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ताशकंद में महामंथन: क्या भारत के साथ रक्षा व व्यापार के नए गठजोड़ से बदलेगी दुनिया की तस्वीर?

by Sanjay Kumar Srivastava 28 August 2026, 9:39 PM IST (Updated 28 August 2026, 9:46 PM IST)
28 August 2026, 9:39 PM IST (Updated 28 August 2026, 9:46 PM IST)
ताशकंद में महामंथन: रक्षा सहयोग पर टिकीं दुनिया की निगाहें, मोदी की यात्रा से क्या बदलेंगे वैश्विक व्यापार के समीकरण?

India-Uzbekistan: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा से नई दिल्ली और ताशकंद के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई गति मिल सकती है. इससे व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और सुरक्षा के क्षेत्रों में मौजूदा समझौतों को ठोस नतीजों में बदला जा सकेगा. विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के निमंत्रण पर मोदी 29-30 अगस्त को ताशकंद की राजकीय यात्रा करेंगे. मध्य एशियाई देश की यह उनकी चौथी यात्रा होगी. इस यात्रा के दौरान मोदी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के लिए मिर्जियोयेव के साथ प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत करेंगे. दोनों नेताओं के व्यापार और निवेश, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा, शिक्षा और लोगों के बीच आपसी संबंधों में सहयोग की समीक्षा करने की उम्मीद है.

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एक नया अध्याय खोल सकती है यात्रा

उज़्बेकिस्तान के विदेश मंत्रालय के तहत ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ वर्ल्ड इकोनॉमी एंड डिप्लोमेसी’ में डिप्लोमैटिक एकेडमी के निदेशक और पूर्व राजदूत अब्दुसमद खायदारोव ने PTI को बताया कि यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में एक नया अध्याय खोल सकती है. उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में दोनों देशों ने एक मजबूत कानूनी और संस्थागत ढांचा और आपसी भरोसे की नींव तैयार की है, लेकिन अब इस साझेदारी को और अधिक व्यावहारिक रूप देने की ज़रूरत है. खायदारोव ने कहा कि 2025 में दोनों देशों के बीच व्यापार 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने के बावजूद मौजूदा व्यापार का स्तर दोनों देशों की क्षमता से कम है.

फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल्स पर खास जोर

पूर्व राजदूत अब्दुसमद खायदारोव ने कहा कि मोदी की यात्रा का एक अहम नतीजा यह हो सकता है कि अगले तीन वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने के तय लक्ष्य को हासिल करने के लिए ठोस तरीके अपनाए जाएं. उन्होंने कहा कि फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल्स, कृषि, फूड प्रोसेसिंग, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और डिजिटल सेवाओं जैसे क्षेत्रों पर खास ध्यान दिया जा सकता है, क्योंकि इनमें बड़े पैमाने पर व्यावसायिक सहयोग की गुंजाइश है.
खायदारोव को उज़्बेकिस्तान में भारतीय निवेशकों की अधिक सक्रिय भूमिका की भी उम्मीद है. उन्होंने कहा कि ताशकंद उन प्रमुख देशों और कंपनियों के साथ निवेश सहयोग बढ़ा रहा है जो मध्य एशियाई बाजार में अपनी मौजूदगी बनाना चाहते हैं.

हेल्थ केयर और शिक्षा में पहले से ही मौजूदगी

पूर्व राजदूत अब्दुसमद खायदारोव ने कहा कि उज़्बेकिस्तान के पास काफी अवसर हैं और वह भारतीय निवेश तथा दीर्घकालिक निवेश परियोजनाओं को लागू करने के लिए अनुकूल माहौल बनाने में रुचि रखता है. उन्होंने कहा कि इस यात्रा के दौरान स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, मानव पूंजी विकास, विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा सामाजिक परियोजनाओं में सहयोग को भी नई गति मिल सकती है. खायदारोव ने कहा कि भारत पहले से ही उज़्बेकिस्तान में हेल्थ केयर और शिक्षा जैसे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में शामिल है और अगला कदम ह्यूमन कैपिटल डेवलपमेंट और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के मकसद से बड़े संयुक्त इनिशिएटिव्स की ओर बढ़ना हो सकता है. कनेक्टिविटी पर उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत को सेंट्रल एशिया से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. हालांकि इसका पूरा इस्तेमाल ईरान से जुड़े इंटरनेशनल हालात के सामान्य होने पर निर्भर करेगा.

मध्य और दक्षिण एशिया के बीच ट्रांसपोर्ट लिंक का सुझाव

इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) शिप, रेल और सड़क मार्गों का 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मॉडल नेटवर्क है, जिसे भारत, ईरान, रूस, सेंट्रल एशिया और यूरोप के बीच माल की ढुलाई के लिए बनाया गया है. ईरान का चाबहार पोर्ट INSTC के लिए एक अहम समुद्री गेटवे है, जो पाकिस्तान से होकर गुजरे बिना भारतीय व्यापार को सेंट्रल एशिया तक पहुंचने में मदद करता है. हालांकि अप्रैल 2026 में US की ओर से प्रतिबंधों में दी गई छूट खत्म होने और US व इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के बाद इस पोर्ट पर नई दिल्ली के स्ट्रैटेजिक ऑपरेशन्स के सामने भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है.

खायदारोव ने आगे कहा कि लंबे समय में चाबहार सेंट्रल एशिया को हिंद महासागर और दक्षिण एशिया के बाज़ारों से जोड़ने वाले व्यावहारिक रास्तों में से एक बन सकता है. खायदारोव ने मध्य और दक्षिण एशिया के बीच अलग-अलग तरह के ट्रांसपोर्ट लिंक बनाने का भी सुझाव दिया. इसमें उज़्बेकिस्तान का टर्मेज़ और उसका इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर, भारतीय व्यवसायों सहित व्यापारिक संबंध बढ़ाने के लिए एक हब के तौर पर काम कर सकते हैं.

सुरक्षा सहयोग से रिश्ते में आएगी मजबूती

खायदारोव ने कहा कि सुरक्षा सहयोग इस रिश्ते का एक और अहम आधार बना रहेगा. संयुक्त सैन्य अभ्यास, कर्मियों की ट्रेनिंग और आतंकवाद रोधी प्रयासों में पहले से मौजूद सहयोग, आगे और गहरे जुड़ाव का आधार बनेंगे. उन्होंने कहा कि संभावित क्षेत्रों में साइबर सुरक्षा, सैन्य शिक्षा और ट्रेनिंग, विशेषज्ञता का आदान-प्रदान, अंतरराष्ट्रीय खतरों का मुकाबला और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शामिल हैं. खायदारोव ने कहा कि मेरी नज़र में इस दौरे का मुख्य नतीजा साइन किए गए डॉक्युमेंट्स की संख्या से नहीं, बल्कि पहले से हुए समझौतों को लागू करने के लिए ठोस सिस्टम बनाने से मापा जाना चाहिए.

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लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं दूर

खायदारोव ने कहा कि लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतें जैसे कि दोनों देशों के बीच सीधे ज़मीनी रास्ते का न होना, डिजिटल सेवाओं, इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी और बायोटेक्नोलॉजी में ज़्यादा सहयोग से कुछ हद तक दूर की जा सकती हैं. उन्होंने कहा कि व्यापार, निवेश, संयुक्त उत्पादन, सुरक्षा और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में एक मज़बूत साझेदारी भारत-उज़्बेकिस्तान संबंधों को मध्य और दक्षिण एशिया के बीच व्यापक कनेक्टिविटी का एक अहम हिस्सा बना सकती है. विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि उज़्बेकिस्तान अपनी ‘रेयर अर्थ’ इंडस्ट्री को तेज़ी से विकसित कर रहा है ताकि वह सिर्फ़ कच्चे माल के निर्यात से आगे बढ़कर नए प्रोजेक्ट्स, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के ज़रिए ज़्यादा मूल्य वाले उत्पाद बना सके.

16,000 से ज्यादा भारतीय छात्र कर रहे पढ़ाई

विदेश मंत्रालय ने दोनों देशों के लोगों के बीच गहरे संबंधों पर ज़ोर देते हुए बताया कि अभी 16,000 से ज़्यादा भारतीय छात्र उज़्बेकिस्तान में पढ़ाई कर रहे हैं और वहां चार भारतीय यूनिवर्सिटी कैंपस भी चल रहे हैं. अपनी यात्रा के दौरान मोदी के ताशकंद में शास्त्री मेमोरियल और ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ ओरिएंटल स्टडीज़ में महात्मा गांधी सेंटर जाने की भी उम्मीद है. ताशकंद से मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाले 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए किर्गिज़स्तान जाएंगे.

भारत-उज्बेकिस्तान ऐतिहासिक संबंध: नेहरू से मनमोहन सिंह तक का सफर

भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्ते सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक धागों से बंधे हैं. वर्तमान में भले ही मध्य एशिया के साथ रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई मिल रही हो, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार से पहले की सरकारों के कार्यकाल में भी उज़्बेकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते बेहद प्रगाढ़ और ऐतिहासिक रहे हैं. सोवियत संघ के दौर से लेकर उज़्बेकिस्तान की आज़ादी के बाद तक नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह की सरकारों ने ताशकंद के साथ सहयोग की मजबूत नींव रखी थी.

सोवियत काल: नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी का दौर

उज़्बेकिस्तान जब सोवियत संघ का हिस्सा था, तब से ही भारत के प्रधानमंत्रियों ने इस क्षेत्र के साथ गहरा जुड़ाव रखा.

जवाहरलाल नेहरू का विजन: भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जून 1955 और फिर सितंबर 1961 में उज़्बेकिस्तान के ऐतिहासिक शहरों ताशकंद और समरकंद का दौरा किया था. नेहरू सरकार ने उज़्बेकिस्तान के साथ सांस्कृतिक, शैक्षणिक और वैज्ञानिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया. इसी दौर में दोनों देशों के बीच जनता के स्तर पर जुड़ाव मजबूत हुआ.

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ताशकंद समझौता (1966): भारत के इतिहास में ताशकंद का नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया जब 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद शांति समझौते के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जनवरी 1966 में ताशकंद पहुंचे थे. हालांकि, इसी ऐतिहासिक समझौते के ठीक बाद वहां उनका रहस्यमय निधन हो गया, जिसकी याद में आज भी ताशकंद में ‘शास्त्री मेमोरियल’ मौजूद है.

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का कार्यकाल: इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय भारत-सोवियत संबंधों के स्वर्णिम काल में उज़्बेक क्षेत्र के साथ व्यापार, फिल्म और रक्षा तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा.

मोदी से ठीक पहले: डॉ. मनमोहन सिंह का दौरा और समझौते

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 25-26 अप्रैल 2006 को उज़्बेकिस्तान का आधिकारिक दौरा किया था. स्वतंत्र उज़्बेकिस्तान का किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा यह दूसरा दौरा था. इस यात्रा के दौरान भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच इन प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर हुए.

ऊर्जा और तेल-गैस क्षेत्र: भारत की ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (OVL) और उज़्बेक कंपनी के बीच तेल और प्राकृतिक गैस की खोज के लिए रणनीतिक समझौता हुआ. उज़्बेकिस्तान के विशाल गैस भंडारों को देखते हुए यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद अहम कदम था.
खनिज अन्वेषण (Mining): दोनों देशों के बीच सोने और अन्य मूल्यवान खनिजों की माइनिंग के क्षेत्र में सहयोग पर सहमति बनी.
सूचना प्रौद्योगिकी (IT Sector): भारत सरकार के सहयोग से ताशकंद में ‘जवाहरलाल नेहरू सूचना प्रौद्योगिकी केंद्र’ स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई गई.
आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त लड़ाई: दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, धार्मिक उग्रवाद और ड्रग तस्करी के खिलाफ मिलकर लड़ने और खुफिया जानकारी साझा करने का मजबूत समझौता किया.
शिक्षा, कृषि और वस्त्र उद्योग: इन क्षेत्रों में तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने और व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए समझौते किए गए.

मोदी सरकार से पहले की नीतियों ने उज़्बेकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों को केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि सुरक्षा और ऊर्जा के मोर्चे पर भी एक मजबूत ढांचा प्रदान किया था, जिसे आज आगे बढ़ाया जा रहा है.

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