UV Rays and Skin Cancer: दिखाई न देने वाली सूरज की किरणें आपके लिए बेहद नुकसानदायक हो सकती हैं. इसका असर केवल टैनिंग तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इनसे गंभीर स्किन कैंसर होने का भी खतरा है. आज भी कई लोगों को सूरज की हानीकारक अल्ट्रा वॉयलेट (UV) किरणों के बारे में जानकारी नहीं है, इसलिए वे धूप को सीरियसली नहीं लेते. यूवी किरणें न सिर्फ हमारी स्किन के लिए नुकसानदायाक हैं, बल्कि यह आंखों और इम्यून सिस्टम को भी नुकसान पहुंचाती हैं. स्किन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का मुख्य कारण सूरज की किरणें हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में दुनिया भर में स्किन कैंसर के लाखों मामले सामने आए और लगभग 8 प्रतिशत मरीजों की मौत हो गई. यह डेटा दिखाता है कि स्किन कैंसर सिर्फ स्किन की बीमारी नहीं है, अगर इसका पता लगाकर तुरंत इलाज न किया जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है. अच्छी बात यह है कि कुछ आसान सावधानियां बरतकर इस खतरे को काफी कम किया जा सकता है.
8 जुलाई को विश्व त्वचा स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है, ताकि लोगों को स्किन से जुड़ी बीमारियों और उसके कारणों के बारे में जागरुक किया जा सके. स्किन कैंसर सबसे खतरनाक स्किन से जुड़ी बीमारी है. इसलिए इस गंभीर बीमारी की जानकारी सभी होना चाहिए. आगे आप जानेंगे कि ज्यादा यूवी किरणों से हमारे शरीर पर क्या असर पड़ता है और इससे बचाव के उपाय क्या हैं.
कहां कम और ज्यादा होती हैं अल्ट्रावॉयलेट किरणें
अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन (UVR) को न तो देखा जा सकता है और न ही महसूस किया जा सकता है. UVA किरणें इतनी ताकतवर होती हैं कि वे बादलों, कोहरे और खिड़की के शीशों को भेदकर आपकी स्किन को नुकसान पहुंचा सकती हैं. इसलिए, मानसून और सर्दियों में भी धूप से बचाव करना जरूरी है. साथ ही धूप न होने का मतलब यह नहीं है कि UV किरणें कम होंगी. पहाड़ी इलाकों में तापमान कम होता है, लेकिन फिर भी ऊंचाई के कारण, वहां मैदानी इलाकों की तुलना में UV रेडिएशन का खतरा ज्यादा होता है.

कुछ लोग आर्टिफिशियल UVR सोर्स (जैसे दवा, इंडस्ट्री और डिसइंफेक्शन और कॉस्मेटिक कामों के लिए) के संपर्क में आते हैं, जिनसे उन्हें स्किन कैंसर होता. वहीं ज्यादातर लोगों में सूरज की UVR ही कैंसर का कारण होती हैं. सोलर UVR का लेवल कई फैक्टर निर्भर करता है. जैसे- आसमान में सूरज जितना ऊपर होगा, UVR लेवल उतना ही ज्यादा होगा. UVR लेवल दिन और साल के समय के हिसाब से बदलता रहता है. आप इक्वेटर के जितना करीब होंगे, UVR लेवल उतना ही ज़्यादा होगा. UVR लेवल ऊंचाई के साथ बढ़ता है क्योंकि हवा पतली होती है और कम UVR एब्जॉर्ब होता है. UVR लेवल बिना बादल वाले आसमान में सबसे ज़्यादा होता है लेकिन बादल छाए होने पर भी ज़्यादा हो सकता है. भारत में, UV किरणें रोज सुबह 10:00 बजे से शाम 4:00 बजे के बीच और हर साल मार्च से जून (गर्मियों के महीने) तक सबसे खतरनाक होती हैं. इस समय सूरज सीधे सिर के ऊपर होता है, जिससे नुकसानदायक UV रेडिएशन सबसे खतरनाक रूप में धरती पर पहुंचती है.
हेल्थ पर असर
थोड़ी मात्रा में UV किरणें स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती हैं और विटामिन D बनाने में जरूरी भूमिका निभाता है. हालांकि, UVR के ज्यादा संपर्क में आने से हेल्थ पर बुरे असर हो सकते हैं क्योंकि UVR इंसानों में स्किन कैंसर का मुख्य कारण है.
स्किन पर असर
UVR के गंभीर असर में DNA डैमेज, सनबर्न, फोटोटॉक्सिक और फोटोएलर्जिक रिएक्शन और इम्यून सिस्टम का कमजोर होना शामिल है. धूप से होने वाले नुकसान को चार मुख्य कैटेगरी में बांटा जा सकता है.

मेलेनोमा: यह एक जानलेवा खतरनाक स्किन कैंसर है, जिसमें मेलेनिन बनाने वाली सेल्स बढ़ती जाती हैं और आगे चलकर गांठ या ट्यूमर बन जाता है.
स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (SCC): यह नॉन-मेलेनोमा का एक प्रकार है. इसमें खतरनाक कैंसर कम फैलता है और इससे मौत होने की संभावना कम होती है. लेकिन अगर तुरंत इलाज न किया जाए तो यह अंदरूनी नुकसान पहुंचा सकता है.
बेसल सेल कार्सिनोमा (BCC): यह भी नॉन-मेलेनोमा है. यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला स्किन कैंसर है जो ज्यादातर बुज़ुर्ग लोगों में होता है. यह आमतौर पर शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलता है.
समय से पहले स्किन का बूढ़ा होना (Ageing): सूरज से आने वाली UV किरणें कोलेजन प्रोटीन को नष्ट कर देती हैं जो स्किन को टाइट बनाए रखते हैं। ज्यादा धूप में रहने से जवानी में ही स्किन ढीली और झुर्रियों वाली हो जाती है. स्किन की नेचुरल रिपेयर कैपेसिटी के कमजोर होने के कारण, किसी भी घाव को ठीक होने में लंबा समय लगता है.
UVR के ज़्यादा संपर्क में आने से साल 2020 में दुनियाभर में नॉन-मेलेनोमा स्किन कैंसर (SCC और BCC) के लगभग 1.2 मिलियन नए मामले और 325,000 मेलेनोमा के मामले आए. नॉन-मेलेनोमा से 64,000 और मेलेनोमा के 57,000 मरीजों की मौत हो गई.
आंखों पर असर
UVR के गंभीर असर में फोटोकेराटाइटिस और फोटोकंजंक्टिवाइटिस (कॉर्निया और कंजंक्टिवा में सूजन) शामिल हैं. ये असर ठीक हो सकते हैं, आसानी से रोके जा सकते हैं और आमतौर पर इनसे कोई लंबे समय तक चलने वाला नुकसान नहीं होता है, लेकिन ये दर्दनाक होते हैं. UVR के लंबे समय तक चलने वाले असर में ये शामिल हैं-
मोतियाबिंद: आंखों की एक बीमारी जिसमें लेंस तेजी से धुंधला हो जाता है, जिससे नजर कमजोर हो जाती है और आखिर में अंधापन हो जाता है.
पटेरिजियम: मांस जैसे टिशू की ग्रोथ जो कॉर्निया के कुछ हिस्से को ढक सकती है.
आंख में और उसके आस-पास कैंसर: बेसल सेल कार्सिनोमा, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा और मेलेनोमा
दुनिया भर में 15 मिलियन लोग मोतियाबिंद की वजह से अंधे हैं. यह अनुमान है कि इनमें से लगभग 10% UVR के संपर्क में आने की वजह से हो सकते हैं.

स्किन कैंसर के लक्षण
मेलेनोमा स्किन कैंसर में तिल का आधा हिस्सा दूसरे हिस्से से अलग दिख सकता है. तिल के किनारे ऊपर उठे हो सकते हैं. ज्यादा बड़े तिल हो सकते हैं. इसके अलावा तिल में खुजली हो सकती है या उसका रंग बदल सकता है. नॉन मेलेनोमा, जैसे BCC और SCC में, स्किन चमकदार और मोम जैसी दिख सकती है. इसके अलावा स्किन पर लाल और खुरदुरी पपड़ी जैसी लेयर जम सकती है. इसके अलावा अगर कोई ऐसा घाव है, जो हफ्तों तक ठीक नहीं हो रहा. वह भी स्किन कैंसर का लक्षण हो सकता है.
इम्यून सिस्टम पर असर
सुरक्षा सेल्स को नष्ट करना: यूवी किरणें स्किन की ‘लैंगरहैंस कोशिकाओं’ को खत्म कर देती हैं, जो बाहरी खतरों और कैंसर सेल्स की पहचान करते हैं.
डीएनए डैमेज: यूवी किरणों से डीएनए टूट जाता है, जिससे शरीर का नेचुरल इम्यून रिस्पॉन्स धीमा पड़ जाता है.
इम्यूनिटी कम करने वाले केमिकल बनाना: धूप में रहने पर स्किन IL-10 जैसे केमिकल छोड़ती है, जो कैंसर से लड़ने वाले T-सेल्स को दबा देते हैं.
विटामिन D का बनना
अच्छी सेहत के लिए कम मात्रा में UV किरणें जरूरी हैं क्योंकि इससे शरीर में विटामिन D बनता है. विटामिन D हड्डी और मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम को मजबूत बनाता है. जो लोग धूप में बहुत कम निकलते हैं, जैसे कि जो लोग इंस्टीट्यूशनल केयर में हैं या घर में रहते हैं, जिनकी स्किन का रंग गहरा है और जो ऊंचे लैटीट्यूड में रहते हैं या जो लोग धार्मिक या कल्चरल वजहों से बाहर निकलते समय अपने पूरे शरीर को ढकते हैं, उन्हें ओरल विटामिन D सप्लीमेंट लेना चाहिए.
किन लोगों को ज्यादा खतरा है
UVR बच्चों और टीनएजर्स को उनकी स्किन और आंखों की बनावट की वजह से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. बचपन में सनबर्न हो जाने पर भविष्य में स्किन कैंसर का खतरा ज़्यादा होता है. साथ ही ज्यादा UVR उनके रेटिना तक पहुंचकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है. गोरी स्किन वाले लोगों को सनबर्न ज्यादा होता है और उन्हें सांवली स्किन वाले लोगों की तुलना में स्किन कैंसर का खतरा ज्यादा होता है. हालांकि सांवली स्किन वाले लोगों को भी स्किन कैंसर होने का खतरा रहता है. बच्चों से लेकर जवान और बूढ़ों तक सभी के लिए अपनी आंखों का ध्यान रखना जरूरी है. उन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, जिन्हें तिल की समस्या है, जो फोटोसेंसिटाइजिंग दवा ले रहे हैं और जिनके परिवार में स्किन कैंसर की हिस्ट्री है. जो लोग काम के सिलसिले में सोलर UVR लेवल के संपर्क में आते हैं, उन्हें नॉन-मेलेनोमा स्किन कैंसर होने का खतरा ज्यादा होता है.
बचाव के उपाय
स्किन कैंसर को काफी हद तक रोका जा सकता है. हानिकारक UVR से बचने के लिए ये उपाय अपनाएं.
- दोपहर की धूप में कम समय बिताएं.
- छांव में रहें.
- बचाव के कपड़े पहनें. आंखों, चेहरे, कान और गर्दन को बचाने के लिए चौड़ी किनारी वाली टोपी पहनें.
- ऐसे सनग्लास पहनें जो 99 % UV-A और UV-B से सुरक्षा दें.
- स्किन के उन हिस्सों पर ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन लगाएं जिन्हें कपड़ों से ढका नहीं जा सकता.
- धूप में ज्यादा समय बिताने के लिए सनस्क्रीन के इस्तेमाल के बजाय, कपड़े से शरीर को ढ़कने की कोशिश करें.
- आर्टिफिशियल टैनिंग डिवाइस के इस्तेमाल से बचें.
- आर्टिफिशियल टैनिंग को कभी भी विटामिन D की पूरी मात्रा पाने के ऑप्शन के तौर पर नहीं सोचना चाहिए.
- बच्चों को सावधानियां बरतने के लिए बढ़ावा देने से उन्हें सूरज की किरणों से बचाया जा सकता है.
