Main Vaapas Aaunga: फिल्म बनाना आसान काम नहीं है. एक फिल्म के पीछे सैकड़ों लोगों की मेहनत, कई महीनों की तैयारी और अक्सर दो-तीन साल का लंबा सफर होता है. लेकिन जब रिलीज के बाद लोग फिल्म को पसंद नहीं करते, तो पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है. कुछ फिल्मों को तो पहले हफ्ते में ही सिनेमाघरों से हटने का खतरा हो जाता है. ऐसे माहौल में इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आउंगा’ की कहानी किसी फिल्मी ट्विस्ट से कम नहीं है. रिलीज के पहले दिन करीब 1 करोड़ रुपये की कमाई करने वाली इस फिल्म ने कुछ ही हफ्तों में रफ्तार पकड़ ली. 6 जुलाई तक ‘मैं वापस आउंगा’ ने बॉक्स ऑफिस पर 89 करोड़ रुपये से ज्यादा का बिजनेस पार कर लिया. 31 जुलाई को फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 50 दिन भी पूरे किए. इस सफर ने फिल्म को सिर्फ हिट का तमगा नहीं दिलाया, बल्कि ‘मैं वापस आउंगा’ ने इंडस्ट्री को मार्केटिंग के तीन बहुत जरूरी सबक भी दे दिए.
पहला सबक
आज फिल्म प्रमोशन का मतलब अक्सर ट्रेलर, टीजर, सोशल मीडिया पोस्ट और बड़े-बड़े होर्डिंग्स रह जाते हैं. मानो एक ही मार्केटिंग फॉर्मूला हर फिल्म पर लगाया जा सकता है. लेकिन ‘मैं वापस आउंगा’ के साथ ये फॉर्मूला काम नहीं आया. फिल्म की कहानी पंजाब के विभाजन की यादों, रिश्तों और बिछड़ने के दर्द के इर्द-गिर्द घूमती है. 17 साल के कीनू और जिया की कहानी से शुरू होकर फिल्म बुजुर्ग कीनू की यादों तक पहुंचती है. इसके लिए नसीरुद्दीन शाह और वेदांग रैना ने अपने-अपने किरदारों में जान डाल दी. लेकिन समस्या ये थी कि फिल्म की असली खूबसूरती लोगों तक सही तरीके से पहुंच ही नहीं पाई. यही वजह है कि फिल्म का शुरुआती कलेक्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ. तब इम्तियाज अली ने डिजिटल कैंपेन के पीछे भागने के बजाय सीधे दर्शकों से मिलने का फैसला किया. यही बदलाव गेमचेंजर साबित हुआ.
दूसरा सबक
किसी फिल्म की मार्केटिंग का सबसे जरूरी काम ये है कि दर्शक को साफ समझ आए कि उसे फिल्म क्यों देखनी चाहिए. अगर पोस्टर कुछ और कहे, ट्रेलर कुछ और दिखाए और फिल्म कुछ बिल्कुल अलग निकले, तो दर्शक कन्फ्यूज हो जाता है. ‘मैं वापस आउंगा’ की शुरुआती मार्केटिंग में यही कमी नजर आई. फिल्म की इमोशनल कहानी और उसका असका असली अट्रैक्शन लोगों तक ठीक से पहुंचा ही नहीं. इसके बाद टीम ने तरीका बदला. इम्तियाज अली और उनकी टीम ने अलग-अलग शहरों में जाकर दर्शकों के साथ थिएटर में फिल्म देखी. उन्होंने इंदौर, दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे शहरों में 50 से ज्यादा स्क्रीनिंग में हिस्सा लिया. फिल्म खत्म होने के बाद लोगों से बातचीत हुई. किसी ने अपनी कहानी सुनाई, कोई इमोशनल हो गया तो किसी ने अपनी यादें शेयर कीं. इन पलों को सोशल मीडिया पर लोगों ने खुद शेयर किया. खास बात ये थी कि इसके लिए किसी बड़े डिजिटल एजेंसी कैंपेन का सहारा नहीं लिया गया. यानी लोग अब खुद फिल्म के प्रमोटर बन गए.
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तीसरा सबक
‘मैं वापस आउंगा’ की सबसे बड़ी सीख यही है कि अगर फिल्म में दम है, तो मुश्किल समय में उसे बचाने के लिए नए रास्ते ढूंढ़ने चाहिए. फिल्म की टीम पहले दिन के खराब कलेक्शन के बाद निराश होकर बैठ सकती थी. लेकिन इसके बजाय टीम ने दर्शकों से सीधे जुड़ने का फैसला किया. इम्तियाज अली का थिएटर-टू-थिएटर जाना सिर्फ प्रमोशन नहीं था. ये दर्शकों को फिल्म का हिस्सा बनाने की कोशिश थी. फिर इसका असर भी दिखाई दिया. लोगों का इमोशनल रिएक्शन सोशल मीडिया पर फैलता गया और धीरे-धीरे फिल्म का कलेक्शन बढ़ता गया. हालांकि, यहां एक बात सबसे जरूरी है कि, अच्छी मार्केटिंग खराब फिल्म को हमेशा नहीं बचा सकती. फिल्म में कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे दर्शक जुड़ सके.
सबसे बड़ा सबक
फिल्म इंडस्ट्री के लिए ‘मैं वापस आउंगा’ एक जरूरी याद दिलाती है कि मार्केटिंग सिर्फ पोस्टर, ट्रेलर और सोशल मीडिया विज्ञापन का नाम नहीं है. असली मार्केटिंग ये समझना है कि दर्शक कौन है, वो क्या देखना चाहता है और उससे सीधे कैसे जुड़ा जा सकता है. इम्तियाज अली ने दर्शकों पर भरोसा किया और लोगों ने बदले में फिल्म को दूसरा मौका दिया. यही वजह है कि ‘मैं वापस आउंगा’ की कहानी सिर्फ बॉक्स ऑफिस की वापसी नहीं, बल्कि ये सबक भी है कि फिल्म अच्छी हो, उसकी बात साफ हो और उसे लोगों तक पहुंचाने का तरीका थोड़ा अलग हो, तो दर्शक कभी-कभी खुद सबसे बेहतरीन मार्केटिंग टीम बन जाते हैं.
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