NEET Exam: सपनों की कोई सीमा नहीं होती है. उम्र भी आड़े नहीं आती है. इस बात को सच कर दिखाया है तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के वेलंकन्नी के रहने वाले 51 वर्षीय ए. सुरेश कुमार ने. दो पीएचडी (PhD) और एमबीए (MBA) जैसी उच्च डिग्रियां हासिल करने के बाद भी उन्होंने मेडिकल डॉक्टर बनने के अपने 34 साल पुराने सपने को नहीं छोड़ा. सुरेश कुमार ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक NEET पास की. उन्हें उनके घर के पास स्थित नागपट्टिनम मेडिकल कॉलेज में सीट मिल गई है.
नौकरी छोड़कर की पढ़ाई
सुरेश कुमार का डॉक्टर बनने का सपना साल 1992 में 12वीं पास करने के बाद से ही था. हालांकि, पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उस समय वे ऐसा नहीं कर सके. उन्होंने फार्मेसी चुनी और फार्मास्युटिकल व डायग्नोस्टिक इंडस्ट्री में एक सफल करियर बनाया. इसके बावजूद उन्हें हमेशा महसूस होता था कि उनका असली मकसद मेडिकल क्षेत्र में ही है. उनके इस सपने को तब नई उड़ान मिली, जब सुप्रीम कोर्ट ने नीट परीक्षा के लिए अधिकतम उम्र सीमा की बाध्यता को हटा दिया. इससे प्रेरित होकर सुरेश कुमार ने नौकरी के साथ-साथ रात में कड़ी पढ़ाई शुरू की. वे विषय से जुड़े रहने के लिए अपने बेटे को भी बायोलॉजी पढ़ाते थे. इस सफर में उनकी पत्नी ने उनका पूरा साथ दिया और उन्हें नौकरी छोड़कर पूरी तरह पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने की हिम्मत दी.
सपनों की कोई उम्र नहीं
अब 51 साल की उम्र में कम उम्र के सहपाठियों के साथ मेडिकल की पढ़ाई शुरू करने को लेकर वे बेहद उत्साहित हैं. उनकी यह कहानी साबित करती है कि अगर जज्बा सच्चा हो, तो सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती. सुरेश कुमार ने स्पेशल कोटे के ज़रिए क्वालिफ़ाई किया. एक पुराने सड़क हादसे में उन्हें ऐसी चोट लगी थी जिससे उनकी शारीरिक गतिशीलता तो सीमित हो गई, लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा. उनका कहना है कि वे कम उम्र के छात्रों के साथ पढ़ने के लिए उत्साहित हैं और मानते हैं कि उम्र सिर्फ़ एक नंबर है. उन्होंने कहा कि वे अपनी किसी अधूरी इच्छा के पछतावे के साथ दुनिया से नहीं जाना चाहते थे. कुमार ने कहा कि 51 साल की उम्र में भी मैं शारीरिक रूप से काफ़ी फ़िट हूं. मेरा मानना है कि उम्र सिर्फ़ एक नंबर है. उनका ध्यान अपनी फ़िटनेस और पढ़ाई पर है और वे युवा छात्रों के साथ जुड़ने के लिए उत्सुक हैं.
पेशेवर और पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी निभाया
कुमार का कहना है कि NEET परीक्षा की उनकी तैयारी एक अनुशासित प्रक्रिया थी, जिसमें उन्होंने अपनी पेशेवर और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के साथ पढ़ाई में संतुलन बनाए रखा. काम से लौटने के बाद वे अपना समय पढ़ाई में लगाते थे, और अक्सर रात 10 बजे से आधी रात तक पढ़ते थे. उनकी पत्नी उन्हें सुबह 4 बजे जगाती थीं और नाश्ता-पानी देती थीं. अपनी तैयारी को परखने के लिए उन्होंने पिछले सालों के प्रश्न-पत्रों का अभ्यास किया और 2023 से 2025 तक हर साल अपनी प्रगति का मूल्यांकन किया, जब तक कि उन्हें परीक्षा पास करने की अपनी क्षमता पर भरोसा नहीं हो गया. पहली बार असफल होने के बाद उन्होंने दूसरी बार अंग्रेज़ी भाषा चुनी. ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि उन्हें इस भाषा में 34 साल का पेशेवर अनुभव था और यह फ़ैसला सफल रहा.
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News Source: PTI
