Gyanesh Kumar: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस समय सुर्खियों में बने हुए हैं. विपक्ष ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. कांग्रेस से लेकर आप और टीएमसी तक, हर पार्टी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग हो रही है. दिल्ली से लेकर पटना तक कांग्रेस पार्टी राज्य और जिला हेडक्वार्टर पर विरोध मार्च निकालकर विरोध कर रही है. यहां तक कि कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन का भी ऐलान कर दिया है.
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और “इंडिया” गठबंधन मिलकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद के दोनों सदनों में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की तैयारी कर रहे हैं, जिसके लिए ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है. इससे पहले भी विपक्ष ने मार्च और अप्रैल 2026 में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था, जिसे खारिज कर दिया गया. ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग अक्सर उठती रहती है, लेकिन क्या आपको पता है कि ऐसा करना कितना मुश्किल है. इसके लिए कानूनी प्रक्रिया क्या होती है. चलिए जानते हैं महाभियोग प्रस्ताव क्या होता है, इसे कैसे पेश किया जाता है और मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की पूरी प्रक्रिया क्या है.
पहले समझे पूरा मामला क्या है
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर दो दूसरे चुनाव आयुक्तों ने मनमाने तरीके से फैसले लेने और उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है. एक मीडिया रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई, जिनकी सुनवाई नहीं की गई. खबर सामने आने बाद से देश की सियासत गरमा गई है.
कौन से हैं मुख्य मुद्दे
रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर कई खास मुद्दों पर आपत्तियां जताई.
Form-6 में बदलाव पर विवाद- चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को कहा कि Form-6 एक कानूनी डॉक्यूमेंट है और इसमें बदलाव के लिए रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 में बदलाव करने होंगे. सुखबीर सिंह संधू ने भी 19 मई को इस पर सहमति जताई. आपत्तियों के बावजूद Form-6 में बदलाव फिर भी किए गए. बाद में 13 अगस्त को संधू ने इन बदलावों को “गलत” और “गैर-कानूनी” बताया.
वोटर डेटा को केंद्रीकृत करना– चुनाव आयुक्तों ने चिंता जताई कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO), जो कानूनी तौर पर वोटर लिस्ट तैयार करने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें ERONet और बाद में ECINet का पूरा एक्सेस नहीं मिल रहा था. मई में विवेक जोशी ने इसे वोटर डेटा के धीरे-धीरे सेंट्रलाइजेशन से जोड़ा और सिस्टम के ऑडिट की मांग की.
पश्चिम बंगाल में वोटर्स के खिलाफ अपील- सुखबीर सिंह संधू ने सवाल किया कि पश्चिम बंगाल वोटर लिस्ट में वोटर्स के नाम दोबारा शामिल करने के खिलाफ अपील किसने और किसके अधिकार में दर्ज की थी.
गोवा की फाइनल वोटर लिस्ट से नाम गायब होने का मामला– गोवा में 97 लोगों के दस्तावेज वेरिफाई करने के बाद, ERO ने उन्हें वोटर लिस्ट में शामिल होने के लायक माना था. लेकिन, सॉफ्टवेयर ने उन्हें जोड़ने की इजाजत नहीं दी. सिस्टम समय पर ठीक नहीं हो पाया, जिससे 97 लोग फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो पाए.
क्या होता है महाभियोग प्रस्ताव
भारत में महाभियोग प्रस्ताव का मतलब एक संसदीय प्रक्रिया है. इसके जरिए राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों और मुख्य चुनाव अधिकारी (CEC) जैसे संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख को समय से पहले उनके पद से हटाया जाता है. संविधान के तहत, इन लोगों को सीधे नहीं हटाया जा सकता, इसलिए महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाता है.
कितना अहम है मुख्य चुनाव आयुक्त का पद
मुख्य चुनाव आयुक्त का पद लोकतंत्र में बहुत शक्तिशाली और महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है. भारत सरकार के आधिकारिक वरीयता क्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश के बाद सबसे अहम माना जाता है. भारत के चुनाव आयोग में तीन इलेक्शन कमिश्नर होते हैं और उसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद सबसे प्रमुख होता है. कोई भी फैसला तीनों आयुक्तों की सहमति से ही लिया जाता है. देश के सभी नागरिकों की लोकतांत्रिक आवाज को सुरक्षित रखना और चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना इनकी जिम्मेदारी है.
संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ दो गंभीर वजहों से ही पद से हटाया जा सकता है. पहला है साबित कदाचार- अगर CEC को भ्रष्टाचार, किसी गलत काम में शामिल होने या अपने पद का गलत इस्तेमाल करने का दोषी पाया जाता है. दूसरा है अक्षमता- अगर CEC शारीरिक या मानसिक रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाने में असमर्थ हो जाता है. ज्ञानेश कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, इसलिए इनके खिलाफ साबित कदाचार के तहत महाभियोग प्रस्ताव पेश किया जाएगा.
मुख्य चुनाव अधिकारी को कैसे हटाया जाता है
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्यादा से ज्यादा छह साल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, पद पर रह सकते हैं. इससे पहले उन्हें हटाने के लिए लिए एक पूरी प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है. साथ ही CEC को दोबारा नियुक्त भी नहीं किया जा सकता. संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से उसी तरह हटाया जाता है, जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है. भारतीय चुनाव आयोग को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया को बहुत मुश्किल बनाया गया है. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए दोनों सदनों के सदस्यों को एक नोटिस लाना होता है, जिसे महाभियोग प्रस्ताव कहते हैं, जिसमें साफ तौर पर गलत व्यवहार या अक्षमता का आरोप हो. महाभियोग प्रस्ताव को मंजूर होने के लिए उस पर लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. अगर प्रस्ताव मंजूर हो जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जांच होती है.
इसके बाद पद से हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाता है. इसे संसद में मौजूद और वोट देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पास होना जरूरी है. अगर पूरी संवैधानिक प्रक्रिया पूरी हो जाती है तो राष्ट्रपति के पास इस मामले में संसद की सलाह मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. प्रस्ताव पास होने के बाद राष्ट्रपति चीफ इलेक्शन कमिश्नर को हटाने का आदेश देते हैं.
कैसे होती है नियुक्ति
मुख्य चुनाव अयुक्त को सीधे राष्ट्रपति ही नियुक्त करते हैं. लेकिन इसकी भी एक कानूनी प्रक्रिया है. सबसे पहले एक सर्च कमेटी संभावित उम्मीदवार का एक पैनल तैयार करती है. इस कमेटी के चेयरमैन केंद्रीय कानून एवें न्याय मंत्री होते हैं और इसमें भारत सरकार के दो और सेक्रेटरी लेवल के अधिकारी शामिल होते हैं. यह कमेटी पांच नामों का एक पैनल तैयार करती है. यह पैनल फिर सिलेक्शन कमेटी के पास जाता है इस कमेटी में तीन मेंबर होते हैं- प्राइम मिनिस्टर, जो कमेटी के चेयरमैन होते हैं; लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक कैबिनेट मिनिस्टर.
सिलेक्शन कमेटी उम्मीदवारों पर विचार करती है और अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजती है. इसके बाद राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर करके CEC को नियुक्त करते हैं. 2023 के कानून के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त ऐसे लोग होने चाहिए जो केंद्रीय सरकार में सेक्रेटरी के बराबर पद पर रहे हों या अभी काम कर रहे हों. इसके अलावा उनके पास चुनाव कराने, मैनेजमेंट का ज्ञान और अनुभव भी होना चाहिए.
पहले प्रस्ताव हुए खारिज
TMC और दूसरी विपक्षी पार्टियों की लीडरशिप में विपक्ष ने 12 मार्च, 2026 को ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करते हुए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में प्रस्ताव पेश किया था. इस शुरुआती प्रस्ताव पर लोकसभा में लगभग 130 सांसदों और राज्यसभा में 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे. लेकिन लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन दोनों ने इस प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया था. इसके बाद 24 अप्रैल में राज्यसभा में एक और प्रस्ताव दिया गया, जिस पर 73 सांसदों ने साइन किए थे. ओम बिरला और राज्यसभा चेयरमैन ने इस प्रस्तावों को भी खारिज कर दिया और उन्हें संसदीय चर्चा के लिए स्वीकार करने से मना कर दिया. उस समय विपक्ष ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में गड़बड़ी, पक्षपात और चुनावी धोखाधड़ी की जांच में रुकावट डालने का आरोप लगाया था.
चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज किया
SIR का काम तीनों कमिश्नरों की देखरेख में हुआ है. लेकिन अखबार की रिपोर्ट में कहा गया है कि संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार, बिना उनकी जानकारी के लिए गए फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर औपचारिक रूप से आपत्ति जताई है. हालांकि चुनाव आयोग (ECI) ने अखबार की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है. मामले से जुड़े लोगों ने कहा कि किसी भी चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग के फैसलों पर अपनी असहमति नहीं जताई थी. उन्होंने कहा कि दोनों आयुक्तों ने बस कुछ बातें कही थीं, जिन पर बाद में कमीशन ने विचार किया.
चुनाव आयोग ने आधिकारिक प्रेस रिलीज जारी किया है. कमीशन द्वारा जारी किए गए सभी आधिकारिक ऑर्डर, फैसले और प्रशासनिक निर्देश पूरी कानूनी मंजूरी के साथ आते हैं और चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य इलेक्शन कमिश्नर (अपॉइंटमेंट, सर्विस की शर्तें और ऑफिस का समय) एक्ट, 2023 के तहत स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हैं.
