Iran-US Deal: ईरान और अमेरिका के बीच अस्थायी शांति समझौते के बाद चार महीनों से जारी जंग अब शांत हो गई है. हालांकि, इसको शंकाओं से देखा जा रहा है कि कहीं फिर से हमला न शुरू हो जाए. इस जंग में अभी तक ईरान और अमेरिका के साथ दुनिया भर के देशों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है. साथ ही एनर्जी संकट की वजह से लोगों को भी काफी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है. इस दौरान रणनीतिक और इंफ्रास्ट्रक्चर रूप से देखा जाए तो ईरान और अमेरिका दोनों को भारी नुकसान हुआ है. हालांकि, कभी भी नाखून काटने के लिए तलवार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. लेकिन जंग के दौरान अमेरिका ने उन बमों का इस्तेमाल किया, जो भारी लागत लगाकर बनाए गए थे. इन हथियारों का इस्तेमाल कोई देश उस वक्त करता है जब जंग अपने चरम पर पहुंच जाती है.
क्या ट्रंप प्रशासन को उकसाया गया?
इजरायल पर आरोप है कि उसने इस जंग में शामिल होने के लिए अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कई बार उकसाने की कोशिश की. साथ ही ट्रंप सरकार को विश्वास दिलाया कि ईरानी सरकार के खिलाफ जनता सड़कों पर है और वह नाराज है. अगर वहां की टॉप लीडर्सशिप को खत्म कर दिया जाए और हमला करना कर दिया जाए तो रिजिम दो-तीन दिन में चेंज हो जाएगी. राष्ट्रपति ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की बात को मानकर 28 फरवरी, 2026 को हमला कर दिया. एक हफ्ते तक लगातार बमबारी करने के बाद भी वहां पर कोई सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ और न ही जमीनी कार्रवाई की गई. हालांकि, इसी बीच सुप्रीम लीडर अली खामेनेई, उनके परिजन और कई टॉप कमांडर को मार दिया गया. वहीं, अमेरिका को इजरायल ने जो शिगूफा छोड़ा था वह फेल हो गया और अमेरिका इस जंग में फंस गया. अब इस युद्ध में उसको बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था. इसी बीच ईरान ने महत्वपूर्ण समुद्री गलियारे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद कर दिया और वहां से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों पर शुल्क लगाने का ऐलान कर दिया. तेहरान ने साफ कर दिया कि इजरायल और अमेरिका के साथ उनका सहयोगी जहाज इस गलियारे से नहीं गुजरेगा और जाने की कोशिश की तो हमला कर दिया जाएगा.

गैर-जरूरी बमों का किया इस्तेमाल
ईरान में भारी तबाही मचाने के बाद भी अमेरिका सत्ता परिवर्तन नहीं कर पाया था. साथ ही उसने जिस तरह के बमों का इस्तेमाल किया था वह गैर-जरूरी था. उसे इस युद्ध में कुछ मिला नहीं और होर्मुज हाथ से निकल गया. ऐसे में जब होर्मुज से आवाजाही बंद हो गई तो दुनिया भर में क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी इजाफा हो गया और अमेरिका में भी इसका प्रभाव देखने को मिला. वहां भी कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली और वह ट्रंप प्रशासन पर दबाव बनने लगा कि वह इस युद्ध से जल्दी से बाहर आ जाए. इसी बीच उसने अपने सबसे बड़ा हुक्म इक्का फेंका और पाकिस्तान को जल्द से जल्द मध्यस्थता के लिए तैयार किया. हालांकि, दोनों देशों के बीच में बातचीत में पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई और इस जंग को अस्थायी रूप से रुकवा दिया. इसी बीच अब सवाल यह है कि अभी तक चले इस युद्ध में किस देश को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ और किस देश को रणनीतिक रूप से फायदा हुआ है.
युद्ध में ईरान ने पहले दो महीनों में अमेरिका के हथियारों को इतनी तेजी से खत्म किया, जितना अमेरिकी सैनिकों ने खाड़ी की लड़ाई में कभी नहीं देखा था. जब कोई देश मिसाइल फायर करता है तो किसी मार्केट में मिसाइल का प्राइस बदल जाता है. साथ ही किसी युद्ध की कीमत उसके हथियारों के इस्तेमाल पर निर्भर करती है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस जंग में करीब 35-40 अरब डॉलर के हथियारों का इस्तेमाल किया गया.
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टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल से किया हमला
ये लड़ाई करीब 40 दिनों चली और इस दौरान अमेरिका-इजरायल के संयुक्त अभियान में 5000 से ज्यादा हथियारों का यूज किया गया. इस दौरान सबसे ज्यादा टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल का इस्तेमाल किया गया और खास बात यह है कि यह लंबी दूरी तक जमीनी हमला करने में सक्षम है. इस मिसाइल से जहां पर हमला किया जाता है वह करीब उसके 10 मीटर के दायरे में गिरती है और भारी तबाही मचा देती है. यह मिसाइल जहाजों से दागीं जाती हैं और करीब एक मील की दूरी से यह निशाना लगाने में सक्षम है. वहीं, ईरान जंग में अमेरिका ने करीब 1000 मिसाइलों का इस्तेमाल किया. साथ ही अमेरिकी कांग्रेस रकम की प्रमीशन मिलने के बाद डिपार्टमेंट ऑफ डिफ़ेंस इसे अपने हिसाब से खर्च कर सकता है.

ड्रोन और पेट्रियट इंटरसेप्टर में हुआ मुकाबला
इस जंग में ईरान ने शाहेद ड्रोन का जमकर इस्तेमाल किया. इस ड्रोन की कीमत 30,000 डॉलर है. दूसरी तरफ अमेरिका ने इस मिसाइल को गिराने के लिए पेट्रियट इंटरसेप्टर का इस्तेमाल किया और इसकी कीमत 40 लाख डॉलर है. इस दौरान डिफेंस कंपनियों की मौज आ गई. टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल बनाने वाली कंपनी रेथियॉन ने बताया कि जंग शुरू होने के बाद उसकी कमाई में 21 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई, जबकि हथियारों की सप्लाई में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
LNG सप्लाई नहीं होने पर पड़ा अर्थव्यवस्था पर असर
ईरान ने जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से किसी भी जहाज नहीं गुजरने का ऐलान किया तो कतर के लिए सबसे ज्यादा मुश्किलें बढ़ गईं. दुनिया की करीब 20 एलएनजी की सप्लाई रातों रात रुक गई. इसके अलावा खाड़ी देश जो इस रास्ते से दुनिया भर में अपनी प्राकृतिक संसाधनों की सप्लाई करते हैं उन पर भी गहरा असर पड़ा. खाड़ी देशों की लाइफ लाइन क्रूड ऑयल और गैस की सप्लाई है और इसके रुक जाने से उनकी अर्थव्यवस्था पर भी इसका बुरा असर पड़ा.
ऐसे हुआ अमेरिका को नुकसान
युद्ध के दौरान अमेरिका ने लंबी दूरी की सटीक मिसाइलों, कर-बस्टर बम, क्रूज़ मिसाइलें और अन्य महंगे हथियारों का जमकर इस्तेमाल किया. इन हथियारों को दोबारा बनाने के लिए अरबों डॉलर का खर्च आता है. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस्तेमाल होने वाले गोले बारूद को रिप्लेस करने में ही भारी लागत आ जाती है. इसके अलावा इस जंग में यूएसए ने विमानवाहक पोत, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और हजारों की संख्या में सैनिकों को तैनात कर रखा था. कुछ विश्लेषणों के मुताबिक, शुरुआती चरणों में ही अभियान की लागत कई अरबों डॉलर तक पहुंच गई. वहीं, ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाया और उन अड्डों को भारी नुकसान पहुंचाने का काम किया. कुछ विश्लेषणों में बताया गया है कि शुरुआती चरणों में इन अड्डों की लागत कई अरबों डॉलर मापी गई थी.

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हालांकि, अमेरिका को इन अड्डों पर सैनिकों को नुकसान नहीं हुआ. लेकिन इस बात का अंदेशा लगाया गया की सैन्य अड्डों को भारी नुकसान पहुंचा है. इसी बीच अमेरिका की इन अड्डों को बचाने के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है और जिन देशों में यह अड्डे बनाए गए हैं उन्हें भी शंका होने लगी है कि अमेरिकी हथियारों की इतनी बड़ी खेप होने के बाद भी वहां पर मिसाइलों के हमलों को नहीं रोक पाई है. ऐसे में अब उनकी सुरक्षा को लेकर भी खतरा मंडराने लगा है.
रक्षा बजट पर पड़ा बुरा असर
युद्ध के शांत होने के बाद अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों की भरपाई, नई खरीद और सैन्य तैयारियों के लिए अतिरिक्त बजट की आवश्यकता पड़ी. रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे अभियानों से भविष्य के रक्षा खर्चों पर भी दबाव बढ़ता है.
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ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर को हुआ नुकसान
28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद शुरू हुई जंग में ईरान में सैन्य, आर्थिक और बुनियादी ढांचे के स्तर पर भारी नुकसान हुआ है. हालांकि, अभी तक ईरान ने अपने नुकसान का कोई आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है. कुछ विश्लेषणों में दावा किया गया है कि सैकड़ों अरब डॉलर के बुनियादी ढांचे का नुकसान हुआ है. युद्ध के शुरुआती दिनों में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को अपना निशाना बनाया था. इसके बाद ड्रोन उत्पादन केंद्र और हथियार भंडार क्षतिग्रस्त हुए, कई वायु रक्षा (एयर डिफेंस) प्रणालियां निष्क्रिय कर दी गईं, वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और कमांडर मारे गए और इसके अलावा सैन्य कमान और संचार व्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाया है.

सैन्य ठिकानों के अलावा ईरान में गैस और क्रूड ऑयल प्लांट को भी निशाना बनाया गया है. ईंधन भंडारण केंद्र को भी प्रभावित करने की कोशिश की गई. बिजली और संचार नेटवर्क को भी नुकसान पहुंचाया गया है. इसी बीच जब ईरान ने जवाबी हमले किए और अमेरिका के सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाया तो इजरायल और अमेरिका हैरान हो गए. वहीं, ईरान ने खाड़ी देशों को खुली चेतावनी दे दी कि अगर उसके गैस प्लांट पर हमला किया गया तो खाड़ी देश जिस डिसेलिनेशन प्लांट से समुद्र का पानी साफ करते हैं उसको उड़ा देंगे. इसके अलावा समुद्र में बिछी इंटरनेट तारों को भी काट देंगे. ऐसे में खाड़ी देशों को आर्थिक के साथ इंटरनेट की भी भारी कमी हो जाएगी.
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