Dharmendra Pradhan : नीट परीक्षा लीक विवाद के बाद कॉकरेच जनता पार्टी (CJP) ने जंतर-मंतर पर धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ धरना शुरू कर दिया और उनके इस्तीफे की भी मांग शुरू कर दी. इस दौरान पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी अनशन पर बैठ गए. इसी बीच सुरक्षा बलों की मदद से वांगचुक को धरना स्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया. इसके बाद भारी संख्या में जेन-जी जंतर-मंतर पर पहुंचने लगे और यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया. 20 जुलाई को चलो संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी और सुरक्षा बल आमने-सामने आ गए. इस दौरान जंतर-मंतर के आसपास तनावपूर्ण स्थिति बन गई. साथ ही पुलिस की तरफ लाठीचार्ज करने के बाद सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मोदी सरकार सवालों के घेरे में आ गई और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग अब पीएम मोदी तक पहुंच गई. वहीं, भारी विवादों के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. इसी बीच पता चला है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनका इस्तीफा पत्र स्वीकार कर लिया है.
प्रधान ने बताया था CJP को दहशतगर्दों की B-टीम
धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक करियर में NEET पेपर लीक को लेकर हुए देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बाद उनकी छवि को सबसे बड़ा झटका लगा है. लेकिन शिक्षा मंत्री के तौर पर प्रधान की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने में अहम भूमिका रही. हालांकि, वह आखिरी साल में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े बार-बार होने वाले विवादों और स्कूली पाठ्यपुस्तकों के भगवाकरण के आरोपों से घिरे रहे. परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों और NEET पेपर लीक को लेकर इस्तीफे की मांग करते हुए CJP के नेतृत्व में हुए विरोध-प्रदर्शनों के 35 दिन बाद शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. इस इस्तीफे से पता चलता है कि सरकार का रुख आंदोलन के प्रति पहले के मुकाबले काफी बदल गया है. धर्मेंद्र प्रधान ने खुद जून में टकराव को और बढ़ा दिया था जब उन्होंने CJP को ‘दहशतगर्दों की B-टीम’ कहा था और उन ताकतों के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया था जिन्हें जनता ने नकार दिया था. वहीं, प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में सार्वजनिक स्थानों पर विवादित होने के बाद वह दूसरे कैबिनेट मिनिस्टर हैं. इससे पहले #MeToo मूवमेंट के दौरान यौन उत्पीड़न के आरोप में विदेश राज्य मंत्री रहे एमजे अकबर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. बता दें कि प्रधान देश के दूसरे ऐसे केंद्रीय शिक्षा मंत्री भी हैं जिन्होंने किसी विवाद के बाद केंद्र को अपना इस्तीफा सौंपा है. 1967 में एमसी छागला ने नीतिगत और राजनीतिक मुद्दों पर सरकार से मतभेदों के कारण इंदिरा गांधी की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था.

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ऐसा रहा धर्मेंद्र प्रधान का करियर
1983 में ABVP कार्यकर्ता के तौर पर शुरुआत करने से लेकर दो दशक बाद तीन बार कैबिनेट मंत्री रहे प्रधान ने अपने राजनीतिक करियर में कई भूमिकाएं निभाईं. 57 वर्षीय प्रधान पूर्व केंद्रीय मंत्री देबेंद्र प्रधान हैं और चुनाव प्रभारी नियुक्त करने के मामले में बिहार से लेकर हरियाणा तक BJP ने प्राथमिकता दी है. आपको बताते चलें कि साल 2017 में उत्तराखंड और 2022 में उत्तर प्रदेश के चुनावों की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी. उनका लंबे समय का प्रोजेक्ट उनका गृह राज्य ओडिशा था, जहां पर 2024 में BJP ने पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई. यही वही शख्स हैं जिनको साल 2021 में पश्चिम बंगाल की लड़ाई में खास जिम्मेदारी दी गई थी. इसके बाद नंदीग्राम सीट पर मोर्चा संभाला और यहां पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हार का सामना करना पड़ा था. हालांकि, ममता की पार्टी बहुमत से जीत गई थी. लेकिन दौरान राज्य में बीजेपी काफी मजबूती के साथ उभर आई थी और मुख्य विपक्षी पार्टी भी बन गई.
मोदी सरकार में मिला पेट्रोलियम मंत्रालय
बता दें कि साल 2000 में ओडिशा की पल्ललहारा सीट से चुनाव लड़कर अपनी चुनावी पारी की शुरुआत की. फिर 2004 में उन्होंने देवगढ़ से लोकसभा चुनाव लड़ा और यह सीट उनके पिता देबेंद्र प्रधान के पास थी. वहीं, 2009 के आम चुनाव में हारने के बाद उन्होंने सीधे चुनावी मुकाबले से दूर रहने का फैसला किया. लेकिन अपनी काबिलियत और संगठन कौशल की वजह से उन्हें 2010 में बीजेपी का महासचिव बनाया गया और 2012 में वे बिहार से राज्यसभा के लिए चुने गए. दूसरी तरफ 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब बीजेपी सत्ता में आई, तो प्रधान को स्वतंत्र प्रभार के साथ पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री बनाया गया. गरीब परिवारों को मुफ्त LPG कनेक्शन देने वाली ‘उज्ज्वला योजना’ की वजह से उन्हें ‘उज्ज्वला मैन’ के नाम से भी जाना जाता है. साथ ही पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री के तौर पर सबसे लंबे समय तक सेवा देने का श्रेय भी धर्मेंद्र प्रधान को जाता है. 2017 में कैबिनेट में फेरबदल के दौरान एक बार फिर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय में एक कैबिनेट रैंक दी गई और कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया.

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15 साल बाद लोकसभा में हुई वापसी
इसके बाद मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में प्रधान को फिर से कैबिनेट मंत्री बनाया गया और तेल मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई. 2021 में प्रधान को शिक्षा और कौशल विकास एवं उद्यमिता का केंद्रीय मंत्री बनाया गया. शिक्षा मंत्री के तौर पर उन्हें नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को लागू करने की जिम्मेदारी सौंपी गई. 2024 में ओडिशा के संबलपुर से बीजू जनता दल के प्रणब प्रकाश दास को 1.19 लाख से अधिक वोटों के बड़े अंतर से हराकर प्रधान 15 साल बाद लोकसभा में लौटे. 2024 में मोदी 3.0 सरकार में भी उनको शिक्षा मंत्री का ही पदभार सौंपा गया. हालांकि उनके कार्यकाल की शुरुआत पेपर लीक के आरोपों से जुड़े विवादों के बीच मुश्किल भरी रही. आपको बताते चलें कि ओडिशा में बीजेपी के प्रमुख चेहरे रहे प्रधान को राज्य के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा था. मामला यह है कि उनके नेतृत्व कौशल में ही बीजेपी ने बीजेडी को हराकर राज्य में पहली बार 78 सीटें जीती थीं. इसके बाद लगने लगा कि वह जल्द ही प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. लेकिन मोदी सरकार अपने सरप्राइज के लिए जानी जाती है और उन्होंने प्रधान को छोड़कर आदिवासी चेहरे मोहन चरण माझी को मुख्यमंत्री के रूप नाम आगे बढ़ाया.
तीन कृषि कानूनों को करवाना था रद्द
अक्टूबर 2018 में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने ‘मी टू’ मूवमेंट के दौरान इस्तीफा दे दिया. कई महिलाओं ने उन पर आरोप लगाया था कि जब वे एडिटर थे, तब उन्होंने यौन उत्पीड़न किया था. हालांकि, अकबर ने आरोपों से इनकार किया, लेकिन नैतिक आधार पर पद छोड़ दिया. सरकार ने अपनी सबसे बड़ी पॉलिसी तब बदली जब नवंबर 2021 में मोदी ने तीन कृषि कानूनों को रद्द करने का ऐलान किया. इन कानूनों के विरोध में एक साल तक आंदोलन चला, जिसमें हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे और कानूनों को वापस लेने की मांग करते रहे. हालांकि सरकार लगातार इन सुधारों का बचाव करती रही, लेकिन आखिरकार उसे झुकना पड़ा. इसके बाद मोदी सरकार एक बार फिर तीनों कृषि कानूनों को संसद में लेकर आई और रद्द करने वाला बिल पास कर दिया.

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UPSC का विज्ञापन भी लिया था वापस
वहीं, अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने सीनियर सिविल सर्विस में लेटरल रिक्रूटमेंट (सीधे भर्ती) के लिए UPSC का विज्ञापन वापस ले लिया. विपक्ष और NDA की सहयोगी पार्टी ‘लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास)’ ने इसमें आरक्षण की व्यवस्था नहीं होने की वजह से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई. नवंबर 2025 में सरकार को एक और कदम पीछे हटाना पड़ा. इसी तरह सरकार ने ‘संविधान (131वां संशोधन) बिल’ पेश न करने का फैसला किया, क्योंकि उसे कड़े राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ा था. खासकर पंजाब की पार्टियों ने इसका विरोध किया था. उनका तर्क था कि इस प्रस्ताव से राज्य का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा. वहीं, प्रधान का इस्तीफा इस बात का ताजा उदाहरण है कि सरकार ने दबाव के आगे घुटने टेक दिए. यह इस्तीफा NEET का प्रश्न-पत्र लीक होने और उसके बाद हुई कई आत्महत्याओं को लेकर हफ़्तों तक चले विरोध-प्रदर्शनों के बाद आया है. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन की मुख्य मांग प्रधान का इस्तीफा ही थी. प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कर दिया था कि प्रधान के इस्तीफे के बिना बातचीत आगे नहीं बढ़ पाएगी. इसके बाद काफी दबाव के बाद केंद्र सरकार ने उनकी यह मांग मान ली.

अतीत का संघर्ष
इतिहास का चक्र आज पूरी तरह से घूम चुका है. वर्तमान में छात्रों के तीखे विरोध का सामना कर रहे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान लगभग तीन दशक पहले (वर्ष 1997 में) खुद एक जुझारू छात्र नेता के रूप में पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे. वर्ष 1997 में ओडिशा में एक राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो गया था. उस समय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने करीब 1,500 छात्रों के साथ भुवनेश्वर में ओडिशा सचिवालय के बाहर एक उग्र प्रदर्शन का नेतृत्व किया था. उस दौरान तत्कालीन कांग्रेस सरकार की पुलिस ने छात्रों को तितर-बितर करने के लिए बर्बर लाठीचार्ज किया था. इस लाठीचार्ज में छात्र नेता धर्मेंद्र प्रधान को गंभीर चोटें आई थीं और उनके शरीर में फ्रैक्चर भी हो गए थे.
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News Source: PTI
