Ram Nath Kovind: प्रधानमंत्री मोदी ने आज भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की ऑटोबायोग्राफी “ट्रायम्फ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक: माई लाइफ, माई स्ट्रगल्स” का विमोचन किया. इस दौरान पीएम मोदी ने उनकी काफी तारीफ की और कहा कि युवाओं को उनके बारे जरूर जानना चाहिए. रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति के तौर पर एक मिसाल कायम की है. लॉन्च के समय मौजूद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने कोविंद को पक्के इरादे की “जीती-जागती मिसाल” बताया और भारत के डिप्लोमैटिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए उनकी तारीफ की. इस मौके पर मौजूद लोगों में भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और कई केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे.
प्रधानमंत्री ने युवाओं से ऑटोबायोग्राफी पढ़ने और दूसरों के संघर्षों से सीखने की अपील की. उन्होंने कहा कोविंद की जिंदगी ने दिखाया कि कैसे पक्का इरादा किसी व्यक्ति को मुश्किलों से उबरने और सबसे ऊंचे संवैधानिक पद तक पहुंचने में मदद कर सकता है. उन्होंने राष्ट्रपति पद के बाद भी कोविंद के लगातार पब्लिक से जुड़े रहने पर भी जोर दिया. विमोचन के दौरान उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति के जीवन के कई किस्सों के बारे में बताया.
युवाओं से अपील
पीएम मोदी की यह बात ऐसे समय में आई है जब सरकार और BJP ने सोशल मीडिया पर Gen Z से जुड़ने की कोशिशें तेज कर दी हैं. पिछले महीने, NEET प्रोटेस्ट के बाद, मोदी ने अपने मंत्री साथियों से कहा था कि वे इंस्टाग्राम का एक्टिव इस्तेमाल करें और युवाओं से जुड़ने के लिए रील्स पोस्ट करें. हाल के हफ़्तों में, मोदी ने खुद युवाओं को एड्रेस करते हुए कई बार रील्स पोस्ट किए हैं. प्रधानमंत्री ने आज की जेनरेशन से ऑटोबायोग्राफी पढ़ने की अपील की क्योंकि यह किताब आज दौर को उस दौर से गुजरे किसी व्यक्ति के जीवन के जरिए समझने का मौका देती हैं. उन्होंने कहा, “आज रील्स का जमाना है; सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर आपको कहीं खींच लाते हैं. लेकिन इस जमाने में भी, याद रखें कि रेलवे स्टेशनों पर क्या लिखा होता है: शॉर्टकट आपको शॉर्ट कर देगा.
प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविंद की ऑटोबायोग्राफी “भारतीय लोकतंत्र के लिए एक विरासत” बनेगी और नई पीढ़ी को इससे बहुत कुछ सीखना है. हमें भविष्य में कोविंद जैसे और भी कई युवाओं की जरूरत है. ऐसे लोग जो हालात से हारे नहीं, बल्कि हर चुनौती से पार पाने का पक्का इरादा रखते हों. वे एक आत्मनिर्भर भारत का रास्ता बनाएंगे और यह ऑटोबायोग्राफी युवाओं के लिए प्रेरणा का सोर्स बनेगी.” उन्होंने कहा कि ऑटोबायोग्राफी का टाइटल सही था क्योंकि कोविंद की जिंदगी और संघर्ष पर्सनल थे. उन संघर्षों की जीत इंडियन डेमोक्रेसी की जीत है.

‘संघर्षो से सीखा’
पीएम ने पूर्व राष्ट्रपति के बचपन और उनके संघर्षों के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि कोविंद ने बचपन में एक आग की घटना में अपनी मां को खो दिया था, जब वह घर का सामान बचाने की कोशिश कर रही थीं. प्रधानमंत्री ने कहा कि यह हादसा उन्हें तोड़ सकता था, लेकिन इससे वे और मजबूत हो गए. उन्होंने कहा कि कोविंद के पिता ने उनमें नैतिक मूल्य और सिद्धांतों को डालने में बड़ी भूमिका निभाई. राष्ट्रपति भवन में कोविंद के साथ अपनी बातचीत को याद करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति उनसे ऐसी बातें करते थे जिनकी प्रोटोकॉल के तहत आम तौर पर उन्हें इजाजत नहीं होती थी. साथ ही पीएम के मना करने के बावजूद वे उन्हें उनकी कार तक छोड़ने जाते थे.
गांववालों से सीखा प्यार और हमदर्दी
पूर्व राष्ट्रपति कोविंद ने अपने बचपन की मुश्किलों और अपने आस-पास से सीखे गए सिद्धांतों को याद किया. उन्होंने कहा, “मैं उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के एक गांव से हूं. मैंने गांववालों से आपसी हमदर्दी और प्यार सीखा. उन्होंने याद करते हुए कहा कि कैसे उनके घर की छत से बारिश का पानी रिसता था और परिवार बारिश रुकने का इंतजार करता था. कोविंद ने कहा कि सरकारी हाउसिंग स्कीम के तहत करोड़ों गरीब परिवारों को सिर पर छत मिली है और उन्हें इज्जत से जीने का मौका मिला है. कोविंद ने कहा कि वह BJP से इसलिए जुड़े क्योंकि उनके हिसाब से पार्टी ने वंश या समुदाय की बातों से ऊपर देश को रखा.
बचपन में गुजर गईं थी मां
कोविंद का जन्म 1 अक्टूबर 1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जिले के परौंख गांव में ब्रिटिश राज के दौरान हुआ था. उनके पिता का नाम मैकू लाल और माता का नाम कलावती था. वे पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे. उनके पिता, मैकू लाल, एक दुकान चलाते थे और वैद्ध डॉक्टर थे. उनकी मां कलावती एक गृहणी थीं. कोविंद का जन्म एक मिट्टी की झोपड़ी में हुआ था, जो बाद में गिर गई. वे सिर्फ पांच साल के थे जब उनकी मां की फूस की झोपड़ी में आग लगने से मौत हो गई. बाद में कोविंद ने वह जमीन लोगों को दान कर दी. पांचवी तक पढ़ाई करने के बाद, उन्हें जूनियर स्कूल जाने के लिए रोजाना 8 km पैदल चलना पड़ता था. स्कूल कानपुर गांव जाना में था और गांव में किसी के पास साइकिल नहीं थी, इसलिए वे रोज पैदल चलकर जाते थे. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने DAV कॉलेज (कानपुर यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ) से कॉमर्स में बैचलर डिग्री और LLB की डिग्री हासिल की.
सुप्रीम कोर्ट में बने सरकार के वकील
कानपुर के DAV कॉलेज से लॉ में ग्रेजुएशन करने के बाद, कोविंद सिविल सर्विसेज एग्जाम की तैयारी के लिए दिल्ली चले गए. उन्होंने अपनी तीसरी कोशिश में एग्जाम पास कर लिया. वे संबद्ध सेवा में काम करने के लिए काफी अच्छे नंबर लाए और इस तरह लॉ की प्रैक्टिस शुरू की. कोविंद ने 1971 में दिल्ली बार काउंसिल में एक एडवोकेट के तौर पर पंजीकरण कराया. उन्होंने 1977 से 1979 तक दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील के तौर पर काम किया. 1977 और 1978 के बीच, उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पर्सनल असिस्टेंट के तौर पर भी काम किया. 1978 में वे भारत के सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड बने. इसके बाद 1980 से 1993 तक भारत के सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील के तौर पर काम किया. उन्होंने 1993 तक दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लॉ की प्रैक्टिस की. एक वकील के तौर पर, उन्होंने नई दिल्ली की फ्री लीगल एड कमेटी के तहत समाज के कमजोर तबके, महिलाओं और गरीबों को फ्री कानूनी सहायता देकर मदद की.
राजनीति में शुरुआत
1991 में रामनाथ कोविंद भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए. उन्होंने 1998 से 2002 के बीच BJP दलित मोर्चा के अध्यक्ष और ऑल इंडिया कोली समाज के अध्यक्ष के तौर पर काम किया. वे पार्टी के नेशनल स्पोक्सपर्सन भी रहे. उन्होंने परौंख में अपना पुश्तैनी घर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दान कर दिया. BJP में शामिल होने के तुरंत बाद, उन्होंने घाटमपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. इसके बाद 2007 के यूपी चुनाव में उन्होंने BJP के टिकट पर भोगनीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन फिर हार गए. 1997 में कोविंद ने केंद्र सरकार के कुछ आदेशों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया, जिनसे अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों पर बुरा असर पड़ा था. बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने संविधान में तीन बदलाव किए, जिससे उन आदेशों को रद्द कर दिया गया.

राज्यसभा और बिहार के गवर्नर
अप्रैल 1994 में वे उत्तर प्रदेश राज्य से राज्यसभा के लिए चुने गए. उन्होंने मार्च 2006 तक लगातार दो कार्यकाल में बारह साल तक सेवा की. संसद सदस्य के रूप में, उन्होंने अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण, गृह मामले, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सामाजिक न्याय और अधिकारिता, और कानून और न्याय पर संसदीय समितियों में कार्य किया.
8 अगस्त, 2015 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कोविंद को बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया. 16 अगस्त 2015 को पटना उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, इकबाल अहमद अंसारी ने पटना के राजभवन में आयोजित एक समारोह में कोविंद को बिहार के 26वें राज्यपाल के रूप में पद की शपथ दिलाई. जून 2017 में जब उन्हें राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार घोषित किया गया, तो नीतीश कुमार ने उनके चुनाव का समर्थन किया और गवर्नर के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान निष्पक्षता और राज्य सरकार के साथ मिलकर काम करने के लिए उनकी तारीफ की. यहां से राष्ट्रपति के तौर पर उनका कार्यकाल शुरू हुआ.

राष्ट्रपति चुनाव
भारत के 14वें राष्ट्रपति के लिए अपने नामांकन के बाद, उन्होंने बिहार के गवर्नर के पद से इस्तीफा दे दिया. तत्कालीन भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 20 जून 2017 को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया. उन्होंने 20 जुलाई 2017 को चुनाव जीता. कोविंद ने 25 जुलाई 2017 को भारत के 14वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली. अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान, उन्होंने भारत की संसद को पांच बार संबोधित किया. पहला भाषण शपथ ग्रहण समारोह में था और उसके बाद के चार भाषण 2018 से 2021 तक दोनों सदनों की जॉइंट मीटिंग में थे. अपने कार्यकाल के दौरान, कोविंद ने भारत के तीन चीफ जस्टिस और भारत के सुप्रीम कोर्ट के 29 दूसरे जजों को पद की शपथ दिलाई. 21 जुलाई 2022 को द्रौपदी मुर्मू ने उनकी जगह ली. अब उन्होंने अपनी आत्मकथा “ट्रायम्फ ऑफ द इंडियन रिपब्लिक: माई लाइफ, माई स्ट्रगल्स” का विमोचन किया है.
