Alpha Movie Review: धमाकेदार एक्शन, करोड़ों का बजट, स्टार्स की फौज, लेकिन कहानी ऐसी कि इंटरवल के बाद ऑडियन्स भी मिशन छोड़ने का मन बना लें. ‘अल्फा’ में स्पाई यूनिवर्स तो है, मगर थ्रिल कहीं रास्ते में ही गायब हो गया है. अब किसके पास इतना टाइम है कि उसे ढूंढ़ता फिरे. खैर, यशराज फिल्म्स का स्पाई यूनिवर्स अब उस रिश्तेदार की तरह हो गया है, जो हर शादी में नए कपड़े पहनकर आता है, लेकिन हर बार वही पुरानी बातें सुनाता है. ‘अल्फा’ भी इसी बीमारी का ताजा शिकार है. बड़े-बड़े सेट, विदेशी लोकेशन, हेलिकॉप्टर, बंदूकें, धमाके और स्टार्स की पूरी बारात, सब कुछ मौजूद है. बस एक छोटी-सी चीज नहीं है और वो है ढंग की कहानी. वैसे भी, अगर बॉलीवुड में किसी चीज का सबसे ज्यादा रीमेक हुआ है तो वो है पुराना फॉर्मूला, नया पोस्टर और YRF स्पाई यूनिवर्स ने इस आर्ट में अब पीएचडी कर ली है. पहले पठान, फिर टाइगर, फिर वॉर, फिर क्रॉसओवर, फिर कैमियो, फिर हेलिकॉप्टर, फिर पाकिस्तान, फिर देशभक्ति और अब ‘अल्फा’.
फर्क बस इतना
बस फर्क इतना है कि इस बार बंदूकें लड़कियों के हाथ में हैं. यानी ऋतिक रोशन, टाइगर श्रॉफ, सलमान खान जैसे स्टार्स की जगह इस बार यशराज के स्पाई यूनिवर्स ने महिला शक्ति को प्रणाम किया है. लेकिन अफसोस, कहानी अभी भी पुराने गोदाम में बंद पड़ी है. वैसे, ‘अल्फा’ को बड़े गर्व के साथ यशराज स्पाई यूनिवर्स की पहली फीमेल-लीड स्पाई फिल्म बताया गया था. फिल्म की अनाउंसमेंट के टाइम सबको लगा था कि, शायद इस बार फ्रेंचाइजी कुछ तो नया करेगी. लेकिन दो घंटे बाद फील होता है कि ये तो सिर्नफ या सिर्फ पोस्टर था, बाकी फिल्म तो कट कॉपी पेस्ट ही है.

बकवास स्क्रिप्ट
‘अल्फा’ के डायरेक्टर शिव रवैल ने फिल्म को इतना चमकाया है कि स्क्रीन पर हर फ्रेम महंगा दिखता है. अफसोस, स्क्रिप्ट शायद बजट मीटिंग में शामिल ही नहीं हो पाई. ऐसा लगता है जैसे राइटर से कहा गया हो, भाई, कहानी की चिंता मत करो, पहले पांच हेलिकॉप्टर और सात ब्लास्ट बुक कर लो. वैसे शिव रवैल इससे पहले ‘द रेलवे मेन’ जैसे शानदार वेब सीरीज डायरेक्ट कर चुके हैं. ये भी एक वजह थी ‘अल्फा’ से हाई उम्मीद की.
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कहानी की शुरुआत
फिल्म की शुरुआत एक दिलचस्प और बड़े आइडिया के साथ होती है. कर्नल फतेह सिंह उर्फ बॉबी देओल, जेनेटिकली मॉडिफाइड सुपर सोल्जर्स बनाने का सीक्रेट प्रोजेक्ट ‘अल्फा’ शुरू करते हैं. रॉ चीफ विक्रांत कौल उर्फ अनिल कपूर इस मिशन को मंजूरी देते हैं. लेकिन ये एक्सपेरिमेंट ऐसा उल्टा पड़ता है कि फतेह सिंह को पूरा मिशन ही बंद करना पड़ता है. इसके बाद कहानी सालों बाद सीता यानी आलिया भट्ट तक पहुंचती है, जो खुद इस एक्सपेरिमेंट का हिस्सा रही है. सीता को बचपन से सिर्फ एक ही बात सिखाई गई है, मारो, लेकिन कभी सवाल मत करो. उसे यकीन है कि वो चुन-चुनकर देशद्रोहियों का सफाया कर रही है. लेकिन जब धीरे-धीरे उसके सामने सच आता है, तो सीता की पूरी दुनिया ही बदल जाती है.
कहानी में नहीं दम
‘अल्फा’ की ये कहानी दमदार लगती है. लेकिन यशराज फ्लिम्स की ये स्पाई यूनिवर्स फ्रैंचाइजी इस कहानी को ऐसे ट्रीट करती है जैसे किसी बच्चे को जल्दी होमवर्क खत्म करके मोबाइल गेम खेलना हो. इमोशनल लेयर्स खोलने की बजाय फिल्म हर दस मिनट में नया एक्शन सीन परोस देती है. इसका नतीजा ये होता है कि ऑडियन्स कहानी से जुड़ने की कोशिश करती है और फिल्म कहती है- ‘रुको ज़रा सबर करो, पहले एक और धमाका देख लो.’ सबसे मजेदार बात तो ये है कि फिल्म ‘अल्फा’ अपने आपको स्पाई थ्रिलर कहती है, लेकिन कई जगह सुपरहीरो फिल्म बनने की भी पूरी कोशिश करती है. इसके अलावा फिल्म में गोलियां तो ऐसे मिस होती हैं जैसे विलेन ने शूटिंग से पहले अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली हो. वो बिना देखे ही अंधाधुंध गोलिया बरसा रहा है. साथ ही फिल्म के कैरेक्टर्स ऐसी ऊंचाइयों से गिरते-पड़ते हैं कि, ग्रैविटी भी सोचती होगी कि ‘भाई, मेरी इज्जत का भी थोड़ा ख्याल कर लो’.
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देसी मार्वल
आलिया भट्ट और शरवरी की फिल्म ‘अल्फा’ के कई सीन्स देखकर ऐसा फील होता है कि, इसने हॉलीवुड की ‘ब्लैक विडो’, कैप्टन अमेरिका’ और ‘डॉक्टर स्ट्रेंजर’ से इंस्पिरेशन लेने में कोई शर्म नहीं की. इतना ही नहीं, कभी-कभी लगता है कि ‘अल्फा’ ने मार्वल का देसी रिश्तेदार बनने की पूरी कोशिश की गई है. फिल्म कई जगह इतनी ज्यादा इंस्पायर लगती हैं, कि आपको खुद याद आने लगेगा कि ‘ये सीन कहीं तो देखा है.’ यानी थोड़ा-थोड़ा सब में से उठा लिया है.
एक्टिंग की बात
अब बात करें, स्टार्स की एक्टिंग के बारे में तो, आलिया भट्ट जैसी शानदार एक्ट्रेस से उम्मीदें हमेशा हाई रहती हैं. लेकिन ‘अल्फा’ में उनका कैरेक्टर ही इतना नकली लगता है. कभी-कभी लगता है कि ‘गंगूबाई’ को कारगो और स्पेगटी पहना दिया हो. कहने का मतलब है कि आलिया का कैरेक्टर रीयल नहीं, बल्कि बहुत बनावटी लगता है. कई जगह उनका स्वैग ऐसा लगता है जैसे किसी ने उन्हें बार-बार याद दिलाया हो कि, थोड़ा शाहरुख खान वाला स्वैग डालो. लेकिन मेरे दोस्त, स्वैग लिखा या बताया नहीं जाता, कमाया जाता है. मतलब ये है कि, हर एक्टर का अपना अलग चार्म होता है. वहीं, अपने झक्कास यानी अनिल कपूर हमेशा की तरह ईमानदारी से अपना कैरेक्टर निभाते हैं. हालांकि, यहां भी मैं बस यही सवाल है कि, बार-बार ऐसी फिल्मों में अनिल कपूर को क्यों लिया जाता है? लेकिन वो जितनी देर के लिए भी स्क्रीन पर दिखे, ठीक ही लगे.
लॉर्ड बॉबी का स्वैग
अब बात करेंगे, करोड़ों लोगों के फेवरेट बॉबी देओल यानी लॉर्ड बॉबी की. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस हमेशा की तरह बढ़िया है. फिल्म में उनकी एंट्री भी शानदार है. लेकिन उनसे हरियाणवी नहीं बुलवानी चाहिए थी. देखा जाए तो, ‘अल्फा’ के राइटर ने उनके कैरेक्टर को भी आधा पकाकर ही परोस दिया और अधपकी चीज़ें कैसी होती हैं, ये तो आपको पता ही होगा. यानी बॉबी को ‘अल्फा’ में ऐसा विलेन बनाया गया है जो दिखने में खतरनाक है, लेकिन लिखने में आलस का शिकार हो गया. वहीं, अगर कोई इस फिल्म से सबसे ज्यादा फायदा लेकर निकलेगा तो, वो हैं शरवरी. कम स्क्रीन टाइम के बावजूद शरवरी इस फिल्म में लोगों को सबसे ज्यादा इम्प्रेस करती हैं. जहां बाकी एक्टर्स वीक स्क्रिप्ट से जूझ रहे हैं, वहां शरवरी अपने कैरेक्टर को मजबूती से पकड़कर चलती हैं.

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ग्रीक गॉर्ड का कैमियो
ऋतिक रोशन को ‘अल्फा’ में देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी ने फिल्म के एंड में याद दिलाया हो कि ‘अरे… ये तो यशराज फ्लिम्स का स्पाई यूनिवर्स है, लोगों को कैसे पता चलेगा, चलो ऋतिक का कैमियो ठूंस दो.’ देखा जाए तो, उनका कैमियो कहानी में उतना ही जरूरी लगता है जितना बिरयानी में किशमिश. कुछ लोगों को पसंद आ सकती है, लेकिन ज्यादातर लोग सोचेंगे कि इसकी क्या ही जरूरत थी? लेकिन बहुत से लोगों ने ‘वॉर’ वाले ‘कबीर’ यानी ऋतिक रोशन की एंट्री पर जमकर तालियां और सीटियां बजाईं, क्योंकि ये क्लाईमैक्स सीन ही था, जिसमें ऑडियन्स को थोड़ा बहुत ही सही लेकिन मज़ा आया.
सबसे बड़ी कमी
फिल्म ‘अल्फा’ का सबसे बड़ा क्राइम यही है कि ये ऑडियन्स की समझ में आने से पहले ही खत्म हो जाती है. वैसे भी यशराज स्पाई यूनिवर्स को लगता है कि बैकग्राउंड म्यूजिक तेज कर दो, दस गाड़ियां उड़ा दो, तीन हेलिकॉप्टर घुमा दो, हीरोइनों को बिकनी में दिखा दो, लोग सवाल पूछना बंद कर देंगे. वैसे, बिकनी से याद आया कि, शरवरी और आलिया भट्ट, दोनों ही जल्दबाजी में निकली थीं. ऐसे में उन्हें जंगल में बिकनी कहां से मिली. दोनों इतनी फुर्सत में थीं, कि उन्होंने जमकर ग्लैमर दिखाया. यही है, यशराज फ्लिम्स का स्पाई यूनिवर्स.

कहां है कहानी?
पिछले कुछ सालों में कई फिल्मों ने साबित किया है कि बड़ा बजट तभी काम करता है जब उसके पीछे दमदार और बढ़िया स्टोरी हो. सिर्फ कैमरे को महंगे देशों में घुमा देने से फिल्म इंटरनेशनल नहीं बन जाती. अगर कहानी लोकल भी हो लेकिन दिल से लिखी गई हो, तो ब्लॉकबस्टर बन जाती है. ‘लापता लेडीज’, ’12th फेल’ जैसी फिल्मों के उदाहरण हम सबके सामने हैं. ऐसे में आलिया भट्ट की ‘अल्फा’ देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर YRF स्पाई यूनिवर्स कब तक सिर्फ अपने यूनिवर्स को ही बढ़ाता रहेगा? बस करो, देख ली ‘टाइगर’, ‘पठान’ और ‘जवान’. अब इनसे आगे भी तो बढ़ों. कभी कैरेक्टर्स को भी बढ़ने का मौका मिलेगा या नहीं? हर नई फिल्म में एक नया कैमियो एड कर देने से फ्रेंचाइजी अच्छी नहीं बनती. लोगों को अब सरप्राइज नहीं, अच्छी कहानी चाहिए. वैसे भी, आदित्य धर की स्पाई थ्रिलर फिल्म ‘धुरंधर’ देखने के बाद लोगों की स्पाई और बॉलीवुड फिल्मों से उम्मीदें काफी ज्यादा बढ़ गई हैं. वो तो, शुक्र मनाओं कि आलिया भट्ट की ‘अल्फा’ थिएटर्स में रिलीज़ हुई है. ओटीटी पर रिलीज़ होती तो, लोग सवा 2 घंटे की फिल्म को स्किप कर करके10 या फिर 20 मिनट में खत्म कर देते. अगर आप खैर, आलिया भट्ट, शरफरी वाघ, बॉबी देओल और अनिल कपूर में से किसी के फैन हैं या फिर ऋतिक रोशन के हैं, तो एक बार ‘अल्फा’ देखी जा सकती है. बाकी फिल्म को हमारी तरफ से 5 में से 2 स्टार मिलते हैं.
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