Home Latest News & Updates बर्फ में छिपे कणों ने खोला ब्रह्मांड का राज, फ्रांसिस हाल्ज़ेन को 2026 का नोबेल; जानें न्यूट्रिनो की कहानी

बर्फ में छिपे कणों ने खोला ब्रह्मांड का राज, फ्रांसिस हाल्ज़ेन को 2026 का नोबेल; जानें न्यूट्रिनो की कहानी

by Preeti Pal 7 October 2026, 4:51 PM IST (Updated 7 October 2026, 4:59 PM IST)
7 October 2026, 4:51 PM IST (Updated 7 October 2026, 4:59 PM IST)
बर्फ के नीचे छिपे कणों ने खोला ब्रह्मांड का राज, फ्रांसिस हाल्ज़ेन को 2026 का नोबेल; जान न्यूट्रिनो की पूरी कहानी

Nobel Prize 2026: अगर आपसे पूछा जाए कि ब्रह्मांड के बारे में हमें जानकारी कैसे मिलती है, तो शायद आपका जवाब होगा, टेलीस्कोप से. लेकिन वैज्ञानिकों ने अब ब्रह्मांड को समझने का एक ऐसा रास्ता ढूंढ़ लिया है, जिसमें रोशनी नहीं, बल्कि बहुत छोटे और रहस्यमयी कण मदद करते हैं. इन कणों का नाम है, न्यूट्रिनो. वैसे भी, ब्रह्मांड जितना खूबसूरत है, उतना ही रहस्यमयी भी. हम रात के आसमान में चांद, तारे और कभी-कभी चमकते ग्रह देखते हैं, लेकिन अंतरिक्ष में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो हमारी आंखों से दिखाई ही नहीं देतीं. वैज्ञानिक सालों से ब्रह्मांज को समझने की कोशिश कर रहे हैं. अब इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मिली है. दरअसल, प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्ज़ेन को 2026 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया है. उन्हें ये सम्मान आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्ज़र्वेटरी में उनके योगदान और अंतरिक्ष से आने वाले हाई एनर्जी न्यूट्रिनो की स्टडी के लिए मिला है. खास बात ये है कि जिस वैज्ञानिक प्रयोगशाला से ये काम हुआ है, वो किसी बड़े शहर की बिल्डिंग में नहीं, बल्कि धरती के सबसे ठंडे इलाकों में से एक अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे मौजूद है. यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि न्यूट्रिनो को पकड़ना और उनकी स्टडी करना बहुत मुश्किल है. लेकिन वैज्ञानिकों ने हजारों सेंसर और मॉर्डन टेक्निक से इन अदृश्य कणों से ब्रह्मांड के बारे में नई जानकारी हासिल की है.

क्या है न्यूट्रिनो?

न्यूट्रिनो को बहुत आसान भाषा में समझें तो ये ब्रह्मांड का एक बहुत छोटा कण है. ये इतना छोटा और हल्का होता है कि इसे पकड़ना काफी मुश्किल है. सबसे खास बात ये है कि न्यूट्रिनो सामान्य पदार्थ से बहुत कम प्रतिक्रिया करता है. यानी ये धरती, अंतरिक्ष की धूल और दूसरी चीजों से गुजरते हुए लंबी दूरी तय कर सकता है. इसी वजह से वैज्ञानिक इसे ब्रह्मांड का एक तरह का मैसेंजर मानते हैं. ये कण हमें उन जगहों की जानकारी दे सकते हैं जहां से आने वाली रोशनी या दूसरे चीज़ों को समझना काफी मुश्किल होता है. उदाहरण के लिए, अंतरिक्ष में ब्लैक होल के आसपास या बहुत शक्तिशाली खगोलीय घटनाओं के दौरान क्या हो रहा है, इसका पता लगाने में न्यूट्रिनो मदद कर सकते हैं. इसे और उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए किसी शहर में एक ऐसी कार है जो रास्ते में लगभग हर चीज को बिना रुके पार कर जाती है. ट्रैफिक, दीवार या दूसरी रुकावटें भी उसे ज्यादा प्रभावित नहीं करतीं. न्यूट्रिनो भी कुछ इसी तरह काम करता है.

अंटार्कटिका की बर्फ में लगाया क्यों डिटेक्टर?

अब सवाल आता है कि न्यूट्रिनो पकड़ने के लिए वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका को ही क्यों चुना? इसका जवाब है, वहां की गहरी और साफ बर्फ. दक्षिणी ध्रुव के पास बर्फ की मोटी परत के अंदर वैज्ञानिकों ने एक बड़ा सा न्यूट्रिनो डिटेक्टर बनाया है, जिसे आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्ज़र्वेटरी कहा जाता है. ये करीब एक घन किलोमीटर बर्फ के इलाके में फैला हुआ है. इसके अंदर लगभग 1.5 से 2.5 किलोमीटर की गहराई पर हजारों सेंसर लगाए गए हैं. इनमें कुल 5,160 डिजिटल ऑप्टिकल मॉड्यूल शामिल हैं. अब सबसे दिलचस्प हिस्सा समझिए. न्यूट्रिनो को वैज्ञानिक सीधे कैमरे से नहीं देखते. जब कोई हाई एनर्जी न्यूट्रिनो बर्फ के अंदर किसी परमाणु से टकराता है, तो उस टक्कर से बहुत हल्की रोशनी पैदा हो सकती है. आइसक्यूब में लगे सेंसर इसी रोशनी को पकड़ते हैं. यानी वैज्ञानिक उस कण को सीधे नहीं पकड़ते, बल्कि उसके गुजरने से पैदा हुए छोटे से हिंट को पकड़कर उसकी कहानी समझते हैं.

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फ्रांसिस हाल्ज़ेन ने क्या किया?

प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्ज़ेन ने आइसक्यूब प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई. उनके नेतृत्व में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस विशाल प्रयोग को तैयार किया और उससे मिलने वाले डेटा की स्टडी की. ये कोई छोटा प्रोजेक्ट नहीं था. अंटार्कटिका जैसे मुश्किल वातावरण में हजारों सेंसर लगाना, उन्हें जोड़ना, डेटा धरती तक पहुंचाना और फिर उस डेटा में से न्यूट्रिनो के बहुत कमजोर संकेतों को पहचानना अपने आप में बहुत बड़ा इंजीनियरिंग चैलेंज था. आइसक्यूब ने 2013 में अंतरिक्ष से आने वाले हाई एनर्जी न्यूट्रिनो के खास संकेतों का प्रमाण दिया. इसके बाद वैज्ञानिकों ने इन कणों के स्रोतों की खोज शुरू की.

नोबेल पुरस्कार क्यों है खास?

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसने नोबेल पुरस्कार का नाम न सुना हो. इसे दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में गिना जाता है. इस पुरस्कार की शुरुआत स्वीडिश वैज्ञानिक और उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत से हुई थी. अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा ऐसे पुरस्कारों के लिए रखने का निर्देश दिया था जो मानवता के लिए महत्वपूर्ण काम करने वाले लोगों को दिए जाएं. साल 1901 से भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार दिए जाते हैं. बाद में आर्थिक विज्ञान के लिए भी पुरस्कार शुरू किया गया. भौतिकी का नोबेल इसलिए खास है क्योंकि ये उन खोजों को सम्मान देता है जो हमें प्रकृति के नियमों और ब्रह्मांड को समझने में नई दिशा देती हैं. फ्रांसिस हाल्ज़ेन को मिला 2026 का पुरस्कार इसी लिहाज से खास है. उन्होंने हमें ब्रह्मांड को देखने का एक नया तरीका दिया है.

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पहले ब्रह्मांड को कैसे देखते थे?

अब तक जब हम अंतरिक्ष की बात करते थे, तो सबसे पहले टेलीस्कोप का ध्यान आता था. टेलीस्कोप अलग-अलग तरह की रोशनी को पकड़ते हैं. वैज्ञानिक विजिबल लाइट, रेडियो वेव्स, X- रे और गामा रेज जैसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों के जरिए अंतरिक्ष को समझते हैं. लेकिन हर कहानी सिर्फ रोशनी से नहीं मिलती. कुछ खगोलीय घटनाएं इतनी शक्तिशाली होती हैं कि उनके बारे में पूरी जानकारी सिर्फ लाइट से मिलना मुश्किल हो सकता है. यहीं न्यूट्रिनो एक नई खिड़की खोलते हैं. इसे ऐसे समझिए कि आप किसी बहुत दूर के शहर के बारे में जानना चाहते हैं. आपके पास वहां की सिर्फ तस्वीरें हैं. तस्वीरें बहुत कुछ बता सकती हैं, लेकिन हर चीज नहीं. अब अगर उसी शहर से कोई ऐसा मैसेंजर भी आपके पास पहुंचने लगे जो रास्ते में आने वाली रुकावटों से गुजर सके, तो आपको उस शहर की ज्यादा जानकारी मिल सकती है. न्यूट्रिनो वैज्ञानिकों के लिए कुछ ऐसा ही मैसेंजर हैं.

आइसक्यूब ने बदली न्यूट्रिनो एस्ट्रोनॉमी

आइसक्यूब ऑब्ज़र्वेटरी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक ये है कि इसने न्यूट्रिनो एस्ट्रोनॉमी को मजबूत बेस दिया. अब वैज्ञानिक सिर्फ ये नहीं देखते कि अंतरिक्ष से रोशनी कहां से आ रही है. वो ये भी पता लगाने की कोशिश करते हैं कि हाई एनर्जी न्यूट्रिनो कहां से आ रहे हैं. इससे ब्लैक होल, सक्रिय आकाशगंगाओं और दूसरी शक्तिशाली खगोलीय घटनाओं के बारे में नई जानकारी मिल सकती है. इसके अलावा आइसक्यूब का डेटा ये समझने में भी मदद करता है कि ब्रह्मांड में प्राकृतिक पार्टिकल एक्सेलेरेटर किस तरह काम करते हैं. यानी अंतरिक्ष खुद एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला की तरह काम कर रहा है. वहीं, न्यूट्रिनो उस प्रयोगशाला से धरती तक पहुंचने वाले संदेश हैं.

क्यों था इतना मुश्किल काम?

न्यूट्रिनो की सबसे बड़ी खासियत ही वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. ये कण पदार्थ के साथ बहुत कम रिएक्ट करते हैं. इसका मतलब ये है कि धरती तक पहुंचने वाले ज्यादातर न्यूट्रिनो बिना किसी निशान के निकल जाते हैं. वैज्ञानिकों को उन बहुत कम घटनाओं को पहचानना होता है जिनसे महत्वपूर्ण जानकारी मिल सके. इसके लिए एक बहुत बड़ा डिटेक्टर बनाया गया. हजारों सेंसर लगाए गए. फिर इन सेंसर से आने वाले डेटा का लगातार विश्लेषण किया गया. इसके पीछे सिर्फ भौतिक वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि इंजीनियर, कंप्यूटर वैज्ञानिक, डेटा विशेषज्ञ और कई देशों के शोधकर्ता भी काम करते हैं. आइसक्यूब सहयोग में दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक शामिल हैं.

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पूरी टीम की जीत

फ्रांसिस हाल्ज़ेन को इस उपलब्धि का चेहरा जरूर माना जा रहा है, लेकिन आइसक्यूब की सक्सेस के पीछे बड़ी अंतरराष्ट्रीय टीम है. अंटार्कटिका में काम करना अपने आप में काफी चैलेंजिंग है. वहां तापमान बहुत कम होता है, जिसकी वजह से वहां रहना भी आसान नहीं है. ऐसे में उपकरणों को स्थापित करना, उन्हें सालों तक चलाना और उनसे लगातार डेटा निकालना बड़ी जीत है. इसलिए ये नोबेल पुरस्कार मॉर्डन साइंस में टीमवर्क की ताकत दिखाता है.

क्या बनाई जा सकती है बिजली?

फ्रांसिस हाल्ज़ेन के नोबेल पुरस्कार की खबर के बाद न्यूट्रिनो को लेकर एनर्जी सेक्टर में भी चर्चा हो रही है. न्यूट्रिनो एनर्जी ग्रुप इंडिया ने हाल्ज़ेन को बधाई देते हुए अपनी रिसर्च का भी जिक्र किया है. ग्रुप का कहना है कि वो इसे बिजली में बदलने की संभावनाओं पर काम कर रहा है. इसके लिए ग्राफीन और डोप्ड सिलिकॉन जैसे नैनोमैटेरियल का इस्तेमाल करने की बात कही गई है. कंपनी अपनी तकनीक को न्यूट्रिनोवोल्टाइक टेक्नोलॉजी का नाम दे रही है. कंपनी का दावा है कि फ्यूचर में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल छोटे और विकेंद्रीकृत बिजली स्रोतों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, यहां एक बड़ा अंतर समझना जरूरी है. दरअसल, फ्रांसिस हाल्ज़ेन को नोबेल पुरस्कार न्यूट्रिनो से बिजली बनाने के लिए नहीं मिला है.
उनका नोबेल सम्मान आइसक्यूब ऑब्ज़र्वेटरी के हाई एनर्जी न्यूट्रिनो की खोज से जुड़े वैज्ञानिक योगदान के लिए है. न्यूट्रिनो से बिजली बनाने का दावा अलग बात है.

भारत के लिए क्यों है खास?

भारत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है. चंद्रयान मिशन, आदित्य-एल1, अंतरिक्ष अनुसंधान, सेमीकंडक्टर, क्वांटम टेक्नोलॉजी और रिन्यूएबल एनर्जी में भारत की काम बढ़ रहा है. न्यूट्रिनो रिसर्च भी भारत के लिए बड़ा सेक्टर है. देश में कई वैज्ञानिक संस्थान पार्टिकल फिजिक्स और न्यूट्रिनो से जुड़ी स्टडी पर काम कर रहे हैं. भारत में न्यूट्रिनो से जुड़ी रिसर्च का एक बड़ा उदाहरण भारत-स्थित न्यूट्रिनो वेधशाला यानी INO के प्रोजेक्ट्स भी रहे हैं. इसका उद्देश्य न्यूट्रिनो को बेहतर तरीके से समझना है. इस तरह की रिसर्च भारत को दुनिया के बड़े वैज्ञानिक नेटवर्क से जोड़ती है. साथ ही युवा वैज्ञानिकों के लिए नए अवसर पैदा करती है.

News Source: ANI

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