Awarapan 2 and Batwara 1947 Review: अगर बॉलीवुड की फिल्मों को दो कैटेगरी में बांट दें, एक में पुरानी यादें और दूसरी में दमदार कहानी तो, इस बार हमारे सामने इन्हीं दो टेस्ट की फिल्में हैं. एक तरफ है इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’, जहां म्यूज़िक, दर्द, पुराने जख्म और ‘भट्ट कैंप’ वाली मोहब्बत का फॉर्मूला है. दूसरी तरफ है सनी देओल की ‘बटवारा 1947’, जो बंटवारे के दर्द के बीच इंसानियत की कहानी कहने की कोशिश करती है. दोनों ही फिल्में थिएटर्स में रिलीज हो चुकी हैं. लेकिन सवाल ये है कि, क्या ये फिल्म आपका टाइम और पैसों की हकदार हैं. अगर आप भी कन्फ्यूज हैं, तो रिव्यू पढ़ लें.
पहले बात ‘आवारापन 2’ की
‘आवारापन 2’ की सबसे बड़ी कहानी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि इमरान हाशमी की वापसी है. पहली ‘आवारापन’ को रिलीज हुए करीब 19 साल हो चुके हैं. तब इमरान का शिवम पंडित वाला दर्द, उसकी खामोशी और उसके अंदर का टूटा हुआ इंसान ऑडियन्स के दिल में बस गया था. ऊपर से ‘तेरा मेरा रिश्ता पुराना’ और ‘तो फिर आओ ना’ जैसे गाने. मतलब मामला सिर्फ फिल्म का नहीं, यादों का है. फिर जब किसी फिल्म का सीक्वल 19 साल बाद आता है, तो लोग थिएटर्स कहानी देखने कम और अपना पुराना इमोशनल पासवर्ड डालने के लिए ज्यादा जाते हैं. इमरान की ‘आवारापन 2’ भी इसी भरोसे पर खड़ी है. फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इमरान हाशमी हैं. हालांकि, सबसे बड़ी कमजोरी भी यही है कि फिल्म को पता है कि इमरान हैं. यही वजह है कि बाकी चीजों पर ज्यादा मेहनत करने की जरूरत शायद महसूस ही नहीं हुई. वैसे भी राघव जुयाल ने कभी कहा था, अक्खा बॉलीवुड एक तरफ, इमरान हाशमी एक तरफ. इस फिल्म के बाद तो ये लाइन और भी फिट लगती है.

कहानी कहां गई?
पहली फिल्म में शिवम प्यार के लिए तड़पता है. ‘आवारापन 2’ में वही शिवम अब एक नए मिशन पर निकलता है. कहानी उसे जयपुर से थाईलैंड ले जाती है, जहां दो ड्रग गैंग्स के बीच लड़ाई चलती है. एक तरफ अमृत सिंह का गैंग है और दूसरी तरफ बैंकॉक की ‘क्वीन’ कही जाने वाली नफीसा नवाज, जिसका रोल शबाना आजमी निभा रही हैं. यहां आते ही फिल्म कहती है, अब कुछ कमाल होगा. थाईलैंड है, गैंगस्टर हैं, बंदूकें हैं, कार चेज हैं, ड्रग्स हैं, चमचमाते कपड़े हैं और इमरान हाशमी का वही चेहरा है. हालांकि, उन्हें देखकर लगता है कि इस आदमी ने जिंदगी में खुशी का ऑप्शन कभी डाउनलोड ही नहीं किया. वहीं, शबाना आजमी शानदार हैं, लेकिन कहानी ने उन्हें यूज ही नहीं किया. इन सबके अलावा फिल्म में ‘जारा’ यानी दिशा पाटनी भी हैं. वो क्राइम की दुनिया से खुद को और अपने भाई को दूर ले जाना चाहती है. शिवम और जारा की कहानी यहीं से शुरू होती है. मगर दोनों के बीच वो केमिस्ट्री फील नहीं होती जिसकी फिल्म को जरूरत थी. ऐसे में पहले वाली ‘आवारापन’ जीत जाती है. श्रीया सरन की आलिया भले ही मर चुकी है, लेकिन पूरी फिल्म में उसका ना होना भी होना सा ही है.
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असली खूबसूरती
फिल्म की असली खूबसूरती यहीं है. जब पुराने फ्लैशबैक आते हैं, पुराने गानों सुनाई देते हैं और शिवम के पुराने जख्म उभरते हैं, तब ‘अवारापन 2’ स्पीड पकड़ती है. फिर जैसे ही फिल्म नई कहानी पर लौटती है, मामला ढीला पड़ जाता है. कार चेज अच्छा है, एक्शन ठीक है औक बैकग्राउंड म्यूजिक भी माहौल बनाता है. लेकिन दिल पूछता है, “ कहानी कहां है, कहानी में जो दर्द था वो कहां है? जवाब मिलता है, लापता है. हां मगर ‘जुनून’ जैसे गानों में पुरानी भट्ट कैंप वाली मोहब्बत सुनाई देती है. फिर कहीं-कहीं ऐसा भी लगता है कि फिल्म कहानी से ज्यादा आपकी Spotify playlist को रीफ्रेश करने आई है, जिसमें वो सक्सेसफुल भी होती है. यानी अगर आप पुराने इमरान हाशमी वाले दौर के फैन हैं, तो कुछ सीन आपको सीधे 2000 वाले टाइम में पहुंचा देंगे. वहीं, अगर आपने पहली वाली ‘आवारापन’ नहीं देखी तो, नई वाली से रिश्ता नहीं बन पाएगा.
बटवारा 1947..
अब बात करते हैं सनी देओल की ‘बटवारा 1947’ की. ‘आवारापन 2’ मोहब्बत के पुराने जख्म कुरेदती है. वहीं, ‘बटवारा 1947’ देश के सबसे बड़े जख्मों में से एक यानी पार्टिशन को छूती है. सिकंदर मिर्जा का किरदार सनी देओल ने निभाया है, जो अपने परिवार के साथ मेरठ से लाहौर पहुंचता है. उसके साथ पत्नी हमीदा, बेटा जावेद और बेटी तन्नो हैं. उन्हें रहने के लिए एक बड़ी हवेली मिलती है. लेकिन एक ट्विस्ट ये ही कि घर खाली नहीं मिलता. वहां एक बुजुर्ग हिंदू महिला रहती है माई, जिसका कैरेक्टर शबाना आजमी ने निभाया है. यहीं से शुरू होती है फिल्म की असली कहानी.

फिर वही ढाई किलो का हाथ
सनी देओल का गुस्सा, उनकी आवाज और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस आज भी जबरदस्त है. जब वो गुस्से वाला डायलॉग बोलते हैं तो, थिएटर में बैठे लोग हिल जाते हैं. लेकिन प्रोब्लम भी वही है. कई जगह सनी देओल की स्टार इमेज कहानी से इतनी बड़ी हो जाती है कि फिल्म का सेंसिटिव हिस्सा पीछे छूट जाता है. बीच-बीच में लगता है जैसे ‘गदर’ का कोई भूला हुआ सीन गलती से ‘बटवारा 1947’ के सेट पर आ गया हो. वैसे, ये कहना गलत नहीं है कि अगर सनी देओल फिल्म की ताकत हैं, तो शबाना आजमी उसकी आत्मा हैं. माई के कैरेक्टर में जिद है, डर है, अकेलापन है और उम्मीद भी है. वो अपने बेटे का इंतजार कर रही है और अपना घर छोड़ना नहीं चाहती. धीरे-धीरे सिकंदर और उसका परिवार माई को बोझ समझने की जगह उसे फैमिली का हिस्सा मानने लगता है. वैसे, फिल्म में प्रीति जिंटा भी हैं, जो अपने किरदार में अच्छी लग रही हैं, लेकिन उनका रोल बहुत स्ट्रॉन्ग नहीं है. करण देओल की बात करें तो फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी वही लगते हैं.
आखिरी फैसला
‘आवारापन 2’ और ‘बटवारा 1947’ दो अलग-अलग जॉनर की फिल्में हैं. ‘आवारापन 2’ इमरान हाशमी के लिए है. यानी अगर आप पुराने इमरानियन हैं, ‘तेरा मेरा रिश्ता पुराना’ सुनते ही 2000 के टाइम में चले जाते हैं, ये फिल्म देखी जा सकती है. दूसरी तरफ ‘बटवारा 1947’ के पास शानदार कॉन्सेप्ट है, किन कहानी जरूरत से ज्यादा कमर्शियल हो जाती है. यानी अगर इसे थोड़ा सॉफ्ट, थोड़ा छोटा और थोड़ा कम ‘सनी देओल मोड’ में बनाया जाता, तो ये बढ़िया पार्टिशन फिल्म बन सकती थी. पर क्या करें, दिल बोले ‘इमरान’ और कहानी बोले ‘बटवारा 1947’. वैसे, आपका दिल किस फिल्म को देखने का कर रहा है?
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