Revolutionary Indian Films: सोचिए, सिनेमाघर की लाइटें बंद होती हैं, पर्दा चमकता है. पहले कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा रहता है और फिर शुरू होती है एक ऐसी कहानी, जो अगले तीन घंटे तक सिर्फ आपको एंटरटेन नहीं करती, बल्कि आपके दिल, दिमाग और कभी-कभी पूरी सोच पर कब्जा कर लेती है. यही तो भारतीय सिनेमा की असली ताकत है. भारत में फिल्में सिर्फ शुक्रवार का मनोरंजन नहीं रही हैं. कभी उन्होंने समाज का आईना दिखाया, कभी देशभक्ति की आग जगाई, कभी परिवार को एक साथ बैठाया, कभी नौजवानों को सवाल पूछने की हिम्मत दी और कभी पूरी दुनिया को बताया कि भारतीय कहानी सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं है. 1913 में दादा साहेब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू हुआ सफर 1931 की ‘आलम आरा’ तक पहुंचा. फिर भारतीय सिनेमा ने ऐसी छलांग लगाई कि देखते ही देखते फिल्में हमारे समाज, फैशन, भाषा, रिश्तों और यहां तक कि हमारी सोच का हिस्सा बन गईं. ऐसे में उन फिल्मों को याद करते हैं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की कहानी ही बदल दी.
जब मां सिर्फ मां नहीं, पूरा हिंदुस्तान बन गई
साल था 1957, जब आजादी को सिर्फ दस साल हुए थे. देश गरीबी, कर्ज, किसान और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था. तभी पर्दे पर आई एक ऐसी मां, जिसने भारतीय सिनेमा में ‘मां’ शब्द का मतलब ही बदल दिया. उस फिल्म का नाम है ‘मदर इंडिया’. फिल्म में राधा यानी नरगिस की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से ज्यादा एक मुश्किल हकीकत थी. साहूकार का कर्ज, गरीबी, भूख, परिवार की जिम्मेदारी और टूटते रिश्ते, सब कुछ उसके सामने था. लेकिन राधा झुकी नहीं. इतना ही नहीं, जब उसका अपना बेटा गलत रास्ता चुनता है, तब फिल्म का सबसे इमोशनल सीन आता है. एक मां अपने बेटे के सामने खड़ी होती है. यही सीन ‘मदर इंडिया’ को सिर्फ हिट फिल्म नहीं, भारतीय सिनेमा का सिंबल बना देता है. ये फिल्म ऑस्कर की रेस तक पहुंची और दुनिया को बताया कि भारतीय गांव की कहानी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिल जीत सकती है.

जब पर्दे पर बजाया देशभक्ति का बिगुल
अगर भारतीय सिनेमा में देशभक्ति की फिल्मों का कोई चेहरा बनाया जाए, तो मनोज कुमार का नाम सबसे पहले आता है. 1970 में रिलीज हुई फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ ने भारत की संस्कृति और देशप्रेम को कहानी बनाया. फिर आया गाना ‘जब जीरो दिया मेरे भारत ने.’ ये सिर्फ गाना नहीं था. उस दौर के लिए ये एक इमोशन था कि भारत अपनी जड़ों और इतिहास के दम पर दुनिया में अपनी जगह बना सकता है. मनोज कुमार ने इससे पहले ‘उपकार’ में ‘जय जवान जय किसान’ के इमोशन को फेमस किया था. ‘पूरब और पश्चिम’ ने उनकी ‘भारत कुमार’ वाली पहचान को और मजबूत कर दिया. यानी एक तरफ मनोरंजन था, दूसरी तरफ मैसेज. ये फिल्म बिल्कुल वही मसाला थी, जिसमें देशभक्ति भी थी और सिनेमा भी.
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एक ऐसा विलेन जिससे डर गया देश
अब जरा कल्पना कीजिए, एक सूना गांव, धूल उड़ती सड़क, घोड़े की टाप और बंदूक लिए दो दोस्त. फिर दूर कहीं गूंजती आवाज, ‘अरे ओ सांभा!’. साल 1975 में रमेश सिप्पी की ‘शोले’ आई और भारतीय सिनेमा का खेल ही बदल गया. जय और वीरू की दोस्ती, ठाकुर का बदला और गब्बर सिंह का आतंक, सब कुछ इतना यादगार था कि फिल्म के किरदार कहानी से निकलकर भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बन गए. गब्बर सिर्फ विलेन नहीं था. वो डर का चेहरा था. वहीं, जय-वीरू की दोस्ती ने ऐसी मिसाल बनाई जिसे आज तक शादी से लेकर सोशल मीडिया तक यूज किया जाता है. यानी इस फिल्म में एक्शन था, रोमांस था, कॉमेडी थी, गाने थे और सबसे बढ़कर थे ऐसे डायलॉग जिन्हें पूरा देश बोलने लगा. ‘शोले’ ने साबित कर दिया कि मसाला फिल्म अगर सही तरीके से बनाई जाए तो वो सिर्फ हिट नहीं, कल्ट बन सकती है.
गायब हीरो और हीरोइन ने संभाला स्टेज
1987 में भारतीय सिनेमा को मिला एक ऐसा सुपरहीरो, जिसे कोई देख ही नहीं सकता था. नाम था, मिस्टर इंडिया. लेकिन इस फिल्म की असली सुपरपावर सिर्फ अनिल कपूर नहीं थे, श्रीदेवी भी थीं. ‘मिस्टर इंडिया’ में उन्होंने कॉमेडी, डांस, इमोशन और ग्लैमर का ऐसा कॉकटेल बनाया कि लोग पूछने लगे, हीरो कौन है? ‘हवा हवाई’ से लेकर ‘कांटे नहीं कटते’ तक, श्रीदेवी ने पर्दे पर ऐसा जलवा दिखाया कि फिल्म का टाइटल भले ‘मिस्टर इंडिया’ था, लेकिन दर्शकों के दिल में ‘मिस इंडिया’ बस गई. फिल्म ने बच्चों की दुनिया के साथ-साथ गरीबी, अपराध और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को भी जगह दी. फिर आया मोगैम्बो, ‘मोगैम्बो खुश हुआ.’ बस, एक डायलॉग और अमरीश पुरी हमेशा के लिए अमर हो गए.
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सिनेमाघर बना शादी का मंडप
अब कहानी बदलती है. बंदूकें गायब, गब्बर गायब और मिस्टर इंडिया की तरह गुस्सा भी गायब. अब स्क्रीन पर आता है एक बड़ा सा परिवार, शादी का माहौल, ढेर सारे रिश्ते, गाने, हंसी और रस्में. बात हो रही है 1994 में रिलीज़ हुई ‘हम आपके हैं कौन..!’ की. इसने भारतीय दर्शकों को फैमिली एक्सपीरियंस दिया कि सिनेमाघर में बैठा हर इंसान खुद को उसी परिवार का सदस्य समझने लगा. सलमान खान और माधुरी दीक्षित की जोड़ी ने स्क्रीन पर रोमांस किया, लेकिन फिल्म की असली जान थी, फैमिली. फिर आई ‘जूता चुराई’ की रस्म. जिस रस्म को पहले शादियों में परिवार वाले अपने तरीके से करते थे, फिल्म ने उसे पॉप कल्चर का हिस्सा बना दिया. माधुरी का ‘निशा’ वाला किरदार, उनके कपड़े और डांस, सब ट्रेंड बन गया. ‘हम आपके हैं कौन..!’ ने ये भी दिखाया कि बिना विलेन और बिना बंदूक के भी फिल्म ब्लॉकबस्टर बन सकती है.
जब यंगस्टर्स ने तोड़ी चुप रहने की प्रथा
फिर आया साल 2006. एक तरफ बॉलीवुड में रोमांस और ग्लैमर छाया हुआ था. तभी फिल्म रिलीज़ हुई ‘रंग दे बंसती’आई. आमिर खान और उनके दोस्तों की कहानी शुरू होती है मस्ती से, लेकिन धीरे-धीरे बदल जाती है सवाल में. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी आज के युवाओं से जुड़ने लगती है. फिल्म का सबसे बड़ा कमाल यही था कि उसने इतिहास को किताब से निकालकर कॉलेज की कैंटीन में पहुंचा दिया. अब यंगस्टर्स सिर्फ क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ नहीं रहे थे, वो खुद को उनकी जगह पर देखने लगे थे. फिल्म ने कहा, व्यवस्था से शिकायत करना आसान है, लेकिन बदलाव के लिए खड़ा होना मुश्किल. यही मैसेज यंगस्टर्स के दिल में उतर गया.
अब सब कुछ ज्यादा खुलकर होगा
फिर आया वो दौर जब बॉलीवुड ने अपनी ‘फैमिली एंटरटेनमेंट’ वाली टाई थोड़ी ढीली कर दी. साल 2011 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘डेली बेली’ ने शहरी जिंदगी, गालियों, डार्क ह्यूमर और एडल्ट कॉमेडी को मेनस्ट्रीम के करीब ला दिया. ये फिल्म हर किसी के लिए नहीं थी, लेकिन जिसने पसंद की, उसने खूब अच्छी लगी. इसके बाद शहर के यंगस्टर्स पर आधारित कई फिल्मों ने भाषा, रिश्तों, सेक्सुअलिटी और लाइफस्टाइल को ज्यादा खुलकर दिखाना शुरू किया. इस दौर ने एक बड़ी बहस छेड़ दी कि, क्या सिनेमा सिर्फ समाज को दिखाता है या समाज को प्रभावित भी करता है?

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जब कटप्पा ने पूछा सवाल
अब आते हैं उस फिल्म पर जिसने ‘पैन-इंडिया’ शब्द को सचमुच सुपरस्टार बना दिया. 2015 में एस.एस. राजामौली की ‘बाहुबली द बिगिनिंग’ आई. फिर एक सवाल ने पूरे देश को परेशान कर दिया, कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? बस, इसके बाद भारतीय सिनेमा की कहानी बदल गई. अमरेंद्र बाहुबली, महेंद्र बाहुबली, शिवगामी और कटप्पा जैसे किरदार घर-घर पहुंच गए. बड़े सेट, शानदार वीएफएक्स, वॉर, इमोशन, परिवार, त्याग और खूबसूरत दुनिया, राजामौली ने सब कुछ एक ही फ्रेम में रख दिया. साल 2017 में ‘बाहुबली 2’ आई और उस सवाल का जवाब मिला. लेकिन असली जवाब तो भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को मिल चुका था. जवाब था अच्छी कहानी भाषा नहीं देखती. इसके बाद साउथ फिल्मों के लिए हिंदी मार्केट कोई अलग दुनिया नहीं रही. ‘पैन-इंडिया सिनेमा’ भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का नया मंत्र बन गया.
जब दुनिया तक पहुंची नाटू-नाटू की धुन
‘बाहुबली’ के बाद राजामौली ने फिर वही काम किया, लेकिन इस बार दांव और बड़ा था. साल 2022 में RRR रिलीज़ हुई. राम चरण और जूनियर एनटीआर की दोस्ती, एक्शन और इमोशन ने दर्शकों को सीट से बांध दिया. फिल्म ने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों से प्रेरणा लेकर एक काल्पनिक कहानी रची. इसमें दोस्ती थी, बलिदान था, मातृभूमि के लिए संघर्ष था और राजामौली वाला ‘लार्जर दैन लाइफ’ अंदाज था. फिर आया ‘नाटू नाटू’, जिसपर दुनिया नाची. भारतीय सिनेमा ने ऑस्कर में इतिहास रचा. ये सिर्फ एक अवॉर्ड नहीं था. ये उस सोच के लिए बड़ा जवाब था कि भारतीय फिल्में सिर्फ इंडियन ऑडियन्स के लिए बनाई जाती हैं. ‘आरआरआर’ ने बता दिया कि कहानी लोकल हो सकती है, लेकिन इमोशन ग्लोबल होते हैं.

नए दौर का नया तेवर
अब आते हैं उस दौर पर जहां दर्शक की पसंद तेजी से बदल रही है. आज सिर्फ बड़ा स्टार होना काफी नहीं है. दर्शक कहानी चाहता है, स्केल चाहता है, इमोशन चाहता है, एक्शन चाहता है और सबसे बढ़कर ऐसा एक्सपीरियंस चाहता है जिसके लिए वो मोबाइल छोड़कर थिएटर पहुंचे. ‘धुरंधर’ इसी नए दौर के तेवर को दिखाने वाली फिल्म रही. जहां एक्शन, देशभक्ति, संघर्ष, बड़े किरदार और मॉर्डन टेक्निक एक साथ दिखाई दी. आज का दर्शक अपनी कहानियों में स्थानीय रंग, देशभक्ति और थ्रिल देखना चाहता है. यानी सिनेमा फिर बदल रहा है. इस बार बदलाव सिर्फ बॉलीवुड वर्सेस साउथ का नहीं है. ये कहानी वर्सेस स्टारडम की है. लेकिन असली क्रांति अभी बाकी है.
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