RBI MPC Meeting: दुनिया के कई क्षेत्रों में अभी कई प्रकार के तनाव जारी हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध हो या फिर अमेरिका-ईरान संघर्ष, इजरायल के द्वारा लेबनान व गाजा पर सैन्य कार्रवाई हो या फिर पश्चिम एशिया में ईरान के द्वारा खाड़ी देशों पर हमले. इस भू-राजनीतिक तनाव ने भारत सहित दुनिया के कई देशों को काफी प्रभावित किया है.
इन संघर्षों में से पश्चिम एशिया के संघर्ष ने दुनिया समेत भारत में भी महंगाई बढ़ा दी है. हालांकि, इन सभी चुनौतियों के बीच भारत की विकास दर दुनिया के अन्य देशों से काफी अच्छी है. आईएमएफ की रिपोर्ट के अनुसार, इमर्जिंग मार्केट और विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों में भारत की विकास दर को काफी तेजी के साथ बढ़ते हुए अनुमान लगाया गया है. 2026 के लिए देश की विकास दर 6.4 फीसदी और 2027 के लिए 6.7 फीसदी बताई गई है. वहीं, इस मामले में चीन (4.6 फीसदी और 4.1 फीसदी) और रूस (1.1 फीसदी) पीछे हैं.
हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव और महंगाई की चिंता भारत को भी है. यही कारण है कि देश के केंद्रीय बैंक यानी कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने इस साल लगातार तीसरी बार रेपो रेट में कोई कटौती नहीं की है और ना ही कोई बदलाव किया है.
आइए अब जानते हैं कि आरबीआई की एमपीसी मीटिंग के बाद आखिर रेपो रेट क्यों नहीं घटाया गया. इसका असर देश में लोन और EMI लेने वाले पर क्या होगा और इसके साथ ही जानेंगे कि पश्चिम एशिया तनाव के बीच RBI ने क्या कहा है. शुरुआत हम आरबीआई की एमपीसी मीटिंग से करेंगे.
आरबीआई की एमपीसी मीटिंग
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के द्वारा हर दो महीने पर Monetary Policy Committee (MPC) की बैठक होती है. इस बैठक की अध्यक्षता आरबीआई गवर्नर करते हैं. इस मौद्रिक नीति समिति बैठक (एमपीसी बैठक) में देश की ब्याज दरों खासकर के रेपो रेट और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए फैसले लिए जाते हैं.
इस बैठक पर शेयर बाजार समेत तमाम लोगों और बैंकों की नजरें होती हैं. बैंक समेत तमाम निवेशक और लोग यह देखते हैं कि आरबीआई की इस बैठक के बाद रेपो रेट में क्या कुछ बदलाव होता है. आइए अब पहले यह जान लेते हैं कि आखिरकार यह रेपो रेट क्या होता है.

क्या होता है रेपो रेट?
रेपो रेट की बात करें तो यह वह ब्याज दर है, जिसपर भारतीय रिजर्व बैंक देश के अन्य बैंकों को कर्ज देता है. मतलब कि बैंकों को जब भी पैसे की जरूरत होती है या इसकी कमी होती है तो वे आरबीआई से इसी रेपो रेट पर कर्ज लेते हैं.
रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं
उम्मीद के मुताबिक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बुधवार को इस फाइनेंशियल ईयर में लगातार तीसरी बार मुख्य ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया. बैंक ने वेस्ट एशिया में चल रहे संकट की वजह से एनर्जी की कीमतों में अनिश्चितता और सप्लाई में रुकावट के असर को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया.
मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए तीसरी द्वि-मासिक मॉनेटरी पॉलिसी का ऐलान करते हुए, आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) ने सर्वसम्मति से शॉर्ट-टर्म लेंडिंग रेट या रेपो रेट को न्यूट्रल रुख के साथ 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखने का फैसला किया है.
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इस साल रुपये में 7% की गिरावट
बता दें कि ब्याज दरों में यह ठहराव ऐसे समय में आया है जब कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) पर आधारित हेडलाइन रिटेल महंगाई दर जून में 4.38 प्रतिशत रही, जो RBI के 4 प्रतिशत के मीडियम-टर्म टारगेट से ज्यादा है. हालांकि, RBI ने मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए ग्रोथ का अनुमान थोड़ा बढ़ाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया, जबकि महंगाई का अनुमान घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया.
इसके अलावा, इस साल की शुरुआत से ही रुपया लगातार कमजोर हो रहा है. डॉलर के मुकाबले रुपया 95 और 96 के बीच बना हुआ है. कभी एशिया की ज्यादा स्थिर करेंसी में गिनी जाने वाली रुपया, अब इस साल उभरते बाजारों की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी में से एक बन गई है. इस पर महंगे तेल, कैपिटल आउटफ्लो, बढ़ते ट्रेड डेफिसिट और मजबूत होते अमेरिकी डॉलर का दबाव है. 2026 में अब तक रुपये में लगभग 7 प्रतिशत की गिरावट आई है और फरवरी के आखिर में ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से यह लगभग 6 प्रतिशत नीचे आया है.

एमपीसी की 62वीं बैठक
आरबीआई की एक प्रेस रिलीज में दी गई जानकारी के अनुसार, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) की 62वीं बैठक 3 से 5 अगस्त, 2026 के बीच हुई. इस बैठक में MPC के सदस्य डॉ. नागेश कुमार, सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और इंद्रनील भट्टाचार्य शामिल हुए.
इस प्रेस रिलीज में आगे बताया गया कि मैक्रो-इकोनॉमिक और फाइनेंशियल हालात में हो रहे बदलावों और भविष्य के अनुमानों की विस्तार से समीक्षा करने के बाद, MPC ने सर्वसम्मति से लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) के तहत पॉलिसी रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर ही बनाए रखने का फैसला किया.
नतीजतन, स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) रेट 5.00 प्रतिशत पर और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट तथा बैंक रेट 5.50 प्रतिशत पर बने हुए हैं. MPC ने न्यूट्रल रुख (neutral stance) को भी जारी रखने का फैसला किया.
दिसंबर 2025 में 5.25% हुआ था रेपो रेट
एमपीसी बैठक के बाद आज 5 अगस्त को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रेस वार्ता की. उन्होंने बताया कि रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है और इसे 5.25 फीसदी ही बरकरार रखा गया है. मतलब कि रेपो रेट न घटाया गया है और ना ही बढ़ाया गया है. इस साल में यह तीसरी बार है, जब रेपो रेट में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है.
हालांकि, साल 2025 में रेपो रेट चार बार घटाए गए थे. फरवरी 2025 में रेपो रेट 6.25 फीसदी था, जो अप्रैल 2025 में 6%, जून 2025 में 5.50 फीसदी और दिसंबर 2025 में 5.25 फीसदी हो गया.
आखिर क्यों नहीं घटा रेपो रेट?
अब सवाल यह है कि आखिरकार रेपो रेट को घटाया क्यों नहीं गया है. इसपर आरबीआई का कहना है कि दुनिया में कई मोर्चों पर और खासकर के पश्चिम एशिया में संघर्ष दिख रहा है और यह पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है. मतलब कि दुनिया में अभी हालात पूरी तरह से सामान्य नहीं हुए हैं. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज बाधित होने से कच्चे तेल की कीमत काफी प्रभावित हुई है. इससे महंगाई बढ़ी है.
अभी भी हर रोज कच्चे तेल की कीमत में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलती है. इसका कारण यह है कि ईरान और अमेरिका कभी भी एक-दूसरे के खिलाफ हमला शुरू कर दे रहे हैं और होर्मुज पहले की तरह स्वतंत्र रूप से पूरा नहीं खुल पा रहा है. इससे भारत समेत दुनिया के तमाम देशों को एनर्जी सप्लाई (तेल, गैस आदि) में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.
आरबीआई का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अन्य ग्लोबल चुनौतियों की वजह से सामान ढोने की लागत व रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ रहा है. यही कारण है कि रेपो रेट में कोई कटौती नहीं की गई है.

लोन और EMI पर क्या होगा असर?
रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होने से लोन और EMI सस्ती नहीं होने वाली हैं. हालांकि, जिस रेट से अभी लोन और ईएमआई मिल रही थी, उसी रेट पर ये आगे भी जारी रह सकती हैं. वैसे यह फैसला पूरे तरीके से बैंक पर निर्भर करता है कि वह इनके लिए अपनी ब्याज दरों में कोई कटौती करता है या नहीं.
रेपो रेट में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो आरबीआई से मिलने वाले लोन में बैंकों को पहले के मुकाबले अभी कोई खास फायदा नहीं होगा क्योंकि रेपो रेट पहले की तरह 5.25 फीसदी ही है. हालांकि, आने वाले समय में अगर रेपो रेट घटता है तो EMI और लोन सस्ते हो सकते हैं. वहीं, अगर रेपो रेट बढ़ता है तो EMI और लोन की ब्याज दरें भी बढ़ सकती हैं.
बता दें कि जब भी आरबीआई रेपो रेट कम करता है तो इससे बैंकों को कम ब्याज दर पर लोन मिल जाता है, जबकि बढ़ाता है तो बैंकों को आरबीआई से लोन लेने के लिए अधिक ब्याज चुकाने पड़ते हैं.
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पश्चिम एशिया तनाव के बीच RBI ने क्या कहा?
पश्चिम एशिया तनाव के बीच RBI ने कहा कि 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अब तक बाजार में तीव्र और लगातार उतार-चढ़ाव, मुद्रास्फीति की चिंताएं बनी हुई हैं और नीतिगत अपेक्षाएं बदलती रही हैं. पश्चिम एशिया में अस्थायी युद्धविराम से मिली राहत जुलाई में संघर्ष की पुनः शुरुआत के साथ ही तेजी से समाप्त हो गई.
लगातार मुद्रास्फीति के कारण कई केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं, जबकि अन्य सतर्क बने हुए हैं. उच्च ब्याज दर, फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख और एआई-संचालित उत्पादकता लाभों पर आधारित अपेक्षाकृत मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कारण अमेरिकी डॉलर में मजबूती आई है. वैश्विक शेयर बाजार अस्थिर बना रहा क्योंकि निवेशकों ने एआई-संबंधित शेयरों में अपने निवेश का पुनर्मूल्यांकन किया. पश्चिम एशिया में संघर्ष, अस्थिर तेल कीमतें, स्थिर मुद्रास्फीति की अपेक्षाएं और व्यवस्थित अर्थव्यवस्थाओं में कमजोर सार्वजनिक वित्त, भविष्य के परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करते हैं.
आरबीआई ने कहा कि अस्थिर वैश्विक आर्थिक वातावरण का घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर कुछ प्रभाव पड़ने की संभावना है. ऊर्जा की कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव अभी भी अधिक और अनिश्चित बना हुआ है.

वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था में मजबूती- आरबीआई
आरबीआई ने मौद्रिक नीति वक्तव्य में कहा है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती दिख रही है. प्रेस रिलीज में केंद्रीय बैंक ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी हुई है.
अब तक उपलब्ध उच्च आवृत्ति संकेतक 2026-27 की पहली तिमाही में घरेलू मांग में स्थिरता का संकेत देते हैं. निजी उपभोग मजबूत बना रहा. निर्माण, पूंजीगत वस्तुओं और बैंक ऋण से संबंधित विभिन्न संकेतकों से पता चलता है कि निवेश में मजबूती बनी हुई है. सेवाओं के निर्यात में स्वस्थ विस्तार के साथ-साथ माल निर्यात में भी सुधार होने से बाहरी मांग भी स्थिर रही.
आरबीआई ने कहा कि इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें पहली तिमाही में 7.0 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.4 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है. 2027-28 की पहली तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है.
महंगाई में गिरावट आने की उम्मीद- आरबीआई
आरबीआई ने कहा कि संक्षेप में कहें तो, यद्यपि शीर्ष मुद्रास्फीति (महंगाई) में वृद्धि का अनुमान है, यह मुख्य रूप से खाद्य और ईंधन की आपूर्ति में कमी के कारण है; यह व्यापक स्तर पर नहीं फैल रही है; मूल मुद्रास्फीति मध्यम बनी हुई है और तीसरी तिमाही में चरम पर पहुंचने के बाद इसमें गिरावट आने की उम्मीद है.
विकास दर, हालांकि मजबूत रहेगी, 2026-27 में इसे कम रहने की उम्मीद है. हालांकि, दक्षिण-पश्चिम मानसून, अल नीनो, भू-राजनीति और वैश्विक व्यापार नीति से संबंधित अनिश्चितताओं के कारण दृष्टिकोण अस्पष्ट है. किसी भी नीतिगत कार्रवाई से पहले, विशेष रूप से मुद्रास्फीति, उसके मार्ग और संरचना के संबंध में, अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है. आरबीआई ने इस प्रेस रिलीज में बताया कि एमपीसी की अगली बैठक 5 से 7 अक्टूबर, 2026 को निर्धारित है.
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