Home मनोरंजन न एक्शन, न ग्लैमर और ना ही बड़ा बजट, फिर भी दिल जीत रही है Hanuman Ansh, जानें कैसी है फिल्म

न एक्शन, न ग्लैमर और ना ही बड़ा बजट, फिर भी दिल जीत रही है Hanuman Ansh, जानें कैसी है फिल्म

by Preeti Pal 31 August 2026, 4:23 PM IST
31 August 2026, 4:23 PM IST
न एक्शन, न ग्लैमर और ना ही बड़ा बजट, फिर भी दिल जीत लेती है Hanuman Ansh की कहानी, जानें कैसी है फिल्म

Hanuman Ansh Review: कुछ फिल्में खत्म होने के बाद भी दिल से बाहर नहीं निकलतीं. उनके किरदार, उनके डायलॉग और उनकी कहानी लंबे समय तक मन में चलती रहती है. ‘हनुमान अंश’ भी ऐसी ही फिल्म है. ये सिर्फ एक संत की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि भक्ति, त्याग, सेवा और ईश्वर से जुड़ने की उस यात्रा को पर्दे पर उतारती है, जिसे महसूस करने के लिए शायद शब्दों से ज्यादा दिल की जरूरत पड़ती है. डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की ये फिल्म श्री नीम करौली बाबा की जिंदगी और उनके आध्यात्मिक सफर पर बनी है. फिल्म एक ऐसे बच्चे से शुरू होती है, जो अपनी मां को खोने के बाद ये समझता है कि वो भगवान के पास चली गई हैं. बस यहीं से शुरू होती है उसकी तलाश, मां की भी और भगवान की भी. फिर कहानी उसे साधारण जिंदगी से उठाकर भक्ति और तपस्या की ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां रास्ते कठिन हैं, लेकिन मंजिल बहुत ही ज्यादा खूबसूरत.

कहानी में मासूमियत

फिल्म की कहानी एक भक्त और बच्चों के बीच होने वाली बातचीत से शुरू होती है. बच्चे बाबा के बारे में सवाल करते हैं और कहानी धीरे-धीरे उनके सामने खुलने लगती है. कहानी कहने का ये तरीका बहुत खूबसूरत है, क्योंकि ऐसा लगता है जैसे एक पीढ़ी अपनी आस्था और अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचा रही हो. कहानी में छोटे लक्ष्मीनारायण की एंट्री होती है, जो आगे चलकर नीम करौली बाबा बनते हैं. मां के जाने के बाद बच्चे के मन में एक ही सवाल है, अगर मां भगवान के पास गई हैं, तो भगवान कहां हैं? यहीं से उनकी तलाश शुरू होती है. हनुमान जी के लिए उनका प्यार बढ़ता है और श्रीराम का नाम उनकी सांसों का हिस्सा बनने लगता है. कभी पेड़ की डाल पर बैठकर नाम जपना, कभी मुश्किल रास्तों पर चलना और कभी पानी में खड़े होकर ध्यान करना. बच्चे की ऐसी तपस्या देखकर लगता है कि उसका शरीर छोटा है, लेकिन उसकी तलाश बहुत बड़ी. धीरे-धीरे वो घर छोड़कर भारत के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचता है. ब्रजभूमि से लेकर कच्छ के रण तक की यात्रा में उसे साधुओं का साथ मिलता है. रास्ते बदलते हैं, जगहें बदलती हैं, लेकिन श्रीराम की खोज नहीं बदलती.

कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट

फिल्म का एक बहुत खूबसूरत हिस्सा तब आता है, जब युवा बाबा को एक महंत अपने आश्रम में शरण देते हैं. यहां उनकी साधना आगे बढ़ती है और उनके अंदर मौजूद भगवान के अंश की झलक मिलती है. महंत ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि ये बच्चा प्रकृति के साथ कितने आराम से जुड़ा हुआ है. पेड़, पक्षी और आसपास के जीव-जंतु जैसे उसके लिए अलग दुनिया से नहीं, बल्कि उसी जिंदगी का हिस्सा हैं. लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब महंत उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनने का प्रस्ताव देते हैं. पद, सम्मान और सुख-सुविधा सब कुछ उनके सामने हैं. लेकिन बाबा का जवाब पूरी कहानी का रास्ता बन जाता है. वो समझ जाते हैं कि ये भी एक तरह का मोह है. इसलिए वो वहां रुकने के बजाय अपनी यात्रा आगे बढ़ाने का फैसला करते हैं.
यही वो पल है जहां फिल्म सिर्फ चमत्कारों की कहानी नहीं रहती. वो वैराग्य और भक्ति की कहानी बन जाती है.

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बाबा की दुनिया में चमत्कार

‘हनुमान अंश’ का सबसे मजबूत पक्ष बाबा की करुणा है. फिल्म में कई ऐसे सीन आते हैं जहां बाबा का लोगों के लिए प्यार और अपनापन दिखता है. उनके पास आने वालों में सिर्फ आस्तिक नहीं हैं. आम गांववाले हैं, गरीब लोग हैं, स्वतंत्रता सेनानी हैं और ऐसे लोग भी हैं जिन्हें भगवान पर विश्वास नहीं है. लेकिन बाबा किसी से सवाल नहीं करते. उनका दरवाजा सबके लिए खुला है. फिल्म का स्वतंत्रता सेनानी वाला ट्रैक खास तौर पर दिल छूता है. जो इंसान शुरुआत में नास्तिक है, वही धीरे-धीरे बाबा के प्यार में बदलने लगता है. यहां फिल्म एक खूबसूरत बात कहती है कि, कभी-कभी किसी को बदलने के लिए लंबे भाषण की जरूरत नहीं होती. किसी का सच्चा प्यार ही इंसान को बदलने के लिए काफी होता है.

गांववालों के बाबा

कैंची के गांववालों और बाबा का रिश्ता फिल्म में बहुत ही खूबसूरती के साथ दिखाया गया है. ये किसी संत और भक्त का फॉर्मल रिश्ता जैसा नहीं लगता, बल्कि ऐसा लगता है जैसे पूरा गांव बाबा के परिवार का हिस्सा हो. लोग उनकी सेवा के लिए उत्साहित रहते हैं. कभी-कभी तो मजाकिया अंदाज में इस बात पर बहस भी करते हैं कि बाबा को सबसे ज्यादा कौन प्यार करता है. फिल्म में एक और बहुत दिल छूने वाला सीन आता है, जब बाबा एक गरीब भक्त के घर खाना खाने पहुंचते हैं. घर की महिला को चिंता है कि कहीं खाना कम न पड़ जाए. लेकिन बाबा की मौजूदगी में ऐसा लगता है जैसे बर्तनों में रखा खाना खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा. फिल्म के इस सीन में भक्ति के साथ ह्यूमर, इमोशन, अपनापन और प्यार भी है. फिल्म ऐसे ही छोटे-छोटे पलों से बाबा के व्यक्तित्व को बड़ा बनाती है.

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जब ट्रेन से उतारा गया

फिल्म का सबसे याद रह जाने वाला सीन ब्रिटिश दौर का है. एक अंग्रेज बाबा को ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे से बाहर निकाल देता है. बाबा शांत रहते हैं, लेकिन इसके बाद ट्रेन आगे बढ़ ही नहीं पाती. लोग बाबा के पास पहुंचने लगते हैं. माहौल बदल जाता है और धीरे-धीरे ये एहसास होता है कि मामला सिर्फ एक रुकी हुई ट्रेन का नहीं है. फिल्म इस घटना को हनुमान जी की कृपा और अपने भक्त के लिए उनके प्यार से जोड़ती है. बाबा बाद में उस अंग्रेज से एक वादा लेते हैं कि भारत में किसी संत का अपमान नहीं किया जाएगा. ना ही किसी संत को ट्रेन से उतारा जाएगा. ये पूरा सीक्वेंस फिल्म को अलग लेवल पर ले जाता है.

भक्तों को भगवान से जोड़ना

फिल्म का एक और खूबसूरत मैसेज ये है कि सच्चा संत लोगों को अपने इर्द-गिर्द बांधकर नहीं रखता. वो उन्हें भगवान की तरफ ले जाता है. जब बाबा देखते हैं कि गांववाले लगातार उनके लिए तोहफे ला रहे हैं, तो वो उनका ध्यान हनुमान जी की तरफ मोड़ते हैं. हनुमान जी की मूर्ति स्थापित करने का सीन फिल्म के सबसे प्यारे हिस्सों में से एक है. भजन, जयकारे और भक्तों की खुशी के बीच ये सीन बताता है कि बाबा की भक्ति में वो खुद नहीं, बल्कि भगवान सबसे बड़े हैं. यही बात फिल्म को नॉर्मल संत-कथा से अलग करती है. कहानी के साथ-साथ एक्टिंग और विजुअल्स इस फिल्म की जान हैं. लीड रोल में शोभिनव सत्य ने नीम करौली बाबा के किरदार में जान डाल दी है. उनकी एक्टिंग में सबसे अच्छी बात ये है कि वो किरदार को जरूरत से ज्यादा ड्रमेटिक बनाने की कोशिश नहीं करते. बाबा की सादगी, उनकी शांत मुस्कान और उनकी आंखों के इमोशनल कई जगह डायलॉग से ज्यादा असर करती हैं. इसके अलावा चंदन के. आनंद, अनिल रस्तोगी और बाकी कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं. कास्टिंग के साथ-साथ फिल्म के विजुअल्स भी शानदार हैं. हरे-भरे पहाड़, झीलें, गांवों के सिंपल घर और भारत के अलग-अलग प्राकृतिक इलाकों को कैमरे ने बड़ी ही खूबसूरती से कैद किया है. कई फ्रेम ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि ये फिल्म नहीं, किसी खूबसूरत पेंटिंग का हिस्सा है.

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दिल पर दस्तक देता है म्यूज़िक

फिल्म का म्यूज़िक कहानी के इमोशन के साथ चलता है. ‘नमः शिवाय’ वाला हिस्सा इस कहानी को और गहरा कर देता है. ‘हृदय में जिनके सीता राम’ ऐसा गाना है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी मन में घूमता रहता है. ‘पार्वती’ माता वाला गाना कहानी के उस हिस्से में आता है जहां बाबा गृहस्थ जीवन की तरफ लौटते हैं. इसमें उत्तर भारत की संस्कृति, एक नई दुल्हन की भावनाएं और उसके सपनों को खूबसूरती से दिखाया गया है. वहीं ‘राम भजन की ओर’ हल्का-फुल्का लेकिन मन को सुकून देने वाला भजन है.

बेहतरीन क्लाइमैक्स

फिल्म का लास्ट हिस्सा अचानक कहानी में थ्रिल भर देता है. घने और डरावने जंगल, खतरा और उसके बीच हनुमान चालीसा का सहारा, ये पूरा सीक्वेंस दर्शकों को सीट से बांधकर रखता है. इसी बीच बाबा की एक बात बहुत खास लगती है कि अगर मंत्र मन से नहीं बोला, तो वो सिर्फ शब्द बनकर रह जाता है. यानी मंत्र का असर सिर्फ उसे बोलने में नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ उसे महसूस करने में है. फिर जब बाबा विदा लेते हैं और कैंची की पहाड़ियों में मिलने की बात कहते हैं, तो फिल्म धीरे-धीरे अपने क्लाइमैक्स तक पहुंचती है. थिएटर में रोशनी जलती है, लेकिन मन कुछ देर उसी कहानी में ठहरा रहता है. वैसे, ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये आपको सिर्फ इमोशनल नहीं करती, बल्कि आपको शांति भी देती है. ये फिल्म उन लोगों के लिए खास एक्सपीरियंस हो सकती है जिन्हें अध्यात्म, भारतीय संस्कृति और संतों की जिंदगी में दिलचस्पी है. लेकिन इसकी खूबसूरती सिर्फ भक्तों तक सीमित नहीं है. कहानी में इंसानियत, प्यार, ह्यूमर, रोमांच और रिश्ते इतने अच्छी ढंग से जुड़े हैं कि ये एक फैमिली एक्सपीरियंस भी बन जाती है.

देखें या नहीं?

‘हनुमान अंश’ को सिर्फ एक बायोपिक कहना इसके साथ नाइंसाफी होगी. ये एक बच्चे की भगवान की तलाश, एक साधक की तपस्या, एक संत की करुणा, भक्त और भगवान के बीच के खूबसूरत रिश्ते की कहानी है. फिल्म ये याद दिलाती है कि भारतीय परंपरा की सबसे बड़ी ताकत उसकी कहानियां हैं. संतों की, भक्तों की, ऋषियों की और उन लोगों की कहानियां जिन्होंने अपनी जिंदगी किसी बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित कर दी. ऐसे में अगर आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जिसमें बड़े पर्दे का विजुअल एक्सपीरियंस हो, दिल छूने वाली कहानी हो, भक्ति का रंग हो और खत्म होने के बाद मन में एक अजीब-सी शांति रह जाए, तो ‘हनुमान अंश’ आपके लिए एक ही है. वैसे भी, कभी-कभी फिल्म देखने के बाद तालियां नहीं बजतीं. बस मन चुप हो जाता है. ‘हनुमान अंश’ शायद उसी खामोशी की फिल्म है. यही वजह है कि सिर्फ 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 27 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा चुकी है.

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