Home Top News क्या सच में खाड़ी देशों को सता रही है ईरान-US समझौते की चिंता? इन मुद्दों पर हैं मतभेद; विस्तार से जानें

क्या सच में खाड़ी देशों को सता रही है ईरान-US समझौते की चिंता? इन मुद्दों पर हैं मतभेद; विस्तार से जानें

by Sachin Kumar 25 June 2026, 9:05 PM IST (Updated 26 June 2026, 11:18 AM IST)
25 June 2026, 9:05 PM IST (Updated 26 June 2026, 11:18 AM IST)
Gulf nations worried Iran-US agreement

Gulf Country : बीते चार महीनों से चले आ रही ईरान और अमेरिका के बीच जंग, अब किसी मोड़ पर पहुंचने की संभावना लग रही है. सैन्य तनाव और संघर्ष को रोकने के लिए एक अंतरिम शांति समझौता भी लागू किया गया है. साथ ही दोनों देशों ने 60 दिनों तक के लिए युद्धविराम और शांति वार्ता पर अपनी सहमति जाहिर की है. इस समझौते का उद्देश्य स्थायी शांति, समुद्री व्यापार की सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव को कम करना है. अब 60 दिनों तक के लिए अस्थायी शांति के बीच 14 प्वाइंट का प्रस्ताव पेश किया गया है और इस पर चर्चा होगी. हालांकि, महत्वपूर्ण समुद्री गलियारे को खोल दिया गया है और अब वहां से मालवाहक जहाजों का भी आवागमन भी शुरू हो गया है. बता दें कि युद्ध और तनाव के बीच समझौते प्रस्ताव पर डिजिटल हस्ताक्षर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी प्रेसिडेंट मसूद पेजेशकियान ने किए. इस ऐतिहासिक कूटनीतिक की पहल में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका रही और शुरुआती बातचीत इस्लामाबाद से ही शुरू हुई थी. इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में फंसे खाड़ी देशों को चिंता सताने लगी है. अगर इस समुद्री गलियारे में तनाव फिर से बढ़ता है तो इन देशों को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला है.

मामला यह है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने इन्हीं खाड़ी देशों को निशाना बनाया था. ईरान ने खाड़ी देशों में स्थित अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया और मिसाइलों से हमला करके उन्हें बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया. इसी बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में भारी तनाव पैदा हो गया और कोई भी मालवाहक जहाज वहां से नहीं गुजर पा रहा था. इसका असर सीधा खाड़ी देशों पर हो रहा था और उनकी अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव देखने को मिला. वहीं, अमेरिका इस युद्ध में इजरायल की वजह से आया है और यह समझौता कितने दिनों तक टिकेगा इसके बारे में कोई नहीं जानता है. खाड़ी देशों को यह भी चिंता सता रही है कि अगर यह समझौता ज्यादा दिन तक नहीं टिक पाया तो फिर से खाड़ी में अस्थिरता आ जाएगी.

समझौते के बाद भी हुआ लेबनान पर हमला

एक तरफ जहां अमेरिका और ईरान के बीच में शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे दूसरी तरफ इजरायल लगातार लेबनान पर हमला कर रहा था. इसी बीच पता चला है कि डील पर साइन होने के करीब 48 घंटे के भीतर इजरायल ने हवाई हमला कर दिया और वहां पर कई लोगों की मौत हो गई. हालांकि, इसी बीच इजरायल ने अपने चार सैनिकों के मारे जाने की भी खबर दी. वहीं, ईरान और अमेरिका के बीच हुए समझौते में साफ-साफ लिखा है कि लेबनान समेत सभी मोर्चे पर लड़ाई को तत्काल रोक दिया जाएगा. लेबनान को लेकर अमेरिका का कहना है कि उस इलाके को लेकर नया समझौता हुआ है, लेकिन इस तरह समझौते हमेशा कमजोर पाए गए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी कहीं स्थिति तय नहीं थी कि ईरान समेत सभी मोर्चों पर जंग रुक जाएगी. लेबनान में कुछ समय के लिए हिंसा बढ़ना लगभग तय था. अब खाड़ी क्षेत्रों में इस बात की भी चिंता सताने लगी है कि कहीं ये शांति समझौता सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए. इसके अलावा कुछ लोगों का मानना है कि इस बार हुआ समझौता काफी गंभीर है और वह लंबे समय तक टिक सकता है. हालांकि, अभी कई लोगों को लगता है कि इसकी सफलता पर इतनी जल्दी भरोसा करना सही नहीं होगा. दूसरी तरफ सभी देश इस पर काफी करीबी से नजर बनाए हुए हैं और इजरायल को भी देख रहे हैं कि वह कहीं इस समझौते को तुड़वा न दें.

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क्या समझौते से मिलेगी सफलता?

ईरान और अमेरिका के बीच हुए 60 दिनों के शांति समझौते से दुनिया भर के देशों ने राहत की सांस ली है. साथ ही खड़ी देश भी चाहते हैं कि यह समझौता स्थायी रूप से लागू हो जाए. वह अपने तेल का निर्यात बिना किसी रुकावट के पूरी दुनिया में बेचना चाहते हैं. अगर किसी तरह से यह समझौता विफल हो जाता है तो एक बार फिर होर्मुज डिस्टर्ब हो जाएगा और तेल-गैस की सप्लाई में बाधा आ जाएगी. वहीं, युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने सबसे पहले इस समुद्री गलियारे को बंद किया था. हालांकि, समझौते होने के बाद इस गलियारे को खोल दिया है और धीरे-धीरे गैस की सप्लाई भी शुरू हो गई है. इसके अलावा अमेरिका के नौसेना के जहाज ईरान के बंदरगाहों से अपनी नाकेबंदी को हटाना शुरू कर दिया है.

अमेरिका नहीं कर रहा शर्तों का पालन

वहीं, लेबनान पर इजरायली हमले शुरू होने के बाद ईरान के ख़ातम-अल-अंबिया ने घोषणा की है कि अमेरिका समझौते की पहली शर्त का पालन नहीं कर रहा है. इस वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से बंद किया जा सकता है. आपको बताते चलें कि जब होर्मुज को खोलने की खबर सामने आई तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतें 80 डॉलर बैरल से नीचे आ गईं. अगर इस सप्लाई में रुकावट आती है तो इस खित्ते में मौजूद देशों को काफी आर्थिक नुकसान होगा और वह अभी इस स्थिति में है नहीं कि अपने व्यापार को रोक दें. वहीं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण ईरान के लिए एक परमाणु कार्यक्रम से कम नहीं है. साथ ही अगर यह समुद्री गलियारे पर ईरान का कब्जा नहीं होता तो यह युद्ध काफी लंबा खिंच सकता था.

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कौन देगा ईरान को 300 अरब डॉलर?

वहीं, दोनों देशों के बीच में 14 प्वाइंट के अलावा आर्थिक लाभ देने का भी वादा किया गया है. इसमें सबसे प्रमुख ईरान पर लगाए प्रतिबंधों में ढील, ईरानियों की फ्रीज संपत्तियों को रिलीज करना और 300 अरब डॉलर का एक फंड तैयार करना शामिल है. ईरान इस फंड का इस्तेमाल अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को फिर से खड़ा करने के लिए मांग रहा है. अब सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि इस फंड को कौन-सा संगठन या फिर देश देगा? दूसरी तरफ अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ कह दिया है कि 300 अरब डॉलर का फंड खाड़ी देशों का गठबंधन चुकाएगा. हालांकि, इस दौरान उन्होंने कोई विस्तार से इसके बारे में जानकारी साझा नहीं की. लेकिन अभी तक किसी भी खाड़ी देश ने इस फंड को चुकाने की बात को स्वीकार नहीं किया है और न ही इस पर कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया दी है.

कुछ लोगों का कहना है कि इस युद्ध की कीमत खाड़ी देश चुकाएंगे, जिन्होंने इस युद्ध को शुरू ही नहीं किया था. अब अरब राजीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हम नहीं चाहते हैं कि हमारे देश ईरान को किसी प्रकार की आर्थिक मदद दें, बल्कि ईरान को हमें मुआवजा देना चाहिए. नहीं तो इस युद्ध की कीमत को इजरायल और उसके सहयोगियों को चुकानी चाहिए.

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क्या अमेरिका कर पाएगा राजी?

अभी यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है कि अमेरिका क्या खाड़ी देशों से इन फंड को दिलवाने की कोशिश कर रहा है या नहीं. बताया जा रहा है कि खाड़ी इतनी बड़ी राशि देने के लिए तैयार नहीं होंगे और इस स्थिति में तो बिल्कुल भी नहीं कि इस तरह का युद्ध फिर से शुरू हो सकता है. साथ ही अभी ईरान और उसके पड़ोसी देश के बीच रिश्तों में काफी दूरी बनी हुई है. हालांकि, निवेश के माध्यम से रिश्तों में काफी बेहतरी आ सकती है और मेल-मिलाप भी बढ़ सकता है. लेकिन अभी खाड़ी देशों को मजबूत सुरक्षा की गारंटी चाहिए. उसके बाद ही वह किसी खास नतीजे पर पहुंचने के लिए विचार विमर्श करेंगे.

फिलहाल के लिए समझौता का भविष्य अभी अनिश्चित दिखाई दे रहा है. लेकिन आम लोगों के लिए यह राहत की खबर है कि अगले 60 दिनों तक कोई भी हमला नहीं होने वाला है और इन 60 दिनों में तनाव को कम करने के लिए चर्चा होगी. साथ ही आम लोगों को सायरन बजने पर नींद में नहीं उठना होगा. दूसरी तरफ उन देशों को भी शांति मिली है जिनकी ऊर्जा इस रास्ते से गुजरती थी और इस युद्ध का असर उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा था.

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पाकिस्तान की स्थिति हुई मजबूत?

इस शांति समझौते में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही थी और उसकी मध्यस्थता में दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस डील पर साइन किए थे. अब पाकिस्तान दुनिया में अपनी पीट थपथपा रहा है और बता रहा है कि उसने दुनिया में जारी संकट को खत्म करने काम किया है. वहीं, चीन ने भी पाकिस्तान की तारीफ की है और बिना शर्त इस मुद्दे पर उसे मदद करने का वादा किया है. इसी कड़ी में न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया फ्रांस, नॉर्वे से लेकर मलेशिया तक तमाम देशों की मीडिया पाकिस्तान की लीडरशिप की सराहना की है. वहीं, पाकिस्तान के साथ कतर ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है. अब सवाल उठता है कि पाकिस्तान इस मध्यस्थता के माध्यम से दुनिया से क्या लाभ लेने की कोशिश कर रहा है? साथ ही क्या वह अपने देश में पल रहे आतंकवाद वाली छवि को साफ करने की कोशिश करेगा या फिर इसके नाम पर दुनिया के अन्य देशों से कर्जा मांगेगा? कुछ भी हो लेकिन पाकिस्तान ने की कई देशों ने तारीफ की है और अमेरिका ने भी इस मध्यस्थता के लिए सराहा है.

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