Devdas: इंडियन सिनेमा में कुछ कहानियां ऐसी बनी हैं, जिन्हें देखने के बाद लगता है कि ये शायद हमारे बीच से ही निकली है. प्यार, परिवार, समाज, जुदाई, पछतावा और अधूरी मोहब्बत, इन सबका शानदार कॉम्बिनेशन बहुत कम कहानियों में देखने को मिलता है. शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की मशहूर रचना ‘देवदास’ ऐसी ही कहानी है, जिसने किताब के पन्नों से निकलकर करीब एक सदी तक भारतीय सिनेमा पर अपना जादू बनाए रखा है. ‘देवदास’ की कहानी को भारतीय भाषाओं में बार-बार पर्दे पर उतारा गया. कभी केएल सहगल एक टूटे हुए आशिक बने, कभी दिलीप कुमार ने देवदास के दर्द को अपनी अदाकारी से अमर कर दिया और फिर शाहरुख खान ने इसे अपने अंदाज़ से मॉर्डन लव स्टोरी बना दिया. संजय लीला भंसाली की देवदास मॉर्डन बॉलीवुड अंदाज के साथ नई पीढ़ी तक पहुंई. यही वजह है कि ‘देवदास’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की एक पुरानी परंपरा बन चुकी है.

आखिर क्यों है इतनी खास?
‘देवदास’ ओरिजनली शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का नोवल है, जो 1917 में बंगाली भाषा में लिखा गया था. कहानी देवदास पर लिखी गई, जिसके बचपन का प्यार पार्वती यानी पारो और चंद्रमुखी हैं. देवदास और पारो एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन परिवार और समाज दोनों के रिश्ते के बीच दीवार बन जाते हैं. देवदास इस जुदाई को झेल नहीं पाता. पारो से दूर होकर वो खुद को बर्बाद करने के लिए शराब की तरफ धकेलता चला जाता है. दूसरी तरफचंद्रमुखी उससे सच्चा प्यार करने लगती है, लेकिन देवदास अपने अतीत और पछतावे से बाहर ही नहीं निकल पाता. यही दुखभरी कहानी हर दौर के फिल्म मेकर्स को अपनी तरफ खींचती रही. कहानी का ढांचा वही रहा, लेकिन हर डायरेक्टर ने अपने टाइम और तरीके से देवदास को नया रंग दिया.
जब पहली बार आया देवदास
‘देवदास’ की पहली फिल्मी जर्नी साल 1928 में शुरू हुई. उस टाइम नरेश चंद्र मित्र ने इस कहानी पर फिल्म बनाई. ये फिल्म मूक थी, यानी बिना डायलॉग वाली फिल्म. उस समय फिल्मों में आवाज का दौर पूरी तरह शुरू नहीं हुआ था, लेकिन देवदास की कहानी ने दर्शकों को अपनी तरफ फिर भी खींचा. इसके बाद कहानी को सबसे बड़ी पहचान पीसी बरुआ की फिल्मों से मिली. साल 1935 में उन्होंने बंगाली भाषा में ‘देवदास’ बनाई और खुद हीरो का रोल निभाया. अगले साल यानी 1936 में इसका हिंदी वर्जन सामने आया, जिसमें मशहूर सिंगर और एक्टर केएल सहगल ने ‘देवदास’ का किरदार निभाया. सहगल की आवाज और एक्टिंग ने ‘देवदास’ के दर्द को अलग ही पहचान दे दी. उनकी फिल्म इतनी ज्यादा पॉपुलर हुई कि लंबे समय तक पर्दे पर ‘देवदास’ की इमेज केएल सहगल के चेहरे से होती रही.

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फिर दिलीप बने देवदास
देवदास की कहानी को हिंदी सिनेमा में एक और बड़ा पड़ाव साल 1955 में मिला. अपने टाइम के मशहूर और दिग्गज डायरेक्टर बिमल रॉय ने इस कहानी को बड़े पर्दे के लिए दोबारा बनाया. इस बार ‘देवदास’ बने दिलीप कुमार. फिल्म में सुचित्रा सेन ने पारो और वैजयंतीमाला ने चंद्रमुखी का रोल किया. ये वो दौर था जब हिंदी सिनेमा में एक्टिंग को लेकर एक नई सीरियसनेस देखने को मिल रही थी. वहीं, दिलीप कुमार को ‘ट्रेजेडी किंग’ की पहचान मिल चुकी थी. ऐसे में देवदास का किरदार उनपर बिल्कुल फिट भी बैठ रहा था. दिलीप कुमार का शांत चेहरा, अंदर का दर्द और टूटते हुए इंसान को पर्दे पर दिखाने का अंदाज ‘देवदास’ की सबसे बड़ी ताकत बना. बिमल रॉय की फिल्म को आज भी हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्मों में गिना जाता है. यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के भारतीय सिनेमा संसाधन में भी 1955 की इस फिल्म को ‘देवदास’ बेहतरीन ट्रांसफोर्मेशन में शामिल किया गया है. इतना ही नहीं इस फिल्म को 3 फिल्मफेयर और एक नेशनल अवॉर्ड भी मिला. दिलीप कुमार को उनकी बेहतरीन एक्टिंग के लिए बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया गया. बेस्ट स्पोर्टिंग रोल का अवॉर्ड मोतीलाल को दिया गया, जिन्होंने फिल्म में चुन्नी बाबू का रोल किया. इसके अलावा बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस का अवॉर्ड वैजयंतीमाला के नाम आया. हालांकि, उन्होंने स्पोर्टिंग रोल के लिए अवॉर्ड लेने से मना कर दिया था.
शाहरुख खान वाला देवदास
कई दशक बीत गए, लेकिन देवदास की कहानी खत्म नहीं हुई. फिर साल 2002 में संजय लीला भंसाली ने इसे एक बार फिर बड़े पर्दे पर उतारा. इस बार देवदास बने शाहरुख खान, पारो बनीं ऐश्वर्या राय और चंद्रमुखी के किरदार में थीं माधुरी दीक्षित. अगर 1955 की देवदास इमोशन्स और एक्टिंग की सादगी पर टिकी थी, तो 2002 की देवदास ने उसी कहानी को ग्रेंड और खूबसूरत विजुअल्स की नई ऊंचाई दे दी. बड़े-बड़े सेट, शानदार कॉस्ट्यूम, भारी-भरकम जूलरी, कैमरे की खूबसूरत चाल और गजब का म्यूजिक, इस बार फिल्म में सब कुछ था. संजय लीला भंसाली ने कहानी को लगभग एक विजुअल ओपेरा की तरह पेश किया. फिल्म की कहानी पुरानी थी, लेकिन उसका ट्रीटमेंट बिल्कुल नए दौर का था. फिल्म में ‘डोला रे डोला’, ‘मार डाला’ और ‘सिलसिला ये चाहत का’ जैसे गाने कहानी का हिस्सा बनकर सामने आए. खासकर शाहरुख, ऐश्वर्या और माधुरी की मौजूदगी ने फिल्म को नई जेनरेशन की ऑडियन्स तक पहुंचाया. यानी अब ‘देवदास‘ दादा और नाना के ज़माने का किरदार नहीं रहा था. इतना ही नहीं, फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट भी बहुत ही शानदार रही. जैकी श्रॉफ, किरण खेर, मिलिंद गुणाजी, मनोज जोशी, विजेंद्र घाटके और अनन्या खरे जैसे कलाकारों ने भी फिल्म में बेहतरीन काम किया. वैसे, इस फिल्म ने देश और दुनिया में 60 से ज्यादा अवॉर्ड अपने नाम किए. इनमें बेस्ट पॉपुलर फिल्म, बेस्ट फीमेल सिंगर, बेस्ट कोरियोग्राफी, बेस्ट प्रोडक्शन डिजाइनर, बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइनर, बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट एक्टर, बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के अवॉर्ड शामिल हैं. इंटरनेशनल लेवल पर देवदास को BAFTA में बेस्ट नॉन इंग्लिश फिल्म के लिए नॉमिनेशन मिला था.

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आज भी क्यों याद है?
संजय लीला भंसाली वाली देवदास की बात हो और ‘डोला रे डोला’ का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित की जुगलबंदी ने इस गाने को बॉलीवुड के सबसे यादगार डांस सीक्वेंस में शामिल कर दिया. माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय ने इस गाने के लिए लंबी रिहर्सल की थी. कोरियोग्राफी सरोज खान ने की थी. यानी पर्दे पर कुछ मिनट की चमक के पीछे कलाकारों की घंटों की मेहनत छिपी थी. वैसे, देवदास सिर्फ हिंदी भाषा तक सीमित नहीं थी. इस कहानी की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह ये भी है कि देवदास किसी एक भाषा या इलाके की कहानी बनकर नहीं रही. इसपर अलग-अलग भाषाओं में कई फिल्में बनी और नाटक भी हुए. तेलुगु में ‘देवदासु’ पर 1953 और 1974 में फिल्में बनीं. तमिल, असमिया, मलयालम और बंगाली में भी इसके अलग-अलग वर्जन सामने आए. भारत के बाहर भी इस कहानी को पाकिस्तान, बांग्लादेश और बाकी जगहों पर अलग-अलग तरह से पर्दे पर उतारा गया. यानी देवदास की मोहब्बत का दर्द भाषा बदलने के बावजूद कम नहीं हुआ.
हर दौर में अलग दिखा देवदास
यही इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात है. हर फिल्म में देवदास का दर्द वही रहा, लेकिन टाइम के साथ उसका अंदाज बदलता गया. पुराने दौर में देवदास समाज के बंधनों और परिवार के फैसलों के बीच फंसा एक बेचारा लवर था. दिलीप कुमार के दौर में उसकी बेचैनी और बढ़ गई. वहीं, शाहरुख खान वाले देवदास पर इमोशन्स के साथ-साथ ग्रेंड और रोमांटिक विजुअल्स का रंग भी खूब चढ़ा. इसके बाद कहानी को बिल्कुल मॉर्डन अंदाज में भी पेश किया गया. अनुराग कश्यप की ‘देव डी’ ने देवदास की ट्रेडिशनल इमेज को तोड़ते हुए कहानी को नए टाइम, नए कैरेक्टर और नए ट्रीटमेंट के साथ सिल्वर स्क्रीन पर दिखाया. इसके अलावा ‘दास देव’ जैसी फिल्मों ने भी इस कहानी को पॉलिटिकल और कंटेंपरेरी कॉन्टेक्स्ट में देखने की कोशिश की.

आखिर खत्म क्यों नहीं होता जादू?
शायद इसलिए कि अधूरी मोहब्बत की कहानी कभी पुरानी नहीं होती. हर पीढ़ी का अपना देवदास होता है. किसी के लिए वो दिलीप कुमार हैं, किसी के लिए केएल सहगल और नई जेनरेशन के लिए शाहरुख खान. इस कहानी में प्यार है, लेकिन सिर्फ प्यार नहीं है. इसमें अहंकार है, परिवार की बंदिशें हैं, समाज की दीवारें हैं, गलत फैसले हैं और उन फैसलों का पछतावा भी है. यही वजह है कि ऑडियन्स देवदास को सिर्फ एक दुखी प्रेमी के तरह नहीं देखती, बल्कि उसमें अपने टाइम और अपने रिश्तों की कई परछाइयां भी ढूंढ़ने की कोशिश करती है. शायद यही वजह है कि लगभग 100 साल बाद भी फिल्म मेकर्स इस कहानी की तरफ वापस लौटते रहते हैं. देवदास की कहानी की भले ही हैप्पी एंडिंग नहीं होती, लेकिन सिनेमा के लिए इसकी जर्नी कभी रुकी नहीं. साल 1928 की बिना बोलने वाली फिल्म से लेकर सहगल, दिलीप कुमार और शाहरुख खान तक, हर देवदास ने अपने दौर की कहानी कही है. यानी कहानी तो वही रही, चेहरे बदलते गए, म्यूज़िक बदलता गया, तकनीक बदलती गई और सिनेमा का अंदाज भी बदल गया. लेकिन एक चीज नहीं बदली और वो है देवदास की अधूरी मोहब्बत का असर. यही असर उसे भारतीय सिनेमा के सबसे ज्यादा रिपीट किए गए और सबसे ज्यादा याद किए जाने वाले किरदारों में शामिल करता है.
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