अपनी ऊंची-ऊंची कांच की बिल्डिंग्स के लिए जाना जाता है. इस शहर को भारत की सिलिकॉन वैली भी कहा जाता है. यहां की हर गली में एक नया स्टार्टअप पैदा होता है और हर मोड़ पर एक टेक कंपनी का दफ्तर है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस कंक्रीट के जंगल और खूब जला देने वाले ट्रैफिक के नीचे आज भी एक ऐसा शहर धड़कता है, जिसे कभी ‘गार्डन सिटी ऑफ इंडिया’ यानी भारत का बगीचों वाला शहर कहा जाता था? दरअसल, आज जब हम बेंगलुरु की बात करते हैं, तो अक्सर पॉल्यूशन और सड़कों पर रेंगती गाड़ियों की ही बात होती है. पर अगर आप थोड़ा गहराई में उतरेंगे, तो आपको अहसास होगा कि बेंगलुरु ने अपनी हरियाली की विरासत को आज तक बचाए रखा है. ऐसे में आज के इस सफर में हम आपको बेंगलुरु के उस पहलू से रूबरू कराएंगे, जो इसे देश के बाकी बड़े शहरों से अलग और बहुत खास बनाता है.

Table of Content

  • क्यों कहते हैं ‘गार्डन सिटी’?
  • महाराजाओं का योगदान
  • आज की हकीकत
  • बेंगलुरु कैसे पहुंचें?
  • ये जरूर देखें
  • कब्बन पार्क
  • क्या-क्या है जरूरी?
  • फूड लवर्स के लिए जन्नत
  • बेंगलुरु के पास घूमने की जगहें
  • शॉपिंग का मज़ा
  • एमजी रोड

क्यों कहते हैं ‘गार्डन सिटी’?

बेंगलुरु को ‘गार्डन सिटी’ का खिताब किसी मार्केटिंग कंपनी ने नहीं दिया, बल्कि ये नाम इसकी रगों में बसा है. वैसे भी, इस शहर की हरियाली की कहानी सदियों पुरानी है. इसकी शुरुआत 1760 में मैसूर के शासक हैदर अली ने की थी. उन्होंने ‘लालबाग बॉटनिकल गार्डन’ की नींव रखी, जिसे उस टाइम ‘लाल बाग’ कहा जाता था. उनके बेटे, सुल्तान टीपू ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और फारस, फ्रांस और अफगानिस्तान जैसे देशों से पौधों की रेयर प्रजातियां मंगवाकर इसे एक साइंटिफिक रिसर्च सेंटर बना दिया.

महाराजाओं का योगदान

हालांकि, ‘गार्डन सिटी’ का नाम असल में 20वीं सदी की शुरुआत में मैसूर के 24वें महाराजा, कृष्ण राजा वाडियार IV के टाइम में फाइनल हुआ. उन्होंने बेंगलुरु को पार्कों, झीलों और पेड़ों से सजी चौड़ी सड़कों से भर दिया. बेंगलुरु की 920 मीटर की ऊंचाई और यहां के क्लाइमेट ने इस हरियाली को पनपने में पूरी मदद की.

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आज की हकीकत

बेशक, आज बेंगलुरु में आईटी की वजह से कंक्रीट बढ़ गया है, झीलें उतनी साफ नहीं रहीं और सड़कें चौड़ी करने के लिए पेड़ काटे गए हैं. मगर ‘कर्नाटक पार्क संरक्षण अधिनियम, 1975’ की बदौलत आज भी लालबाग और कब्बन पार्क जैसे बड़े इलाकों को सुरक्षित रखा जाता है. आज भी जेपी नगर और जयनगर जैसे इलाकों में आपको पुराने बेंगलुरु की वही शांत हरियाली देखने को मिल जाएगी.

बेंगलुरु कैसे पहुंचें?

बेंगलुरु देश और दुनिया से बेहतरीन तरीके से जुड़ा हुआ है. यही वजह है कि अगर आप वहां जाना चाहते हैं, तो आसानी से पहुंच सकते हैं. यानी अगर आप फ्लाइट से जाना चाहते हैं, तो केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट मेन शहर से करीब 40 किमी दूर है. यहां से आप एयरपोर्ट टैक्सी ले सकते हैं. बस का किराया करीब 150-250 रुपये होता है, जबकि टैक्सी 800-1200 रुपये तक चार्ज करती है. वहीं, अगर आप ट्रेंन से जा रहे हैं, तो बेंगलुरु में चार बड़े रेलवे स्टेशन हैं. इनमें से क्रांतिवीर संगोल्ली रायन्ना और यशवंतपुर जंक्शन सबसे बिज़ी रहते हैं. ये स्टेशन दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों से सीधे जुड़े हुए हैं. इसके अलावा अगर आप रोड ट्रिप के शौकीन हैं, तो चेन्नई, हैदराबाद या मैसूर से नेशनल हाईवे के जरिए बेंगलुरु पहुंचना एक बढ़िया एक्सपीरियंस रहेगा.

ये जरूर देखें

बेंगलुरु जाकर आप लालबाग बॉटनिकल गार्डन देखना बिल्कुल ना भूलें. 240 एकड़ में फैला ये गार्डन नेचर लवर्स के लिए स्वर्ग है. यहां पौधों की 1,800 से ज्यादा प्रजातियां हैं. यहां का ‘ग्लास हाउस’ जरूर देखें, जो लंदन के क्रिस्टल पैलेस जैसा लगता है. जनवरी और अगस्त में यहां होने वाले फ्लॉवर शो में करोड़ों फूलों से आर्ट इफेक्ट्स बनाए जाते हैं. साथ ही सदियों पुरानी ‘लालबाग रॉक’ पर चढ़कर शहर का नजारा लेना न भूलें.

कब्बन पार्क

शहर के बिल्कुल बीचों-बीच कब्बन पार्क 300 एकड़ में फैला है, जिससे होने से शहर में रहने वाले करोड़ों लोग साफ हवा में सांस ले पाते हैं. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि, कब्बन पार्क में 6,000 से ज्यादा पेड़ हैं. यहां के बांस के झुरमुट और खिलते हुए गुलमोहर के पेड़ फोटोग्राफी के लिए बेस्ट हैं. पार्क के अंदर ही कर्नाटक हाई कोर्ट और स्टेट सेंट्रल लाइब्रेरी जैसी ऐतिहासिक इमारतें भी मौजूद हैं. बच्चों के लिए यहां जवाहर बाल भवन और टॉय ट्रेन का मजा भी है.

क्या-क्या है जरूरी?

अगर आप बेंगलुरु में हैं, तो ये चीजें आपकी चेकलिस्ट में होनी ही चाहिए. जैसे बेंगलुरु पैलेस की सैर. साल 1887 में बना ये महल इंग्लैंड के विंडसर कैसल की याद दिलाता है. इसका आर्किटेक्चर, लकड़ी की नक्काशी और वहां की पुरानी पेंटिंग्स आपको राजा-महाराजाओं के दौर में ले जाएंगे. इसके अलावा वहां आप ब्रेवरी कल्चर का आनंद लेना ना भूलें. वैसे, बेंगलुरु को पब कैपिटल भी कहा जाता है. यहां 50 से ज्यादा माइक्रोब्रूअरी हैं. ये शहर अपनी क्राफ्ट बीयर के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं. साथ ही इस शहर से 25 किमी दूर बन्नेरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क भी है जो, वाइल्डलाइफ लवर्स के लिए बेस्ट है. यहां आप सफारी का आनंद ले सकते हैं और बटरफ्लाई पार्क भी देख सकते हैं.

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फूड लवर्स के लिए जन्नत

बेंगलुरु के खाने में उतनी ही वैरायटी है जितना यहां के लोग. अगर आपको असली फिल्टर कॉफी और इडली का स्वाद लेना है, तो MTR जाएं. साल 1924 से चल रहा ये रेस्टोरेंट एक संस्था बन चुका है. इसके अलावा, गांधी बाजार का विद्यार्थी भवन अपने मसाला डोसा के लिए मशहूर है. यहां डोसा परोसने का स्टाइल भी देखने लायक है. मल्लेश्वरम के CTR का मसाला डोसा इतना क्रिस्पी होता है कि आप अपनी उंगलियां चाटते रह जाएंगे. कुल मिलाकर आपको बेंगलुरु में तरह-तरह के डोसा, इडली और यहां तक कि मसाला मूंगफली का चटपटा स्वाद भी मिलेगा. साथ ही अगर आपको पुराने जमाने के कैफे पसंद हैं, तो सेंट मार्क्स रोड पर कोशीज़ जाएं. यहां कभी पंडित नेहरू और महारानी एलिजाबेथ भी आए थे.

बेंगलुरु के पास घूमने की जगहें

अगर आपके पास एक-दो दिन का टाइम एक्स्ट्रा है, तो आप बेंगलुरु के आस-पास की जगहों पर भी जा सकते हैं. जैसे नंदी हिल्स जो शहर से लगभग 60 किमी दूर है. सन राइज़ देखने के लिए ये बेंगलुरु के लोगों की फेवरेट जगह है. वहीं, बेंगलुरु से 145 किमी. दूर मैसूर अपनी ग्रेंड और मैसूर पैलेस के लिए मशहूर, यहां आप 3 घंटे में पहुंच सकते हैं. 250 किलो मीट की दूरी पर खूबसूरत कूर्ग भी है. अगर आपको कॉफी के बागान और धुंध वाली पहाड़ियां पसंद हैं, तो कूर्ग एक परफेक्ट वीकेंड गेटवे है.

शॉपिंग का मज़ा

अब आपको लेकर चलते हैं बेंगलुरु की उन गलियों में जहां शॉपिंग का मतलब सिर्फ सामान खरीदना नहीं, बल्कि एक थेरेपी है. साथ ही, उन ठिकानों के बारे में भी बताएंगे जहां रुककर आप इस शहर की असली वाइब महसूस कर सकते हैं. वैसे, बेंगलुरु में हर बजट और हर स्टाइल के लिए एक अलग मार्केट है. यानी यहां की गलियों में घूमना किसी एडवेंचर से कम नहीं है.
अगर आप बार्गेनिंग करने में उस्ताद हैं, तो कमर्शियल स्ट्रीट आपके लिए जन्नत है. यहां के छोटे रास्तों में आपको ट्रेंडी कपड़े, आर्टिफिशियल जूलरी और फुटवियर का ऐसा कलेक्शन मिलेगा कि आप दंग रह जाएंगे. वैसे, इस मार्केट की तंग गलियों में डिस्काउंटेड ब्रांडेड कपड़े भी मिल जाते हैं, बस ढूंढने वाली नज़र चाहिए.

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एमजी रोड

ब्रिगेड रोड और एमजी रोड बेंगलुरु का दिल है. यहां आपको बड़े इंटरनेशनल ब्रांड्स के शोरूम्स मिलेंगे. यहां की रौनक शाम के वक्त देखने लायक होती है. अगर आप किताबों के शौकीन हैं, तो यहाँ का ‘ब्लॉसम बुक हाउस’ देखना न भूलें. ये किताबों का एक ऐसा समंदर है जहां आप खो भी सकते हैं. इसके अलावा यहां की चिकपेट और केआर मार्केट भी मस्त है. अगर आपको सिल्क की साड़ियां या थोक के भाव में कपड़े चाहिए, तो चिकपेट से बेहतर कुछ नहीं. वहीं पास में केआर मार्केट भी है, जिसे सिटी मार्केट भी कहते हैं. ये बाज़ार सुबह 4 बजे फूलों की खुशबू से महक उठता है. फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए ये एक विजुअल ट्रीट है. इसके अलावा अगर आपको अपनी जेब ढीली करने का मन है और लग्जरी का शौक है, तो विट्ठल माल्या रोड पर यूबी सिटी जाइए. यहां लुई विटॉन और रोलेक्स जैसे बड़े इंटरनेशनल लग्ज़री ब्रांड्स के साथ-साथ शानदार डाइनिंग का एक्सपीरियंस भी मिलता है.

Conclusion

बेंगलुरु भले ही बदल रहा हो, कंक्रीट की परतें चढ़ रही हों, लेकिन इस शहर की आत्मा आज भी इसके पार्कों, इसके पुराने पेड़ों और ताजा हवा में बसती है. ये शहर आपको सिखाता है कि कैसे मॉर्डन और नेचर एक साथ रह सकते हैं. तो अगली बार जब आप बेंगलुरु आएं, तो सिर्फ इसके मॉल या पब्स तक सीमित न रहें. बल्कि सुबह जल्दी उठकर कब्बन पार्क की ओस भरी घास पर टहलें, लालबाग के फूलों की महक लें. इसके अलावा यहां की फेमस फिल्टर कॉफी पीना बिल्कुल मत भूलना. तब जाकर आपको पता चलेगा कि बेंगलुरु को ‘गार्डन सिटी’ क्यों कहा जाता है.

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