Gandhi Jayanti: 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती. इस दिन देशभर में महात्मा गांधी को याद किया जाता है. कहीं प्रार्थना सभा होती है, कहीं स्वच्छता अभियान, तो कहीं बापू के विचारों पर चर्चा. लेकिन सिनेमा ने भी गांधी और उनकी विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ फिल्मों ने उनकी पूरी जिंदगी को पर्दे पर उतारा, तो कुछ ने उनकी सोच को आज के दौर से जोड़कर एक नया अंदाज दिया.
यही वजह है कि गांधी जयंती के मौके पर ऐसी ही 6 फिल्मों को याद करना अच्छा रहेगा, जो अलग-अलग नजरिए से महात्मा गांधी की विरासत को दिखाती हैं.
गांधी
रिचर्ड एटनबरो की साल 1982 में रिलीज हुई ‘गांधी’ महात्मा गांधी की जिंदगी पर बनी सबसे फेमस फिल्मों में से एक है. फिल्म में बेन किंग्सले ने गांधी का किरदार निभाया था. उनके काम की दुनियाभर में खूब तारीफ हुई. फिल्म गांधी के साउथ अफ्रीका के दिनों से लेकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तक के सफर को दिखाती है. सत्य, अहिंसा और आम लोगों को साथ लेकर चलने की उनकी ताकत को फिल्म ने बड़े शानदार तरीके से दिखाया है.
द मेकिंग ऑफ द महात्मा
श्याम बेनेगल के डायरेक्शन में बनी फिल्म ‘द मेकिंग ऑफ द महात्मा’ साल 1996 में रिलीज हुई थी. ये उस दौर पर फोकस करती है, जब मोहनदास करमचंद गांधी धीरे-धीरे महात्मा गांधी बनने की राह पर थे. इसमें रजित कपूर ने गांधी की भूमिका निभाई है. फिल्म साउथ अफ्रीका में बिताए उनके लगभग 21 सालों के सफर को दिखाती है. यहीं गांधी ने नस्लभेद, अन्याय और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के साथ अपने विचारों को मजबूत किया.
हे राम
कमल हासन की ‘हे राम’ साल 2000 में रिलीज हुई थी. फिल्म की कहानी सीधे गांधी की बायोपिक नहीं है, बल्कि महात्मा गांधी के मर्डर और उस दौर की राजनीति पर है. कमल हासन, शाहरुख खान और रानी मुखर्जी जैसे कलाकारों से सजी ये फिल्म दिखाती है कि नफरत और हिंसा इंसान को किस तरह बदल सकती है. कहानी में गांधी की विचारधारा का असर भी दिखती है.
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मैंने गांधी को नहीं मारा
साल 2005 में रिलीज हुई ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ गांधी की नॉर्मल बायोपिक नहीं है. ये फिल्म गांधी के विचारों को एक अलग नजरिए से सामने रखती है. अनुपम खेर, उर्मिला मातोंडकर, रजित कपूर, बोमन ईरानी और वहीदा रहमान जैसे कलाकारों वाली ये फिल्म सवाल उठाती है कि गांधी की हत्या सिर्फ इतिहास की घटना थी.
लगे रहो मुन्ना भाई
अगर गांधी की विचारधारा को आज के जमाने में सबसे मजेदार और सिंपल अंदाज में किसी फिल्म ने पहुंचाया, तो वो है ‘लगे रहो मुन्ना भाई’. राजकुमार हिरानी के डायरेक्शन में बनी ये फिल्म साल 2006 में आई थी. इस फिल्म ने ‘गांधीगिरी’ शब्द को आम लोगों की बातचीत का हिस्सा बना दिया. संजय दत्त का मुन्ना भाई और अरशद वारसी का सर्किट लोगों को हंसाते हुए सत्य और अहिंसा का मतलब समझाते हैं.
गांधी, माई फादर
फेरोज अब्बास खान की ‘गांधी, माई फादर’ गांधी की जिंदगी को एक अलग नजरिए से दिखाती है. फिल्म राष्ट्रपिता की इमेज से आगे बढ़कर उनकी पर्सनल लाइफ और बेटे हरिलाल गांधी के साथ उनके रिश्ते पर फोकस करती है. फिल्म ये सवाल सामने रखती है कि जिस इंसान को पूरी दुनिया अपना नेता मानती थी, वो अपने परिवार और खासकर अपने बेटे की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है?
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