Indian Rupee: पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भारत सहित दुनिया को काफी प्रभावित किया है. ईरान और अमेरिका के बीच की इस तनातनी में दुनिया की एनर्जी सप्लाई के लिए अहम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित हो गया है. इस वजह से हजारों की संख्या में तेल और गैस लदे जहाज अपने देश जाने का इंतजार कर रहे हैं. इस खास समुद्री रास्ते के बंद हो जाने से दुनिया में तेल और गैस की कीमतों में तेजी दिख रही है. भारत और दुनिया के कई देशों में तेल और गैस के दाम बढ़ गए हैं. इस तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है. हालांकि, अभी तक ईरान और अमेरिका की इस टेंशन को खत्म होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल के बढ़ते दाम के बीच भारतीय करेंसी में लगातार कमजोरी देखी जा रही है.
जी हां, भारतीय रुपया बीते कुछ दिनों से हर रोज गिरावट का एक नया रिकॉर्ड बना रहा है. आज यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.35 के साथ रिकॉर्ड निचले स्तर पर कारोबार करते हुए बंद हुआ. दुनिया में 30 से अधिक देशों के साथ भारत रुपये में ट्रेड करता है. हालांकि, रुपये के आगे अमेरिका का डॉलर और चीन का युआन काफी मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं. आइए जानते हैं कि पश्चिम एशिया में जारी इस तनाव के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक संघर्ष में दुनिया में डॉलर और युआन की लड़ाई में कहां है रुपया. यहां हम जानेंगे कि डॉलर और युआन की तुलना में विश्व स्तर पर भारतीय करेंसी की क्या स्थिति है. शुरुआत हम भारतीय करेंसी के आज के कारोबारी सत्र के आंकड़ों के साथ करेंगे और इसका अंत हम डी-डॉलराइजेशन के साथ करेंगे.
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रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरकर 96.35 पर बंद हुआ रुपया
पश्चिम एशिया में जारी तनाव की वजह से भारत समेत दुनिया के कई देशों की स्थिति काफी प्रभावित हुई है. इससे सबसे अधिक नुकसान दुनिया के एनर्जी सेक्टर और इसकी सप्लाई को हुआ है. तेल और गैस को लेकर विश्व भर के लिए काफी अहम समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बाधित है और ईरान-अमेरिका के लिए जंग की जगह बन गई है. इस बीच कच्चे तेल के बढ़ते दाम, ग्लोबल अनिश्चितता और मजबूत डॉलर ने भारतीय करेंसी रुपया को प्रेशर में ला दिया है.
आज सोमवार को रुपया 96.19 पर खुला और डॉलर की तुलना में पिछले बंद भाव से 44 पैसे की गिरावट के साथ 96.25 पर आ गया. वहीं, आज मार्केट बंद के दौरान भारतीय करेंसी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर गिरकर 96.35 पर बंद हुई. अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में, रुपया 96.19 पर खुला, फिर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.39 पर और गिर गया, जो पिछले बंद भाव से 58 पैसे की गिरावट दर्ज करता है. बता दें कि शुक्रवार को रुपया 95.81 पर बंद हुआ था.

डॉलर और ब्रेटन वुड्स समझौता
सबसे पहले बात हम अमेरिकी डॉलर की करते हैं. अभी एक डॉलर की कीमत 96 रुपये से अधिक है. जब हम इतिहास के पन्ने को पलटते हैं तो मालूम होता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सन् 1944 में ब्रेटन वुड्स डील हुई. जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर स्थित ब्रेटन वुड्स में करीब 44 मित्र देशों के प्रतिनिधियों ने एक ऐतिहासिक मौद्रिक समझौता किया, जिसे ‘ब्रेटन वुड्स समझौता’ कहते हैं. इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ग्लोबल इकोनॉमी स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय ट्रेड को बढ़ावा देना था. इसके साथ ही एक्सचेंज रेट को स्थिर रखना था. इस डील के जरिए ही अमेरिकी डॉलर ग्लोबल इकोनॉमी का केंद्र बना.
हालांकि, करीब तीन दशक बाद 1970 में अमेरिकी इकोनॉमी पर प्रेशर पड़ने लगा. इस वजह से तब के अमेरिकी प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन ने इस डील यानी ‘ब्रेटन वुड्स समझौता’ के तहत डॉलर के बदले गोल्ड देने की व्यवस्था को खत्म कर दिया. उनके इस फैसले से ‘ब्रेटन वुड्स समझौता’ टूट गया और दुनिया में फ्लोटिंग विनिमय दर सिस्टम (Exchange Rate System) लागू हो गई.

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फ्लोटिंग विनिमय दर सिस्टम
फ्लोटिंग विनिमय दर सिस्टम (Floating Exchange Rate System) की बात करें तो यह एक ऐसी मौद्रिक प्रणाली है, जिसमें किसी देश की करेंसी का मूल्य ग्लोबल मार्केट में डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करता है. इसमें किसी सरकार और केंद्रीय बैंकों का सीधा हस्तक्षेप नहीं देखा जाता है. इस सिस्टम के जरिए अमेरिकी डॉलर भारत और चीन की करेंसी के मुकाबले मजबूत बना हुआ है. पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच दुनिया में अमेरिकी डॉलर की मांग भारतीय रुपया और चीन के युआन से काफी अधिक है. नियम कहता है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी करेंसी की मांग बढ़ती है तो उसका मूल्य भी बढ़ता है. वहीं, इसकी मांग या सप्लाई कम होने पर इसका मूल्य घटता है. फ्लोटिंग विनिमय दर सिस्टम के तहत अमेरिकी डॉलर के अलावा, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड और यूरो समेत अन्य कई करेंसी भी काम करती हैं.
भारतीय करेंसी से मजबूत चीनी युआन
डॉलर के बाद अब हम बात चीन की आधिकारिक करेंसी युआन की करेंगे. इसे रेनमिनबी भी कहा जाता है. इसे ग्लोबल लेवल पर CNY कोड से जाना और पहचाना जाता है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव के दौरान भारतीय करेंसी के मुकाबले चीनी युआन मजबूत है. एक युआन में करीब 14 रुपये होते हैं. युआन को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसियों में से एक माना जाता है. डॉलर की भूमिका को कम करते हुए अब चीन ग्लोबल ट्रेड के लिए अपनी करेंसी युआन को काफी बढ़ावा दे रहा है. चीन के अलावा रूस भी रूबल में कई देशों के साथ व्यापार कर रहा है. वहीं, भारत का भी यही हाल है. एक तरह से कह सकते हैं कि दुनिया में डॉलर की धाक को कम करने के लिए ये देश डी-डॉलराइजेशन की ओर बढ़ गए हैं. इनसे कई अन्य देश भी प्रभावित हो रहे हैं.
भारत के मुकाबले चीन के युआन के मजबूत होने पर नजर डालें तो इसकी एक बड़ी वजह दुनिया में इसके सामानों का अधिक मात्रा में एक्सपोर्ट है. जी हां, चीन विश्व में एक्सपोर्ट हब बन चुका है. यह ग्लोबल मार्केट में अपने सामानों को बेचता है और इस वजह से इसकी मुद्रा युआन और मजबूत होते जा रही है. कारण साफ है क्योंकि चीन अधिकतर ट्रेड अपनी करेंसी युआन में ही करता है. इसके अलावा चीन का विदेशी मुद्रा भंडार काफी स्थिर और मजबूत है.

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भारत में प्रबंधित फ्लोटिंग विनिमय दर सिस्टम
बात भारत की करें तो यहां प्रबंधित फ्लोटिंग विनिमय दर सिस्टम लागू है. इसका अर्थ है कि भारतीय करेंसी का मूल्य खासकर बाजार द्वारा तय किया जाता है. हालांकि, अधिक उतार-चढ़ाव होने के बीच इसे रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के पास यह अधिकार होता है कि वह बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है.
डॉलर से अधिक मूल्य का कुवैती दीनार
कुवैत की करेंसी दीनार (कुवैती दीनार) विश्व की सबसे अधिक मूल्य वाली करेंसी है. एक कुवैती दीनार करीब 3 अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य का है. वहीं, अगर इसको भारतीय करेंसी में बदलें तो एक कुवैती दीनार में 326 रुपये होंगे. जानकार बताते हैं कि कुवैती दीनार की मजबूती की वजह इस देश की तेल उत्पादन क्षमता और तेल की बिक्री है. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने कुवैत की तेल सप्लाई को भी प्रभावित किया है. डॉलर से करीब तीन गुना से अधिक भाव होने के बावजूद कुवैती दीनार ग्लोबल बाजार में डॉलर के मुकाबले कम दिखता है. इसकी एक वजह यह है कि कुवैत की जीडीपी अमेरिका की जीडीपी से बहुत कम है. इसके अलावा डॉलर दुनिया की प्रमुख वित्तीय संस्थाओं की आधिकारिक करेंसी भी है. दुनिया के अधिकतर देश डॉलर में ही ट्रेड करते हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक अधिकतर वित्तीय लेनदेन डॉलर में करते हैं. इस वजह से डॉलर काफी मजबूत करेंसी मानी जाती है.
रुपये की गिरावट क्यों?
रुपये की इस गिरावट पर मिराए एसेट शेयरखान के कमोडिटीज रिसर्च विश्लेषक अनुज चौधरी ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि मजबूत डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि के बीच रुपया नकारात्मक रुख के साथ कारोबार करेगा. मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव और विदेशी निवेशकों की निकासी भी रुपये पर दबाव डाल सकती है.” उन्होंने आगे कहा, “हालांकि, आरबीआई के किसी भी हस्तक्षेप और सोने-चांदी के आयात पर कुछ प्रतिबंधों से रुपये को निचले स्तर पर समर्थन मिल सकता है. डॉलर के मुकाबले 1 रुपये का भाव 96 से 96.60 के बीच रहने की उम्मीद है.”
वहीं, विदेशी मुद्रा व्यापारियों का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ी कीमतें, मजबूत अमेरिकी डॉलर और भू-राजनीतिक तनाव ने मिलकर उभरते बाजारों की करेंसी के लिए एक कठिन माहौल बना दिया है. इस वजह से रुपया अब स्पष्ट रूप से उस तनाव को दिखा रहा है. सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के एमडी अमित पबारी ने कहा, “अभी, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक अनिश्चितता और डॉलर का मजबूत होना रुपये के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं. हालांकि, बाजारों के लिए अच्छी खबर यह है कि सरकार और आरबीआई दोनों ने स्थिति को और बिगड़ने से पहले ही संभालने के लिए सक्रिय कदम उठाने शुरू कर दिए हैं.”
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30 से अधिक देशों में भारत का रुपये के साथ ट्रेड
भारत भी डॉलर के मुकाबले अपने रुपये की कीमत को स्थिर और अधिक सुधारना चाहता है. इसके लिए यह दुनिया के 30 से अधिक देशों के साथ अपनी करेंसी रुपये में ट्रेड करता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत इन देशों के साथ रुपये में ट्रेड कर रहा है- चीन, जापान, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, मिस्त्र, बांग्लादेश, जर्मनी, मालदीव, मॉरीशस, बेलारूस, फिजी, गुयाना, बेल्जियम, केन्या, म्यांमार, कजाकिस्तान, बोल्सवाना, आर्मेनिया और इंडोनेशिया आदि. इनके अलावा कई और भी देश हैं जिनके साथ भारत रुपये में व्यापार कर रहा है और कई के साथ करने की प्लानिंग में भी है.

डी-डॉलराइजेशन की ओर बढ़ता विश्व
चीन, रूस और भारत के अलावा दुनिया के कई ऐसे देश हैं, जो डॉलर की धाक को कम करने के लिए या दुनिया में व्यापार को लेकर डॉलर के विकल्प की तलाश में डी-डॉलराइजेशन की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. साल 2023 में ही भारत और रूस ने अपनी-अपनी करेंसी में ट्रेड करने की बात कह दी थी. दुनिया की ब्रिक्स कंट्री जिसमें भारत के अलावा चीन, रूस, ब्राजील और साउथ अफ्रीका हैं. इन सभी ने मिलकर अपनी-अपनी करेंसी में व्यापार करने की बात कही थी. इस वजह से ट्रंप काफी गुस्से में हुए थे और इन देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का भी ऐलान किया था. बता दें कि ग्लोबल इकोनॉमी में ब्रिक्स देशों की करीब 40 फीसदी की हिस्सेदारी है. इस वजह से दुनिया में डॉलर के विकल्प के रूप में काम तेजी से बढ़ने की संभावना है और फिर आप यह कह सकेंगे कि दुनिया डी-डॉलराइजेशन की ओर बढ़ रही है.
डी-डॉलराइजेशन को समझें तो इसका अर्थ होता है ग्लोबल ट्रेड, विदेशी मुद्रा भंडार समेत अन्य चीजों के लिए डॉलर का इस्तेमाल न करना और इसको कमजोर बनाना. डी-डॉलराइजेशन में दुनिया के तमाम देश डॉलर की जगह अन्य या अपनी करेंसी का इस्तेमाल करते हैं. कोई भी देश डी-डॉलराइजेशन के जरिए अपनी करेंसी पर निर्भरता बढ़ाता है और डॉलर की अपनी जरूरत को कम करता है. डी-डॉलराइजेशन को डॉलर के लिए खतरा माना जाता है.
