Diabetes and Heart Attack: आज की बिजी और तनाव से भरी लाइफस्टाइल में डायबिटीज एक आम बिमारी हो गई. गलत खान-पान और टेंशन इसके प्रमुख कारणों में से हैं. ज्यादातर लोगों को लगता है कि डायबिटीज केवल हाई ब्लड शुगर की वजह से होने वाली बीमारी है, लेकिन ऐसा जरूरी नही है. यह बीमारी सबसे जरूरी अंग ‘हमारे दिल’ पर असर डाल सकती है. लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर लेवल रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. चिंता की बात यह है कि डायबिटीज वाले कुछ लोगों में दिल की बीमारी के साफ लक्षण नहीं दिखते हैं. पेट के ऊपरी हिस्से में तकलीफ, सांस लेने में तकलीफ या बहुत ज्यादा थकान जैसे लक्षणों को अक्सर छोटी-मोटी दिक्कतें समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे डायग्नोसिस में देरी हो सकती है.
डॉक्टरों के मुताबिक, डायबिटीज के मरीजों के लिए ब्लड शुगर को कंट्रोल करने के अलावा दिल की सेहत पर भी ध्यान देना जरूरी है. रेगुलर चेकअप, डॉक्टर की सलाह पर दवाएं लेना और लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव करने से खतरा कम करने में मदद मिल सकती है. नई दिल्ली के एक्सपर्ट्स ने डायबिटीज और दिल की बीमारी के बीच लिंक के बारे में जरूरी चेतावनी दी है. उन्होंने बताया कि लंबे समय तक अनियंत्रित ब्लड शुगर, इंसुलिन रेजिस्टेंस और सूजन जैसी स्थितियां ब्लड वेसल को प्रभावित कर सकती हैं. एक्सपर्ट्स जे जानें कि डायबिटीज के मरीजों में दिल की समस्याओं की जल्दी पहचान कैसे करें और मरीज के लिए सही मेडिकल देखभाल कितनी जरूरी है.
डायबिटीज से दिल की बीमारी का खतरा क्यों बढ़ता है
डायबिटीज वाले लोगों को दिल की बीमारी और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ सकता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर लेवल, इंसुलिन रेजिस्टेंस और लगातार सूजन से रक्त वाहिकाओं को नुकसान हो सकता है. इससे प्लाक बनने और दिल को खून सप्लाई करने वाली आर्टरी के सिकुड़ने का खतरा बढ़ जाता है. इससे बाद में दिल की गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. सर गंगा राम हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के हार्ट फेलियर प्रोग्राम के डायरेक्टर डॉ. अश्विन मेहता ने डायबिटीज को दिल की बीमारी का एक बड़ा कारण बताया. डॉ. मेहता के मुताबिक हाई ब्लड शुगर लेवल, इंसुलिन रेजिस्टेंस और सिस्टमिक सूजन रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकते हैं. मेडिकल भाषा में इसे एंडोथेलियल डिसफंक्शन कहते हैं. इस कंडीशन में रक्त वाहिकाओं के नॉर्मल काम पर असर पड़ता है, जिससे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ सकता है. डॉ. ने बताया कि कई स्टडीज से पता चला है कि डायबिटीज वाले लोगों में कार्डियोवैस्कुलर रिस्क बढ़ जाता है.
कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स भी बढ़ा सकते हैं दिक्कतें
डॉ. मेहता ने बताया कि डायबिटीज से अक्सर कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का लेवल असामान्य हो जाता है. ये दोनों बॉडी फैट के जरूरी हिस्से हैं. जब ये लेवल असामान्य हो जाते हैं, तो आर्टरीज में प्लाक जमने का खतरा बढ़ सकता है. प्लाक आर्टरीज को पतला कर सकता है और दिल की मांसपेशियों में सही खून की सप्लाई रोक सकता है. उन्होंने आगे कहा कि डायबिटीज का खतरा सिर्फ ब्लड शुगर लेवल बढ़ने तक ही सीमित नहीं है. इसके साथ हाई ब्लड प्रेशर हाइपरटेंशन और दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं. जब ये कंडीशन एक साथ होती हैं, तो दिल की बीमारी का खतरा और बढ़ सकता है. इसलिए, डायबिटीज के मरीजों के लिए सिर्फ अपना शुगर लेवल चेक करवाना काफी नहीं है. उन्हें अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और दूसरे हेल्थ इंडिकेटर्स पर भी नजर रखनी चाहिए.

एक 45 साल के मरीज को हार्ट की बीमारी का पता नहीं चला
डॉक्टरों के मुताबिक, डायबिटीज़ के मरीज़ों में हार्ट की दिक्कतें अक्सर लंबे समय में होती हैं. शुरू में मरीज को कोई खास दिक्कत महसूस नहीं होती, लेकिन रक्त वाहिकाओं को अंदरूनी नुकसान हो सकता है. इसलिए लक्षणों का इंतजार करने के बजाय जल्दी रिस्क का पता लगाना जरूरी है. अपने इलाज के दौरान सामने आए एक मामले को याद करते हुए, डॉ. मेहता ने बताया कि एक 45 साल के डायबिटीज के मरीज को अपनी दिल की बीमारी के बारे में पता नहीं था. एक दिन जब अचानक उसके पेट में बहुत तेज दर्द उठा तो वह हॉस्पिटल के इमरजेंसी डिपार्टमेंट में पहुंचा. मरीज को लगा कि ज्यादा फैट और मसालेदार खाना खाने की वजह से उसे गैस या पेट की दिक्कत हो गई है. उसे पहले से हार्ट अटैक की कोई जानकारी नहीं थी. हालांकि जब डॉक्टरों ने उसकी हालत देखी और एक इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG) किया तब टेस्ट में कुछ अजीब बदलाव दिखे, जिससे आगे की जांच की गई.
डॉ. मेहता ने बताया कि मरीज को हाई ब्लड प्रेशर की कोई हिस्ट्री नहीं थी, लेकिन वह लगभग 10 साल से डायबिटीज से परेशान था और रेगुलर दवा ले रहा था. इसके बावजूद, उसके दिल की आर्टरीज में गंभीर ब्लॉकेज हो गए थे. एंजियोग्राफी से पता चला कि मरीज की तीनों बड़ी कोरोनरी आर्टरीज पर बहुत बुरा असर पड़ा है और उनमें बहुत ज्यादा ब्लॉकेज है. मरीज को आगे के इलाज के लिए बाईपास सर्जरी की जरूरत थी. मरीज इस बात से हैरान था कि जब उसे दिल से जुड़े कोई साफ लक्षण महसूस नहीं हुए थे, तो उसकी हालत इतनी गंभीर कैसे हो गई. डॉक्टर ने बताया कि यह नुकसान अचानक नहीं हुआ था, बल्कि यह लंबे समय से हो रहा था. इस तरह की समस्या डायबिटीज के मरीजों में हो सकती है, इसलिए रेगुलर मॉनिटरिंग जरूरी है.
सीने में दर्द महसूस क्यों नहीं होता
मेदांता के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. नरेश त्रेहन ने बताया कि लंबे समय तक डायबिटीज रहने से नसों को नुकसान हो सकता है. इस स्थिति को डायबिटिक न्यूरोपैथी कहते हैं. अगर यह दिल से जुड़े दर्द के सिग्नल पहुंचाने वाली नसों पर असर डालता है, तो मरीज दिल की समस्या के आम चेतावनी संकेतों को साफ तौर पर नहीं पहचान पाते हैं. डॉ. त्रेहन के मुताबिक, सीने में दर्द अक्सर दिल की बीमारी का एक मुख्य संकेत होता है, लेकिन कुछ डायबिटीज के मरीजों में यह लक्षण हल्का हो सकता है या बिल्कुल भी नहीं हो सकता. ऐसे मामलों में दिल को नुकसान होने के बावजूद मरीजों को बीमारी की गंभीरता का पता नहीं चल पाता है.

अक्सर मरीजों को सांस लेने में दिक्कत या दूसरी समस्याओं का अनुभव होने के बाद ही पता चलता है कि दिल का काम प्रभावित हुआ है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि डायबिटीज के मरीजों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि सीने में दर्द न होने का मतलब उनका दिल पूरी तरह से स्वस्थ है. असामान्य थकान, सांस लेने में तकलीफ, बेचैनी या पेट के ऊपरी हिस्से में तकलीफ जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इन लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. डॉ. त्रेहन ने बताया कि कुछ मरीजों के हार्ट फंक्शन में लगभग 20 परसेंट की कमी आई थी और उन्हें इस गंभीर स्थिति का पता तब चला जब उन्हें सांस लेने में दिक्कत हुई और उन्होंने इकोकार्डियोग्राम करवाया.
इकोकार्डियोग्राम एक टेस्ट है जिसमें अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल करके हार्ट की बनावट और फंक्शन का पता लगाया जाता है. इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिलती है कि हार्ट कितने असरदार तरीके से खून पंप कर रहा है.
लक्षण का इंतजार न करें
डॉ. त्रेहन ने कहा कि डायबिटीज का इलाज करने वाले डॉक्टरों की जिम्मेदारी सिर्फ ब्लड शुगर कंट्रोल करने तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए. उन्हें मरीजों को डायबिटीज से जुड़ी दूसरी बीमारियों के बढ़ते रिस्क और समय पर टेस्टिंग की अहमियत के बारे में भी समझाना चाहिए. डॉक्टरों के मुताबिक, डायबिटीज और दिल की बीमारी के बीच का लिंक समझना जरूरी है क्योंकि दिल की दिक्कतें हमेशा सीने में तेज दर्द के तौर पर नहीं दिखतीं. कुछ मरीजों में, लक्षण साफ नहीं हो सकते, जबकि दूसरों में बीमारी का पता चलने तक दिल को काफी नुकसान हो चुका हो सकता है.
डॉ. त्रेहन ने डायबिटीज के मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों से कहा कि वे अपने मरीजों को हार्ट की बीमारी के रिस्क के बारे में बताएं और यह पक्का करें कि जरूरत के हिसाब से उनकी सही स्क्रीनिंग हो. उन्होंने रेगुलर हार्ट इवैल्यूएशन के महत्व पर जोर दिया और इकोकार्डियोग्राम या दूसरे हार्ट चेकअप की सलाह दी. हालांकि, ऐसा कोई एक नियम नहीं है कि हर डायबिटीज के मरीज को हर साल या हर दो साल में इकोकार्डियोग्राम करवाना जरूरी है. डॉक्टर मरीज की उम्र, डायबिटीज के समय, दूसरी बीमारियों, लक्षणों और हर व्यक्ति के रिस्क फैक्टर के आधार पर टेस्टिंग का टाइप और फ्रीक्वेंसी तय करते हैं. बिना लक्षणों वाले लोगों के लिए रेगुलर इकोकार्डियोग्राम जरूरी हैं या नहीं, यह भी क्लिनिकल असेसमेंट के आधार पर तय किया जाना चाहिए.
डायबिटीज के मरीजों को अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए कि उन्हें अपने ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और हार्ट हेल्थ को मॉनिटर करने के लिए कौन से टेस्ट करवाने चाहिए. यह भी जरूरी है कि डॉक्टर की सलाह के बिना डॉक्टर की लिखी दवाएं रेगुलर लें और उन्हें बंद न करें. इसके अलावा, बैलेंस्ड डाइट, रेगुलर एक्सरसाइज और पूरी नींद लें. तंबाकू से परहेज करने से हार्ट की अच्छी हेल्थ बनाए रखने में मदद मिल सकती है.
News Source: ANI
