Chumbak: OTT की दुनिया में इन दिनों कहानी शुरू होते ही कोई मर्डर हो जाता है, कोई राज खुल जाता है, कोई विलेन दुनिया खत्म करने निकल पड़ता है. फिर ऑडियन्स बेचारी ये सोचती रह जाती है कि भाई, आराम से भी कुछ देख सकते हैं क्या? ऐसे समय में नेटफ्लिक्स की नई सीरीज ‘चुंबक’ बिल्कुल उस पुराने दोस्त की तरह आती है, जिसके साथ बैठकर आपको कुछ समझने की जरूरत नहीं पड़ती. बस बैठिए, देखिए और हंसिए. अगर आपको ‘खिचड़ी’ की अतरंगी फैमिली और ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ की नोकझोंक देखकर मज़ा आता था, तो ‘चुंबक’ आपको उसी पुराने टीवी वाले आराम का नया OTT पता देती है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कहानी एक परिवार के ड्रॉइंग रूम की नहीं है, बल्कि पूरे मोहल्ला ही हीरो है. मुंबई के चेंबूर में चुंबक नाम की कोलॉनी में कई परिवार एक-दूसरे के इतने करीब रहते हैं कि किसी के घर की बात दूसरे घर तक पहुंचने में शायद व्हाट्सएप से भी कम टाइम लगता है. यहां किसी की लड़ाई सिर्फ उसकी नहीं रहती, किसी की परेशानी पूरे मोहल्ले की मीटिंग बन जाती है. इसके अलावा कोई गायब हो जाए तो पूरा पड़ोस CID मोड में आ जाता है. यानी मामला सीधा है, एक घर में शुरू हुआ ड्रामा, कुछ ही मिनट में पूरे मोहल्ले का प्राइम टाइम बन जाता है.

‘खिचड़ी’ और ‘साराभाई’ वाला मज़ा
‘खिचड़ी’ की सबसे बड़ी खूबी थी कि एक फैमिली ही इतनी अचीब थी कि अलग से कहानी बनाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. प्रफुल्ल की गलतफहमियां, हंसा की मासूमियत और परिवार के बाकी सदस्यों की अजीबोगरीब हरकतें मिलकर ऐसा कॉमेडी शो बनाती थीं, जिसे देखने के लिए किसी बड़े ट्विस्ट की जरूरत नहीं थी. फिर आया ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’, जहां परिवार के अंदर की क्लास, स्टाइल, सोच और संस्कार ही कॉमेडी का सबसे बड़ा हथियार बन गए. माया साराभाई का हर किसी को जज करना और इंदिरवदन का अपनी ही दुनिया में मस्त रहना, ये किरदार खुद में कहानी थे. अब नेटफ्लिक्स की ‘चुंबक’ इसी फॉर्मूले को घर की चारदीवारी से निकालकर कॉलोनी के कॉरिडोर में ले जाती है. यहां हर परिवार अपनी जगह एक कहानी है. हर पड़ोसी दूसरे की कहानी में बिना बुलाए एंट्री मारने के लिए तैयार है. कोई दरवाजा बंद कर ले तो सवाल उठता है कि आखिर अंदर चल क्या रहा है. कोई ज्यादा देर तक बाहर न दिखे तो बातें शुरू हो जाती हैं. वहीं, अगर कोई गायब हो जाए, तो समझिए कॉलोनी की इमरजेंसी मीटिंग पक्की.
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यहां कैरेक्टर ही जोक हैं
‘चुंबक’ की कॉमेडी का सबसे दिलचस्प हिस्सा ये है कि यहां किरदार जबरदस्ती मजाक नहीं करते. वो बस अपने नेचर के हिसाब से बिहेव करते हैं. इन्हें देखकर हंसी अपने आप निकल आती है. हेली शाह की ट्विंकल ओबरॉय ऐसी ही एक किरदार हैं. उनके रिएक्शन्स काफी हद तक पता लग जाते हैं, लेकिन असली मजा यही देखने में है कि वो किसी सिचुएशन तक कैसे पहुंचती हैं. फिर आते हैं सुमित राघव पर, जिन्हें लोग ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ में साहिल के रोल में पहले ही देख चुके हैं. यहां वो धर्मेंद्र केजरीवाल के रोल में हैं. उनके और अनंत वी जोशी के फ्रेडी के बीच की बातचीत में वही पुरानी दोस्ती वाली खिंचाई दिखाई देती है. यानी दो लोग एक-दूसरे को इतना जानते हैं कि सामने वाला कुछ कहे उससे पहले ही उसका मजाक तैयार होता है.
दोनों की बॉन्डिंग कुछ वैसी है जैसे स्कूल के वो दो बैकबेंचर दोस्त, जिन्हें क्लास में पढ़ाई से ज्यादा दूसरों की टांग खींचने में दिलचस्पी होती थी. इसके बाद बात करते हैं देवेन भोजानी के कुकु मर्चेंट यानी कुकु अंकल की. इनके गायब होने की घटनाएं पूरी कॉलोनी को परेशान करने के साथ-साथ हंसी का नया रीजन भी बन जाती हैं. यहां कॉमेडी इस बात से कम निकलती है कि किरदार क्या मजेदार बात कह रहा है, बल्कि ज्यादा इस बात से कि वो इंसान जैसा है, वैसा क्यों है.

डिक्शनरी में पड़ी प्राइवेसी
भारत की कॉलोनियां कॉमेडी के लिए इतनी शानदार जगह क्यों हैं? क्योंकि यहां प्राइवेसी एक ऐसा शब्द है, जिसे पड़ोसी सिर्फ सुनते हैं, मानते नहीं. आपके घर में क्या बन रहा है, किससे झगड़ा हुआ, कौन कब आया, कौन कब गया, पड़ोसी को सब पता होता है. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि आपके घर के CCTV कैमरे की जरूरत नहीं, पड़ोस की बालकनी काफी है. इसी वजह से ‘तारक मेहता का उल्चा चश्मा’ जैसे शो इतने लंबे टाइम से ऑडियन्स के बीच टिके हुए हैं. पड़ोस में रहने वाले अलग-अलग लोग जब रोजमर्रा की छोटी-छोटी प्रोब्लम्स में एक-दूसरे को घसीटते हैं, तो सिंपल सिचुएशन भी कॉमेडी में बदल जाती है. ‘चुंबक’ भी इसी देसी मोहल्ला यूनिवर्स में खेलती है. यहां किसी एक परिवार की प्रोब्लम ज्यादा देर तक निजी नहीं रहती. एक घर की बहस दूसरे घर की चर्चा बनती है और फिर तीसरे घर का मैंबर उसमें अपनी राय लेकर पहुंच जाता है. मतलब, मोहल्ले में कोई भी कहानी अकेली नहीं रहती.
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थोड़ा घर जैसा कंटेंट
आज OTT पर कंटेंट की कोई कमी नहीं है. क्राइम थ्रिलर है, मर्डर मिस्ट्री है, रिवेंज ड्रामा है, डार्क कॉमेडी है, रोमांस है और ऐसे-ऐसे फैमिली सीक्रेट्स हैं कि कई बार परिवार देखने के बाद लगता है कि पड़ोसी ही अच्छे थे. पर ‘चुंबक’ इस ट्रेंड से अलग चलती है. यहां कोई दुनिया बचाने नहीं निकला. लोग बस अपनी जिंदगी जी रहे हैं. छोटी-छोटी समस्याएं हैं, रिश्तों की खटपट है, पड़ोसियों की दखलअंदाजी है और उन्हीं चीजों को इतना बढ़ा दिया जाता है कि वो मनोरंजन बन जाती हैं. वैसे, शायद यही इस शो की सबसे बड़ी खूबी भी है. क्योंकि हर कहानी को बड़ा बनाने के लिए मर्डर, साजिश या कोई बड़ा सस्पेंस जरूरी नहीं होता. कभी-कभी पड़ोसी का जरूरत से ज्यादा सवाल पूछ लेना ही काफी ड्रामा क्रिएट कर देता है.
पुराने जमाने की याद
अगर आपने ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ देखा है, तो देवेन भोजानी को ‘चुंबक’ में देखना अपने आप में एक छोटी सी ट्रीट है. ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ में वो दुश्यंत बने थे, जिनका टेक्नोलॉजी के लिए जरूरत से ज्यादा प्यार अक्सर प्रोब्लम को हल करने के बजाय और उलझा देता था. इसके अलावा वो ‘बा बहू और बेबी’ जैसे फेमस टीवी शो का भी हिस्सा रह चुके हैं. ‘चुंबक’ में भोजानी कुकू मर्चेंट का किरदार निभा रहे हैं. कुकु अंकल एक रिटायर्ड पायलट हैं और उन्हें भूलने की बीमारी है. उनकी याददाश्त की प्रोब्लम उनकी पत्नी रजनी को परेशान करती है. रजनी का किरदार इस सीरीज में नीना गुप्ता निभा रही हैं.

पूरी कॉलोनी बनी स्टार
‘चुंबक’ की कहानी सिर्फ एक या दो कैरेक्टर्स के कंधे पर नहीं टिकी है. इसका पूरा मजा पूरी टीम से आता है. इसमें नीना गुप्ता, देवेन भोजानी, सुमीत राघवन, सुमीत व्यास, मानसी पारेख, संदीपा धर, अर्जुन बिजलानी, हेली शाह, अमायरा दस्तूर और डेल्नाज़ ईरानी जैसे कलाकार हैं. इतने सारे कैरेक्टर्स वाले शो में सबसे जरूरी चीज होती है कि उनकी एनर्जी को समझना. कोई एक कलाकार हर सीन में कॉमेडी करने की कोशिश करे तो मजा खराब हो सकता है. हालांकि, चुंबक में इसे बहुत अच्छी तरह से बैलेंस किया गया है. मिसाल के तौर पर ट्विंकल के पालतू अजगर लिंग्विन की मौत वाला ट्रैक. सुनने में मामला थोड़ा अजीब है, लेकिन सीन की कॉमेडी इस बात में है कि अलग-अलग किरदार उस घटना पर किस तरह रिएक्शन देते हैं. यही टीम कॉमेडी का खेल है.
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OTT पर चलेगा पुराना फॉर्मूला?
यही ‘चुंबक’ के सामने सबसे बड़ा सवाल है. जेडी मजेठिया और आतिश कपाड़िया उस दौर से आते हैं जब टीवी पर शो देखने का मतलब था परिवार के साथ बैठकर कुछ देखना. एपिसोड खत्म हुआ तो अगले हफ्ते का इंतजार. घर में शो की चर्चा और फिर अगले एपिसोड में वापसी. पर OTT ने ये पूरा सिस्टम बदल दिया है. अब दर्शक चाहे तो एक रात में पूरा सीजन खत्म कर सकते हैं. कोई शो रिलीज के दिन देखता है, कोई 6 महीने बाद. नई पीढ़ी के कई दर्शकों ने शायद ‘खिचड़ी’ या ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ को उतना नहीं देखा होगा जितना पुरानों ने. इसलिए ‘चुंबक’ सिर्फ नॉस्टेल्जियाके सहारे नहीं चल सकती. उसे अपने दम पर मजेदार होना पड़ेगा. यही जगह है जहां शो का फॉर्मूला काम करता है. क्योंकि मजेठिया और कपाड़िया की कॉमेडी सिर्फ पुराने किरदारों या पुराने रेफरेंस पर डिपेंड नहीं रही. उनकी ताकत हमेशा रिश्तों की छोटी-छोटी हरकतों में रही है. जैसे, वो रिश्तेदार जो जरूरत से ज्यादा बोलता है. वो दोस्त जो हर बात को सीरियस लेता है. वो पड़ोसी जिसे आपके घर की हर बात पता है और वो परिवार का सदस्य जो समस्या सुलझाने आता है और जाते-जाते समस्या को दोगुना कर देता है. ‘चुंबक’ इसी पुराने फॉर्मूले को नए पते पर लेकर आई है.

देखें या नहीं?
‘चुंबक’ को देखते हुए ऐसा लगता है कि OTT पर हर बार भारी-भरकम कहानी की जरूरत नहीं है. कभी-कभी हमें बस कुछ ऐसे किरदार चाहिए होते हैं, जिनके साथ बैठकर लगे कि ये लोग हमारे आसपास ही रहते हैं. ये शो ‘खिचड़ी’ या ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ बनने की कोशिश नहीं करता. बल्कि उनके उस पुराने कंफर्ट फोर्मूले को अपने तरीके से आगे ले जाता है. ऐसे में अगर इस वीकेंड आपका मन किसी मर्डर मिस्ट्री में सुराग ढूंढने का नहीं है, किसी विलेन की साजिश समझने का नहीं है और बस ऐसी कहानी चाहिए जिसमें लोग बिना वजह एक-दूसरे की जिंदगी में घुसते रहें, तो चुंबक कलोनी में आपका स्वागत है. वैसे भी यहां नियम बहुत आसान है. आपकी समस्या आपकी नहीं है, वो पूरे मोहल्ले की है. अगर कोई गायब हो गया, तो भाई साहब, फिर तो पूरा सीजन बनता है.
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