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IT सेक्टर में हड़कंप : ट्रंप प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों के ग्रीन कार्ड पर लगाया बैन

by Sanjay Kumar Srivastava 9 October 2026, 7:34 PM IST
9 October 2026, 7:34 PM IST
ट्रंप प्रशासन का बड़ा फैसला: माइक्रोसॉफ्ट और इंफोसिस समेत कई दिग्गज टेक कंपनियों पर ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से रोक

Trump-Microsoft: ट्रंप प्रशासन ने धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए माइक्रोसॉफ्ट और इंफोसिस समेत कई दिग्गज टेक कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने गुरुवार को एक बड़ा फैसला लेते हुए माइक्रोसॉफ्ट और कई अन्य कंपनियों को उस विशेष प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है, जिसके तहत विदेशी कर्मचारी ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन करते हैं. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस द्वारा की गई इस घोषणा के तहत प्रशासन ने एक्सचेंज प्रोग्राम के माध्यम से विदेशी छात्रों को अमेरिका लाने वाली यूनिवर्सिटीज़ की भी कड़ी आलोचना की है.

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ट्रंप प्रशासन का यह कदम उन नियोक्ताओं और शिक्षण संस्थानों पर शिकंजा कसने की रणनीति का हिस्सा है जो विदेशी प्रतिभाओं का स्वागत करते हैं. ट्रंप समर्थकों का तर्क है कि ऐसे प्रोग्राम्स से अमेरिकी छात्रों और कर्मचारियों के रोजगार के अवसरों को नुकसान पहुंचता है. दूसरी ओर, विशेषज्ञों और समर्थकों का मानना है कि इन प्रोग्राम्स की बदौलत ही अमेरिका दुनिया भर से बेहतरीन टैलेंट को आकर्षित करने और तकनीकी रूप से आगे रहने में सक्षम हो पाता है.

H-1B वीजा से अमेरिकियों को नुकसान

रिपब्लिकन राष्ट्रपति के समर्थकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि H-1B वीज़ा जैसे कई प्रोग्राम, जिनके तहत वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया, असल में अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों को नौकरी पर रखने की सुविधा देते हैं, जिससे अंततः अमेरिकियों को नुकसान होता है. इस व्यापक घोषणा में, वेंस और प्रशासन के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने विदेशी छात्रों के लिए J-1 वीज़ा के इस्तेमाल और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिंग कंपनियों को लेकर भी यूनिवर्सिटीज़ की आलोचना की.यह घोषणा ट्रंप द्वारा माइक्रोसॉफ्ट के CEO सत्या नडेला को ‘नेशनल मेडल ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन’ देने से कुछ घंटे पहले की गई. यह उस कार्यक्रम का हिस्सा था जिसमें उन्होंने अपने टेक अरबपति सहयोगियों को देश के कुछ सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान और प्रौद्योगिकी पुरस्कार प्रदान किए.

अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशियों को रखा जा रहा

वेंस ने कहा कि जिस प्रोग्राम से माइक्रोसॉफ्ट को सस्पेंड किया जा रहा है, उसके तहत कंपनियों को लेबर डिपार्टमेंट में अप्लाई करने से पहले अमेरिका में नौकरियों के लिए विज्ञापन देना होता है. उन्हें यह दिखाना होता है कि अमेरिकी वर्करों की कमी के कारण उन्हें किसी विदेशी वर्कर को ग्रीन कार्ड देने की ज़रूरत है. वेंस ने कहा कि वे किसी छोटे शहर के अख़बार में विज्ञापन देंगे. वे कहेंगे कि हमने अपनी कंपनी में एक पद के लिए विज्ञापन दिया है और कोई भी उस पर आवेदन नहीं दे रहा है. और वे इस आवेदन की कमी का इस्तेमाल करके अमेरिकी वर्करों की जगह विदेशी बंधुआ मज़दूरों को रख लेंगे. वेंस ने कहा कि दुर्भाग्य से, अमेरिका में कोई भी ऐसी कंपनी नहीं है जिसने माइक्रोसॉफ्ट से ज़्यादा इस सिस्टम का इस्तेमाल किया हो.

माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी वर्करों को नौकरी से निकाला

US सिटिज़नशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज़ के डेटा के अनुसार, H-1B वीज़ा का इस्तेमाल करने वाले अमेरिकी नियोक्ताओं में माइक्रोसॉफ्ट पांचवें नंबर पर है. अमेज़न पहले नंबर पर है. वेंस ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल 6,000 अमेरिकी वर्करों को नौकरी से निकाला, लेकिन साथ ही 6,300 H-1B वीज़ा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड भी हासिल किए. इस फ़ैसले की घोषणा करते हुए व्हाइट हाउस की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वेंस ने कहा कि अगर आप हिसाब लगाएं, तो माइक्रोसॉफ्ट ने जिस भी अमेरिकी वर्कर को नौकरी से निकाला, उसकी जगह डेढ़ विदेशी बंधुआ मज़दूर को रखा. माइक्रोसॉफ्ट के लिए हमारा संदेश है कि आप एक बेहतरीन अमेरिकी कंपनी हैं, लेकिन आपको बेहतरीन अमेरिकी वर्करों को नौकरी पर रखना होगा.

H-1B वर्कर विदेशी बंधुआ मजदूरों जैसे

वेंस ने कहा कि H-1B वर्कर असल में विदेशी बंधुआ मज़दूरों जैसे हैं क्योंकि अगर उनकी नौकरी चली जाती है, तो उन्हें देश छोड़ना पड़ता है, और वे उसी पद पर काम करने वाले अमेरिकियों की तुलना में कम कमाते हैं. रेडमंड, वॉशिंगटन में स्थित माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि पिछले फाइनेंशियल ईयर में उसने जो लगभग 6,000 H-1B वीज़ा एप्लीकेशन जमा किए थे, उनमें से 80 प्रतिशत मौजूदा माइक्रोसॉफ्ट कर्मचारियों का स्टेटस बढ़ाने या बदलने के लिए थे. माइक्रोसॉफ्ट ने एक बयान में कहा कि ये नए लोगों को नौकरी पर रखने के लिए नहीं थे. नए कर्मचारियों के लिए बाकी एप्लीकेशन उन लोगों के लिए थे जो पहले से ही कानूनी तौर पर अमेरिका में थे और जिन्होंने हमारे लिए काम करने का फैसला किया. ये हमारे अमेरिकी वर्कफोर्स का सिर्फ़ 1 प्रतिशत हैं. वे हमारे देश में नए आए लोग नहीं हैं.

डग रैंड ने वेंस की घोषणा को बताया बेतुका

माइक्रोसॉफ्ट कंपनी ने आगे कहा कि वह H-1B पिटीशन सिर्फ़ उन लोगों के लिए फाइल करती है जो इस वीज़ा कैटेगरी के कड़े मानकों को पूरा करते हैं. बाइडेन प्रशासन के दौरान USCIS में पूर्व सीनियर एडवाइज़र रहे डग रैंड ने वेंस की घोषणा को बेतुका बताया. उन्होंने कहा कि अगर ट्रंप प्रशासन को सच में इस बात की चिंता होती कि H-1B वर्कर ‘बंधुआ मज़दूर’ हैं, तो वे कंपनियों को अपने ही H-1B वर्करों को ग्रीन कार्ड दिलाने में मदद करने से कभी नहीं रोकते. एक बार जब आपके पास ग्रीन कार्ड आ जाता है, तो आप अपने इमिग्रेशन स्टेटस के लिए अपने एम्प्लॉयर पर निर्भर नहीं रहते, फिर आप एक परमानेंट रेजिडेंट बन जाते हैं जो बिना किसी डर के नौकरी बदल सकता है और ज़्यादा वेतन के लिए बातचीत कर सकता है.

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लंबे समय से ट्रंप के निशाने पर रहा है H-1B प्रोग्राम

H-1B प्रोग्राम लंबे समय से ट्रंप के समर्थकों के निशाने पर रहा है. उनका कहना है कि यह प्रोग्राम अमेरिकी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाता है और इसमें बहुत ज़्यादा गड़बड़ियां होती हैं. H-1B वीज़ा उन हाई-स्किल वाली नौकरियों के लिए होते हैं जिनके लिए अमेरिकी कर्मचारी आसानी से नहीं मिल पाते. टेक्नोलॉजी कंपनियां इनका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल करती हैं और मंज़ूरी पाने वाले कर्मचारियों में से लगभग तीन-चौथाई भारत से होते हैं. पिछले साल ट्रंप ने H-1B वर्क वीज़ा की फ़ीस बढ़ाकर 1,00,000 अमेरिकी डॉलर करने की कोशिश की थी. उनका कहना था कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां कम वेतन वाले विदेशियों के हाथों में जाने से बचेंगी, लेकिन जून में एक फ़ेडरल जज ने इसे रद्द कर दिया.

H-1B वीजा नियमों पर ट्रंप सरकार सख्त

अमेरिकी प्रशासन ने H-1B प्रोग्राम के दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए सख्ती बढ़ा दी है. इसी कड़ी में प्रशासन ने अगस्त में 1,03,265 अमेरिकी डॉलर की एक नई फीस योजना का प्रस्ताव रखा है. सरकार का तर्क है कि यह फीस लीगल इमिग्रेशन सिस्टम को चलाने में आने वाले फेडरल खर्च को वसूलने का एक रेवेन्यू जरिया बनेगी.

हालांकि, इस नियम को अदालत में चुनौती मिलना तय माना जा रहा है. इसी बीच, माइक्रोसॉफ्ट के खिलाफ की गई इस हालिया कार्रवाई को विशेषज्ञों ने बेहद महत्वपूर्ण कदम बताया है. हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉन हीरा के अनुसार, पिछले महीने व्हाइट हाउस द्वारा जारी एक अहम एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में सभी सरकारी एजेंसियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे H-1B प्रोग्राम के गलत इस्तेमाल को रोकें. सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यह वीजा प्रोग्राम पूरी तरह राष्ट्रीय हित में काम करे.

अमेरिकी कर्मचारियों के लिए बने सुरक्षा के नियम

हावर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रॉन हीरा ने कहा कि अमेरिकी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के नियम होने चाहिए, जिनके तहत अगर आप किसी H-1B कर्मचारी को काम पर रखते हैं, तो आप यह वादा करते हैं कि आप उसी तरह का काम कर रहे अमेरिकी कर्मचारियों पर बुरा असर नहीं डालेंगे. इसे कभी लागू नहीं किया गया. माइक्रोसॉफ्ट के अलावा, वेंस ने कहा कि सरकार इसी तरह एडोब और टेक कंसल्टिंग फ़र्म कॉग्निज़ेंट, इंफ़ोसिस, टाटा, विप्रो, HCL और कैपजेमिनी पर भी रोक लगा रही है. इन कंपनियों ने टिप्पणी के लिए भेजे गए मैसेज का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया.

ट्रंप ने इंटरनेशनल स्टूडेंट्स को भी बनाया निशाना

वेंस की यह घोषणा ट्रंप प्रशासन द्वारा अंतरराष्ट्रीय छात्रों और अमेरिका में उनके काम करने की क्षमता के खिलाफ एक और कड़े कदम उठाए जाने के एक दिन बाद आई है. होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने बुधवार को अमेरिका में काम करने के इच्छुक अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए 70,000 अमेरिकी डॉलर की फीस का प्रस्ताव रखा. प्रस्तावित नियम के तहत स्कूलों को ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (OPT) प्रोग्राम में भाग लेने वाले हर छात्र के लिए यह फीस देनी होगी. यह प्रोग्राम छात्रों को अपनी पढ़ाई के दौरान या उसके बाद अपने मुख्य विषय से संबंधित नौकरियों में काम करने की अनुमति देता है.

J-1 वीजा धोखाधड़ी की हो जांच

वेंस ने विश्वविद्यालयों की भी आलोचना की और कहा कि वे अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका आने की अनुमति देने वाले प्रोग्राम का गलत इस्तेमाल कर रहे थे. J-1 वीज़ा कहे जाने वाले ये अस्थायी वीज़ा, अंतरराष्ट्रीय लोगों को काम और स्टडी एक्सचेंज प्रोग्राम के लिए कुछ समय के लिए अमेरिका आने की अनुमति देते हैं. वेंस ने खास तौर पर नौ विश्वविद्यालयों का ज़िक्र किया और कहा कि J-1 वीज़ा धोखाधड़ी के लिए उनकी और जांच होनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने दूसरे विश्वविद्यालयों की तुलना में इस प्रोग्राम का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया था. इन विश्वविद्यालयों में हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, ब्राउन, यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया (डेविस), कैलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, एरिज़ोना स्टेट और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी शामिल थे. स्टैनफोर्ड ने कहा कि वह जांच में सहयोग करेगा.

MIT में हर J-1 वीजा धारक की जांच-पड़ताल

MIT और ब्राउन ने कहा कि उन्हें विदेशी कर्मचारियों के प्रोग्राम से जुड़े सरकारी समन मिले हैं और वे उनकी समीक्षा कर रहे हैं. MIT की प्रवक्ता किम्बर्ली एलन ने एक लिखित बयान में कहा कि ध्यान देने वाली बात यह है कि MIT में हर J-1 वीज़ा धारक की जांच-पड़ताल की गई है और उसे अमेरिकी सरकार ने यहां आने की मंज़ूरी दी है, और हम अमेरिकी कानूनों का पालन करने की अपनी ज़िम्मेदारियों को गंभीरता से लेते हैं.

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