Share Market: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष खत्म होता नहीं दिख रहा है. बीते दिनों इन दोनों देशों के बीच युद्ध को लेकर अंतरिम समझौता हुआ था, लेकिन अब यह ठंडे बस्ते में जा चुका है और एक बार फिर से यूएस और ईरान एक-दूसरे के खिलाफ हमले शुरू कर दिए हैं.
पश्चिम एशिया में जारी तनाव स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को रुक-रुककर बाधित कर रहा है. इससे भारत समेत दुनिया के कई देशों को परेशानी और चुनौती हो रही है. इससे कच्चे तेल के दाम एक बार फिर से बढ़ने लगे हैं. इस बीच भारत के शेयर बाजार में काफी गिरावट दिखी है.
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार महीने में यह हफ्ता भारतीय शेयर बाजार के लिए काफी खराब हो रहा है. आइए जानते हैं कि बीते हफ्तें में बाजार की चाल क्या रही और घरेलू शेयर बाजार में इतनी गिरावट क्यों हुई है. इसकी शुरुआत हम बीते कारोबारी सत्र शुक्रवार व गुरुवार के दिन मार्केट की चाल से करेंगे.

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शुक्रवार को कैसी थी बाजार की चाल?
न्यूज एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी व्यापार शुल्कों को लेकर नई चिंताओं के बीच तेल की बढ़ती कीमतों के कारण निवेशकों के सतर्क रहने की बात सामने आई है. इसके चलते बाजार के बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी शुक्रवार को लगातार पांचवें सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए. विदेशी निवेशकों की ताजा निकासी और ब्लू-चिप एचडीएफसी बैंक में बिकवाली ने भी बाजार की भावना को प्रभावित किया.
शुक्रवार को 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 331.62 अंक या 0.43 प्रतिशत गिरकर 76,059.77 पर बंद हुआ था. दिन के दौरान इसमें 916.96 अंक या 1.20 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 75,474.43 पर पहुंच गया था. वहीं, 50 शेयरों वाला एनएसई निफ्टी 102.15 अंक या 0.43 प्रतिशत गिरकर 23,767.45 पर बंद हुआ था.
सेंसेक्स पैक से, इटरनल, महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फाइनेंस, भारती एयरटेल, एशियन पेंट्स और इंफोसिस प्रमुख रूप से पिछड़ने वाले शेयरों में शामिल थे. आईटी सेवा कंपनी इंफोसिस के शेयरों में 1 प्रतिशत की गिरावट आई, क्योंकि उसने लगातार जारी व्यापक आर्थिक अनिश्चितता के बीच अपने पूरे वर्ष के राजस्व पूर्वानुमान के ऊपरी स्तर को 1.5 प्रतिशत और 3 प्रतिशत के बीच सीमित कर दिया था. एचसीएल टेक, आईटीसी, एक्सिस बैंक और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज हरे निशान में कारोबार करने वाले शेयरों में शामिल थे.
गुरुवार को कैसी थी मार्केट की चाल?
अब बात गुरुवार की भी करते हैं. शेयर बाजार गुरुवार को लगातार चौथे दिन गिरावट के साथ बंद हुए थे. बेंचमार्क सेंसेक्स 363 अंक गिर गया था. 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 363.66 अंक या 0.47 प्रतिशत गिरकर एक महीने के निचले स्तर 76,391.39 पर बंद हुआ था. रिलायंस इंडस्ट्रीज, एचडीएफसी बैंक, भारती एयरटेल और बजाज फाइनेंस जैसे ब्लू-चिप शेयरों में गिरावट इसका मुख्य कारण रही. दिन भर में सूचकांक 603.07 अंक या 0.78 प्रतिशत गिरकर 76,151.98 के निचले स्तर पर पहुंच गया था.
वहीं, 50 शेयरों वाला एनएसई निफ्टी 126.65 अंक या 0.53 प्रतिशत गिरकर तीन सप्ताह के निचले स्तर 23,869.60 पर बंद हुआ था. इसमें रियल्टी, ऊर्जा और बैंकिंग क्षेत्र सबसे अधिक दबाव डालने वाले कारक साबित हुए.
सेंसेक्स बाजार में, अडाणी पोर्ट्स को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, इसके शेयरों में 2.26 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. बजाज फाइनेंस, इंटरग्लोब एविएशन, एक्सिस बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और टाटा स्टील भी गिरावट दर्ज करने वाले प्रमुख शेयरों में शामिल थे. महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, इटरनल और बजाज फिनसर्व हरे निशान में कारोबार करने वालों में शामिल थे.

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एफआईआई ने कितने करोड़ के बेचे शेयर?
विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने बुधवार और गुरुवार को करोड़ों रुपयों के शेयरों की बिकवाली भी की है. इससे भी मार्केट को झटका लगा है. एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने बुधवार को 819.20 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे. वहीं, इन्होंने गुरुवार को 2,999.23 करोड़ रुपये के शेयर बेचे. इससे भारतीय शेयर बाजार पर निगेटिव प्रभाव की भी बात कही गई.
सेंसेक्स और निफ्टी में करीब ढाई फीसदी की गिरावट
पिछले पांच कारोबारी दिनों में, भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई. बीएसई बेंचमार्क 2,091.68 अंक या 2.67 प्रतिशत गिर गया. वहीं, निफ्टी 566.85 अंक या 2.32 प्रतिशत गिर गया. वहीं, चार कारोबारी दिनों में, बीएसई बेंचमार्क 1,760.06 अंक या 2.25 प्रतिशत गिर गया था. निफ्टी 464.7 अंक या 1.90 प्रतिशत गिर गया था.
अब एशियाई बाजारों की बात करें तो शुक्रवार को दक्षिण कोरिया का KOSPI सूचकांक 5.72 प्रतिशत गिर गया था. जापान का Nikkei 225, शंघाई का SSE कंपोजिट सूचकांक और हांगकांग का Hang Seng सूचकांक भी गिरावट के साथ बंद हुए थे. वहीं, यूरोप के बाजारों में तेजी देखी गई थी. अमेरिकी बाजार गुरुवार को गिरावट के साथ बंद हुए थे.

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव और संघर्ष बढ़ने के बाद कच्चे तेल की सप्लाई में काफी दिक्कतें आईं. इससे कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर से बढ़ोतरी देखी गई. शुक्रवार को वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड में 4.52 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 98.32 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. मतलब कि एक बैरल कच्चे तेल का भाव 98.32 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गया है.
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भारत के विदेशी मुद्रा में बढ़त
एक ओर जहां भारतीय शेयर बाजार को झटका लगा है, वहीं दूसरी ओर देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, 17 जुलाई को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 1.08 अरब अमेरिकी डॉलर बढ़कर 676.237 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया. पिछले रिपोर्टिंग सप्ताह में, कुल विदेशी मुद्रा भंडार 964 मिलियन अमेरिकी डॉलर बढ़कर 675.157 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया था.
मध्य पूर्व संघर्ष शुरू होने से पहले, इस वर्ष 27 फरवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 728.494 अरब अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था, जिसके कारण रुपये पर दबाव पड़ने से कई हफ्तों तक गिरावट आई और आरबीआई को डॉलर की बिक्री के माध्यम से विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 मई से शुरू होकर देशवासियों से विदेशी यात्रा कम करके, ईंधन का उपयोग सीमित करके और एक वर्ष के लिए सोने की खरीद से परहेज करके विदेशी मुद्रा का संरक्षण करने की कई सार्वजनिक अपीलें भी की हैं.
केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 17 जुलाई को समाप्त हुए सप्ताह के लिए, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां, जो भंडार का एक प्रमुख घटक हैं, 4.549 बिलियन अमेरिकी डॉलर बढ़कर 551.057 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गईं. डॉलर के संदर्भ में व्यक्त की गई विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में विदेशी मुद्रा भंडार में रखी गई गैर-अमेरिकी मुद्राओं, जैसे कि यूरो, पाउंड और येन के मूल्य में वृद्धि या कमी के प्रभाव शामिल हैं.
आरबीआई ने बताया कि सप्ताह के दौरान सोने के भंडार का मूल्य 3.48 अरब अमेरिकी डॉलर घटकर 101.749 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया. शीर्ष बैंक ने बताया कि विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) 44 मिलियन अमेरिकी डॉलर बढ़कर 18.67 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गए हैं. वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के आंकड़ों के अनुसार, रिपोर्टिंग सप्ताह के अंत में आईएमएफ के साथ भारत की आरक्षित स्थिति 32 मिलियन अमेरिकी डॉलर घटकर 4.761 बिलियन अमेरिकी डॉलर रह गई.
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बाजार में गिरावट की क्या हैं वजहें?
भारतीय शेयर बाजार में गिरावट को लेकर एक्सपर्ट्स ने अपनी-अपनी राय दी है. न्यूज एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन ट्रेडिंग और वेल्थ टेक फर्म एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने कहा, “अमेरिकी और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि और वैश्विक एआई खर्च पर नई चिंताओं के कारण निवेशकों की भावना पर दबाव पड़ने से भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट जारी रही.”
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के अनुसंधान प्रमुख विनोद नायर ने कहा, “वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में और अधिक व्यवधान की आशंकाओं के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने के साथ, निवेशकों का मनोबल कमजोर बना रहा क्योंकि बाजारों ने मुद्रास्फीति के जोखिमों और कॉर्पोरेट मार्जिन का पुनर्मूल्यांकन किया.”

लगातार पांचवें सत्र में गिरावट- एक्सपर्ट
ऑनलाइन ट्रेडिंग और वेल्थ टेक फर्म एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने कहा, “मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी व्यापार शुल्क को लेकर नई चिंताओं के बीच निवेशकों के सतर्क रुख के चलते भारतीय शेयर बाजारों में लगातार पांचवें सत्र में गिरावट दर्ज की गई. एशियाई बाजारों में कमजोरी ने जोखिम से बचने के माहौल को और मजबूत किया, जिससे ऊर्जा बाजारों में दबाव कम होने के संकेतों के बावजूद व्यापक स्तर पर बिकवाली देखने को मिली.”
रेलिगेयर ब्रोकिंग लिमिटेड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अनुसंधान, अजीत मिश्रा ने कहा, “भू-राजनीतिक चिंताओं, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और चुनिंदा बड़ी कंपनियों के निराशाजनक नतीजों के बीच, बाजारों में शुक्रवार को उतार-चढ़ाव देखने को मिला और लगातार पांचवें सत्र में गिरावट के साथ कारोबार बंद हुआ.” उन्होंने आगे कहा कि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के निशान से ऊपर पहुंच गईं, जिससे मुद्रास्फीति और घरेलू अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएं फिर से बढ़ गईं और निवेशकों का मनोबल कमजोर बना रहा.
निकट भविष्य में कैसा रहेगा बाजार का माहौल?
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के अनुसंधान प्रमुख विनोद नायर ने कहा, “निकट भविष्य में बाजार का माहौल दबाव में रहने की संभावना है, क्योंकि तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि से प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतकों और विकास की गति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.”
उन्होंने आगे कहा, “वाशिंगटन द्वारा आयात पर लगाए गए नए शुल्कों ने निर्यात-प्रधान अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक और बाधा खड़ी कर दी है. प्रौद्योगिकी-प्रधान बाजारों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है, क्योंकि उच्च ब्याज दरें विकास को प्रभावित कर रही हैं और निवेशक उभरते बाजारों में अपने केंद्रित निवेश को विविधतापूर्ण बनाने के लिए अन्य अवसरों की तलाश कर रहे हैं.”
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