Hydrogen Train India: देश के नागरिकों को भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की सौगात मिलने जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 17 जुलाई को हरियाणा में देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे और हरी झंडी दिखाकर इसे आगे की मंजिल के लिए रवाना करेंगे. इस खास कार्यक्रम के लिए रेलवे की तैयारी जोरों पर है.
इस हाइड्रोजन ट्रेन के भारत में चल जाने के बाद भारतीय रेलवे अपने इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय जोड़ लेगा. ठीक वैसे ही जैसे पहली बार 16 अप्रैल 1853 में भारत में पहली ट्रेन चली थी, जो बॉम्बे (अब मुंबई) के बोरी बंदर स्टेशन से ठाणे के बीच चलाई गई थी. अब भारत में हाइड्रोजन ट्रेन के सफर की शुरुआत हो रही है और पीएम मोदी 17 जुलाई को इसको हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे.
हम भारतीय रेल इतिहास की भी बात करेंगे, लेकिन शुरुआत हम इस बात से करेंगे कि देश की सुपरफास्ट ट्रेनों में से एक वंदे भारत से कितनी अलग है देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन? इसकी कितनी स्पीड है, इसकी खासियत क्या है, इसका रूट, किराया और टाइमिंग क्या है. आइए शुरू करते हैं.

वंदे भारत से कितनी अलग है हाइड्रोजन ट्रेन?
देश 2047 तक विश्व में एक विकसित राष्ट्र बनकर उभरने की तैयारी में है और इसके लिए हर स्तर और हर क्षेत्र में तेजी के साथ काम हो रहा है. इस बीच देश के रेल क्षेत्र को एक और उपलब्धि मिलने जा रही है. जी हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जुलाई को हरियाणा के जींद से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे.
यह देश के लिए एकदम अलग और नई ट्रेन है. इससे पहले भारत में वंदे भारत ट्रेन ने एक नई क्रांति लाई थी, इससे रेल की सुविधा में काफी अच्छी बढ़ोतरी हुई और लोगों को एक जगह से दूसरी जगह आने-जाने में सुविधा बढ़ी.
अब हम बात करेंगे कि वंदे भारत से हाइड्रोजन ट्रेन कैसे और कितनी अलग है. रेल मंत्रालय के अनुसार, भारत में पहली वंदे भारत ट्रेन की शुरुआत 15 फरवरी 2019 में हुई थी. दिसंबर 2025 तक देश भर में कुल 164 वंदे भारत ट्रेनों का संचालन होता हुआ दिखा है. रेलवे की प्लानिंग के अनुसार, साल 2027 तक भारत में कुल 4500 वंदे भारत ट्रेन को चलाने की तैयारी है. इनमें अब वंदे भारत स्लीपर भी शामिल हो गई हैं.
वहीं, भारत में पहली बार हाइड्रोजन ट्रेन 17 जुलाई 2026 से चलने जा रही है. इन दोनों ट्रेनों के बीच और भी अंतर की बात करें तो वंदे भारत बिजली से चलती है, जबकि हाइड्रोजन ट्रेन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिक्सर से चलेगी.
वंदे भारत की स्पीड 160 से 180 किलो मीटर प्रति घंटा है, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन की स्पीड फिलहाल 75 किलो मीटर प्रति घंटा हो सकती है. दोनों ही ट्रेन में समानता यह है कि ये दोनों पर्यावरण के नजरिये से अच्छी हैं क्योंकि इन दोनों से प्रदूषण नहीं फैलता है. वंदे भारत में कुल कोच की संख्या 8 से 16 के बीच रही है जबकि हाइड्रोजन ट्रेन में अभी 10 कोच लगाए गए हैं. इन दोनों ट्रेनों को भारतीय रेलवे के लिए नई तकनीकी क्रांति के रूप में भी देखा जा रहा है.

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17 जुलाई को पीएम मोदी राष्ट्र को करेंगे समर्पित
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा राज्य के जींद जिले से चलने वाली है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जुलाई को जींद से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को राष्ट्र को समर्पित करेंगे. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, राज्य मंत्री कृष्ण कुमार बेदी ने गुरुवार 9 जुलाई को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जुलाई को जींद रेलवे स्टेशन से भारत की पहली हाइड्रोजन-चालित ट्रेन (Hydrogen-Powered Train)को हरी झंडी दिखाएंगे और हरियाणा भर में कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे.
बेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री एक जनसभा को संबोधित करेंगे और वर्चुअल माध्यम से हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं का शुभारंभ करेंगे. इन परियोजनाओं में भिवानी और नारनौल में दो श्री राम मेडिकल कॉलेज, कुरुक्षेत्र एलिवेटेड रेलवे ट्रैक, अंबाला-काला अंब ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, दिल्ली-कटरा एक्सप्रेसवे का हरियाणा खंड और जींद-गोहाना एनएच-352ए शामिल हैं.
पीएम मोदी कुरुक्षेत्र में एक सिख संग्रहालय की आधारशिला भी रखेंगे और प्रमुख राजमार्गों पर विस्तार कार्यों का शुभारंभ करेंगे. बेदी ने कहा कि इन परियोजनाओं से स्वास्थ्य सेवा और सड़क संपर्क में सुधार होगा और राज्य में औद्योगिक और वाणिज्यिक विकास के नए अवसर पैदा होंगे.
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हाइड्रोजन ट्रेन की खासियत
अब बात हाइड्रोजन ट्रेन के बारे में विस्तार से करते हैं. बीते मई में भारतीय रेलवे ने जानकारी दी कि उसने हरियाणा के जींद-सोनीपत सेक्शन पर भारत की पहली स्वदेशी रूप से विकसित हाइड्रोजन फ्यूल सेल-आधारित ट्रेन को मंजूरी दे दी है. इस उपलब्धि के साथ, भारत हाइड्रोजन-संचालित रेल सेवा का इस्तेमाल करने वाले देशों के खास समूह में शामिल हो गया है. मतलब कि देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन पटरियों पर दौड़ने के लिए तैयार है. हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच चलने वाली देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन में कुल 10 डिब्बे हैं.
हाइड्रोजन ट्रेन के इस कदम को देश में ग्रीन एनर्जी और क्लीन ट्रांसपोर्ट की तरह एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इस ट्रेन से न धुआं होगा, न प्रदूषण फैलेगा और न ही इससे पर्यावरण को नुकसान होगा.
रेल मंत्रालय की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह ट्रेन हाइड्रोजन ईंधन सेल तकनीक, हाइड्रोजन का उपयोग करके रासायनिक प्रतिक्रिया के माध्यम से बिजली उत्पन्न करती है, जिसमें केवल जल वाष्प ही उत्सर्जित होता है. इस प्रकार, यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित रेल प्रणालियों का एक स्वच्छ विकल्प है.
रेल मंत्रालय के मुताबिक, हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल भरने के लिए हाइड्रोजन संपीड़न प्रणाली (Hydrogen compression system), आवश्यक तकनीकी सहायता और महत्वपूर्ण पुर्जे उपलब्ध कराए गए हैं ताकि विश्वसनीय और बिना किसी गलती या चुक है संचालन सुनिश्चित हो सके. किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए अलग से एक कंप्रेसर यूनिट की व्यवस्था भी की जा रही है. हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और वितरण केंद्र में स्थापित हाइड्रोजन रिसाव और आग का पता लगाने वाले विभिन्न सुरक्षा सेंसरों की नियमित रूप से जांच और सफाई की जाएगी ताकि धूल जमा न हो और सुरक्षित संचालन सुनिश्चित हो सके.

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स्पीड, रूट, शेड्यूल और किराया
हाइड्रोजन ट्रेन की स्पीड 75 किलो मीटर प्रति घंटा की है. यह 1200 KW इंजन वाली ट्रेन है. हाइड्रोजन ट्रेन रूट की बात करें तो यह जींद से सोनीपत के बीच चलेगी. लगभग 89 किलो मीटर की यह दूरी ट्रेन फिलहाल करीब दो घंटे में पूरी करेगी. इस रूट पर कुल 12 स्टेशन होंगे. इनमें शामिल हैं- जींद सिटी, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भम्बेवा, ईशापुर खेड़ी, बुटाना, खंदराई, गोहाना, रभड़ा, लाठ, मोहना और बड़वासनी.
रेल मंत्रालय के अनुसार, हरियाणा के जींद-सोनीपत खंड को ट्रेन के चलाने के लिए इन पायलट मार्ग के रूप में चुना गया है. इसके लिए जींद में एक स्वदेशी हाइड्रोजन भंडारण और ईंधन भरने की सुविधा स्थापित की गई है. पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) ने इस स्थल पर संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए आवश्यक लाइसेंस प्रदान कर दिया है.
अब समय की बात करें तो विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार, हाइड्रोजन ट्रेन (ट्रेन संख्या 74010) जींद से सुबह 7:40 बजे चलेगी और सोनीपत सुबह 9:40 बजे पहुंच जाएगी. वहीं, ट्रेन संख्या 74009 सोनीपत से सुबह 10:40 बजे चलेगी और दोपहर करीब एक बजे यह जींद पहुंच जाएगी.
हाइड्रोजन ट्रेन के किराया की बात करें तो अन्य ट्रेनों की तुलना में इसकी प्राइस कम बताई जा रही है. इसका किराया कम से कम 5 रुपये और अधिकतम 25 रुपये तक होना बताया जा रहा है.

अमेरिका समेत इन देशों की लिस्ट में शामिल भारत
जर्मनी, अमेरिका, जापान में पहले से ही हाइड्रोजन ट्रेन की सुविधाओं पर चर्चा होती रहीं हैं. अब भारत भी इन देशों के समूह में शामिल हो रहा है, जहां की जनता हाइड्रोजन ट्रेन की सवारी कर सकेंगी. रेल मंत्रालय के अनुसार, देश के इस पहल के साथ, भारत जर्मनी, जापान, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जो स्वच्छ रेल परिवहन के लिए हाइड्रोजन के उपयोग की संभावनाओं का पता लगा रहे हैं. चूंकि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, इसलिए वर्तमान में केवल कुछ ही देश ऐसी प्रणालियों का संचालन या परीक्षण कर रहे हैं.
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21 तोपों की सलामी के बीच भारत की पहली रेल यात्रा
अब बात भारतीय रेल इतिहास की करेंगे. रेल मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप की पहली रेलमार्ग बंबई (अब मुंबई) से ठाणे तक 21 मील के क्षेत्र में बिछाई गई थी. बंबई को ठाणे, कल्याण और थाल एवं भोरे घाटों से जोड़ने वाली रेलमार्ग का विचार सबसे पहले बंबई (अब मुंबई) सरकार के मुख्य अभियंता जॉर्ज क्लार्क के मन में 1843 में भांडुप की यात्रा के दौरान आया था.
औपचारिक उद्घाटन समारोह 16 अप्रैल 1853 को संपन्न हुआ, जब लगभग 400 अतिथियों को ले जा रही 14 रेलगाड़ियां दोपहर 3:30 बजे बोरी बंदर से रवाना हुईं. इस दौरान विशाल जनसमूह की जोरदार तालियों के बीच 21 तोपों की सलामी दी गई.
वहीं, पहली यात्री ट्रेन 15 अगस्त 1854 को हावड़ा स्टेशन से हुगली के लिए रवाना हुई, जिसकी दूरी 24 मील थी. इस प्रकार पूर्वी भारतीय रेलवे का पहला खंड आम जनता के लिए खोला गया, जिससे उपमहाद्वीप के पूर्वी हिस्से में रेल परिवहन की शुरुआत हुई.
देश के दक्षिण में पहली रेल लाइन 1 जुलाई 1856 को मद्रास रेलवे कंपनी द्वारा खोली गई थी. यह व्यासार्पडी जीवा निलयम (व्यासर्पंडी) और वालाजाह रोड (आर्कोट) के बीच 63 मील की दूरी तक फैली हुई थी.
उत्तर भारत में 119 मील लंबी लाइन 3 मार्च 1859 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से कानपुर तक बिछाई गई थी. हाथरस रोड से मथुरा छावनी तक का पहला खंड 19 अक्तूबर 1875 को यातायात के लिए खोला गया था. ये छोटी शुरुआत थी जो समय के साथ पूरे देश में रेलवे लाइनों के एक विशाल नेटवर्क में विकसित हुई.
1880 तक भारतीय रेलवे सिस्टम का कुल मार्ग लगभग 9000 मील था. अब भारतीय रेलवे का नेटवर्क करीब 69 हजार किलोमटर से अधिक फैल चुका है. आज के समय में भारतीय रेलवे, देश का प्रमुख परिवहन संगठन, एशिया का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है, जो एक ही प्रबंधन के अंतर्गत आता है.
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