Home Top News ‘मेरे साथ चलो, लेने आया हूं’, मलबे में पोते को ढूंढता रहा दादा; ईरानी स्कूल हमले की दर्दनाक कहानी

‘मेरे साथ चलो, लेने आया हूं’, मलबे में पोते को ढूंढता रहा दादा; ईरानी स्कूल हमले की दर्दनाक कहानी

by Sachin Kumar 9 September 2026, 9:42 PM IST (Updated 9 September 2026, 9:43 PM IST)
9 September 2026, 9:42 PM IST (Updated 9 September 2026, 9:43 PM IST)
Families Iranian school US strike killed children

Middle East Tension: 28 फरवरी के हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव अभी भी बना हुआ है. फिलहाल किसी बड़े हमले की खबर सामने नहीं आई है, लेकिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर स्थिति लगातार गरमाती जा रही है. एक ओर अमेरिका इसे स्वतंत्र समुद्री मार्ग के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान यहां से गुजरने वाले जहाजों पर टैरिफ लगाने की बात कह रहा है. ऐसे में दोनों देशों के बीच जारी तनाव के प्रमुख मुद्दों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भी शामिल हो गया है. इसी बीच ईरान से एक बेहद मार्मिक कहानी सामने आई है. जब इजरायल और अमेरिका ने पहली बार ईरान पर हमला किया था, उस दौरान एक मिसाइल ईरान के एक स्कूल पर जा गिरी थी. इस हमले में 168 लोगों की जान चली गई थी. घटना के बाद दुनियाभर के लोगों ने हमले की कड़ी निंदा की थी. दक्षिणी ईरान के एक शहर में सूरज डूब रहा था और हैदर सादेघी अपने पोते के स्कूल के मलबे के पास एक बेंच पर बैठे थे. वह लगभग हर शाम इसी जगह पर बैठते थे. उनका चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था. मलबे के चारों ओर लगे एक बैनर पर उन बच्चों और शिक्षकों की तस्वीरें लगी थीं, जिनकी 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ युद्ध के पहले दिन हुए अमेरिकी हवाई हमले में मौत हो गई थी. इनमें सादेघी का 11 वर्षीय पोता हामी और उसकी मां नेडा सालेहीज़ादेह भी शामिल थीं.

स्कूल अब मृतकों की यादों को संजोने के लिए रह गया

हैदर सादेघी ने कहा कि मैंने बच्चों के शवों में उन्हें ढूंढा, यह सोचकर कि शायद उनमें से कोई एक मिल जाए. रोते हुए उन्होंने बताया कि मैंने उनके नाम पुकारे और कहा कि मेरे साथ चलो! मैं तुम्हें लेने आया हूं. वे वहां नहीं थे. शजरेह तय्यबेह स्कूल अब दुख से जूझने और मृतकों की यादों को संजोने की जगह बन गया है. यहां रिश्तेदार उस बात को समझने की कोशिश करते हैं जिसे समझना नामुमकिन है. कैसे उनके बच्चों को कुछ ही देर पहले क्लास के लिए छोड़ा गया था, अचानक खत्म हो गए. वहीं, एसोसिएटेड प्रेस की जांच के अनुसार उस सुबह मिनाब में स्कूल पर कम से कम एक अमेरिकी मिसाइल गिरी थी, लेकिन घटना के बारे में कोई अंतिम जानकारी नहीं मिली. ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा है कि हमले में 168 लोग मारे गए, जिनमें से ज्यादातर बच्चे थे. ट्रंप प्रशासन ने अभी तक सीधे तौर पर जिम्मेदारी स्वीकार नहीं किया है और न ही बमबारी की पेंटागन जांच के नतीजे जारी किए हैं.

Families Iranian school US strike killed children

ट्रंप की वजह से स्कूल की घंटी पहले बज गई

सादेघी के लिए हमले वाला दिन भी स्कूल के आम दिनों की तरह ही शुरू हुआ. उन्होंने हामी और उसकी 9 साल की बहन नीला को उनकी मां के साथ स्कूल पहुंचाया था. हमेशा की तरह उन्होंने दोपहर 1 बजे उन्हें वापस लाने का प्लान बनाया था. सादेघी ने कहा कि ट्रंप की वजह से घंटी समय से पहले ही बज गई. सादेघी ने आगे कहा कि हामी पांचवीं क्लास में पढ़ता था. उसे फ़ुटबॉल खेलना और साइकिल चलाना पसंद था. धमाके में उसका शरीर इतना बुरी तरह कुचल गया था कि उसकी पहचान सिर्फ उसके पहने हुए कपड़ों से ही हो पाई. साथ ही नीला को मलबे से ज़िंदा बाहर निकाला गया. सादेघी ने कहा कि भगवान का शुक्र है कि वह शारीरिक रूप से ठीक है, लेकिन मानसिक रूप से नहीं. वह बच्ची और उसके पिता अब सादेघी और उनकी पत्नी के साथ रहने लगे हैं. जरा सी भी अचानक होने वाली आवाज से वह डर जाती है. वह अक्सर अपनी दादी की गोद में सोती है, लेकिन रात का ज़्यादातर समय जागते हुए बिताती है. सादेघी ने बताया कि वह अक्सर नीला के दोस्तों को रात बिताने के लिए बुलाते हैं, ताकि उनके साथ रहने से उसका ध्यान बंट सके. वह नीला को मुस्कुराते हुए देखना चाहते हैं. इसलिए वह उससे दूर स्कूल में आकर अपना दुख जाहिर करते हैं. उन्होंने कहा कि मैं यहां आकर रोता हूं. फिर घर जाकर उस बच्ची के सामने नाचता हूं.

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युद्ध संग्रहालय में बदल दिया जाएगा स्कूल

इस स्कूल की ऊपरी मंजिल पर लड़कियों का स्कूल था और निचली मंजिल पर लड़कों का स्कूल और फिर प्री-स्कूल था. कुछ छात्र स्कूल के बगल में बने रिवोल्यूशनरी गार्ड बेस के अधिकारियों के बच्चे थे. कई छात्र मिनाब के स्थानीय बच्चे थे, जहां मुख्य रूप से ईरान के बलूच जातीय अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते हैं. वहां लगे बैनर पर मारे गए 120 छात्रों में 47 लड़कियां और 73 लड़के शामिल थे, जबकि 26 शिक्षकों व कर्मचारियों की भी मौत हो गई थी. तीन और बच्चों के मारे जाने की आशंका है, लेकिन उनके शव अभी तक नहीं मिले हैं. होरमोज़गन प्रांत में मिनाब नाम की जगह हैं और यहां के गवर्नर ने बताया कि क्षतिग्रस्त इमारत को सुरक्षित रखा जाएगा. उसे एक स्मारक और युद्ध संग्रहालय में बदल दिया जाएगा. आपको बताते चलें कि सोमवार की शाम वहां आए कई दर्जन लोगों में मृतकों के रिश्तेदार तो थे. साथ ही शहर के बाहर से आए लोग भी थे जो इसे देखने आए थे. हर शाम आयोजित होने वाले सरकारी शोक समारोह में पुरुषों और महिलाओं ने बारी-बारी से माइक्रोफ़ोन पर आकर मारे गए लोगों के बारे में दिल दहला देने वाली कहानियां सुनाईं और हमले वाले दिन का विस्तार से वर्णन किया. कुछ लोग उनकी बातें सुनकर रो पड़े. मिनाब के कब्रिस्तान में स्कूल में मारे गए लोगों के लिए एक अलग हिस्सा भी तय किया गया है. हर कब्र पर मृतक की तस्वीर लगी है, ऊपर शेड है और चारों ओर कृत्रिम घास बिछी है. कुछ लोग कब्रों पर फूल और प्रार्थना की मालाएं चढ़ाते हैं.

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नेयेस्तानी की कब्र के पास बैठी

कब्रिस्तान में फ़ातेमेह बरानी अपनी बेटी नसीम नेयेस्तानी की कब्र के पास बैठी थीं. बरानी अपनी बेटी के पास रहने के लिए हफ्ते में कई बार आती हैं. वह अपनी बेटी के आखिरी पलों के बारे में सोचती हैं, जिनके बारे में स्कूल के स्टाफ ने उन्हें बाद में बताया था. बता दें कि सुबह करीब 9 बजे राजधानी तेहरान में हवाई हमलों की खबर आई, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता के परिसर को निशाना बनाया गया था. उन्हें उस समय पता नहीं था, लेकिन इजरायल के उन शुरुआती हमलों में अयातुल्ला अली खामेनेई और सेना के कई बड़े अधिकारी मारे गए थे. बरानी ने बताया कि स्टाफ के अन्य लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, नेयेस्तानी को और बड़े हमलों का डर था. यही वजह है कि उन्होंने प्रिंसिपल से क्लास रद्द करने और माता-पिता को बच्चों को ले जाने के लिए बुलाने का आग्रह किया. प्रिंसिपल को यह जरूरी नहीं लगा. लेकिन बरानी ने कहा कि नेयेस्तानी ने खुद अपने 22 छात्रों के माता-पिता को फोन करना शुरू कर दिया और उनसे बच्चों को ले जाने के लिए कहा. बरानी ने बताया कि हमले से पहले नेयेस्तानी के 14 बच्चों को उनके माता-पिता ले गए थे. बाकी आठ बच्चों के माता-पिता समय पर नहीं पहुंच पाए. उनकी मां ने बताया कि नेयेस्तानी उन आठ बच्चों को स्कूल के मैदान में ले गईं. लेकिन प्रिंसिपल ने उन्हें बच्चों को स्कूल के प्रार्थना कक्ष में ले जाने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें लगा कि वह जगह सुरक्षित होगी.

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मेरी बेटी का क्लासरूम सुरक्षित रहा

बरानी ने बताया कि उनकी बेटी और उनके साथ मौजूद सभी आठ बच्चे मारे गए. उन्होंने कहा कि मेरी बेटी का क्लासरूम सुरक्षित रहा. शायद अगर वह उस क्लासरूम में होती, तो उसकी जान नहीं जाती. बरानी की बातों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी, लेकिन ये अन्य लोगों की बातों से मेल खाती हैं. वहीं, AP की जांच में पाया गया कि ईरान सरकार द्वारा सुबह 10:15 बजे देश भर में स्कूल बंद करने का आदेश देने से पहले कई टीचरों ने माता-पिता को बच्चों को ले जाने के लिए फोन किया था. पहला मिसाइल हमला स्कूल पर लगभग एक घंटे बाद हुआ. इस दौरान तीन मिसाइलों से हमला किया गया था. मारे गए लोगों में लड़कों और लड़कियों के स्कूलों के प्रिंसिपल भी शामिल थे. हमलों के बाद बरानी के पति और बेटे स्कूल गए. इसके बाद उन्होंने उसे बताया कि उसकी बेटी मारी गई है. उन्हें नेयेस्तानी का बैग मिला. बरानी ने कहा कि उसके बेटों ने उसे वह बैग नहीं दिखाया क्योंकि उन्हें डर था कि उसे देखकर उसे और ज्यादा दुख होगा. जिन छात्रों को नेयेस्तानी ने बुलाया था और जो स्कूल से बचकर निकल आए थे. उनके माता-पिता परिवार से मिलकर दुख बांटने आए थे, लेकिन बरानी ने कहा कि वह इतने गहरे दुख में डूबी हुई थी कि उसे उनमें से किसी का भी आना याद नहीं है. उसने बताया कि वह अब तक अपनी बेटी के बेडरूम में नहीं जा पाई है.

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