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Middle East में महाजंग, जानें आपकी जेब पर और कितना भारी पड़ेगा गैस और तेल का ये खेल?

by Preeti Pal
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Middle East में छिड़ी महाजंग, जानें आपकी जेब पर और कितना भारी पड़ने वाला है गैस और तेल का यह खेल?

Middle East War Update: मिडिल ईस्ट लगातार धमाकों से गूंज रहा है. इस बीच गैस और तेल के प्राइज़ आसमान छू रहे हैं. जानें आम जनता को और कितनी भारी पड़ने वाली है ये जंग.

21 March, 2026

मिडिल ईस्ट की धरती एक बार फिर धमाकों से गूंज उठी है, लेकिन इस बार मामला सिर्फ सरहदों तक सीमित नहीं है. दरअसल, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अब दुनिया के उस हिस्से को निशाना बनाया है जिसे ‘ग्लोबल एनर्जी की लाइफलाइन’ कहा जाता है. इजरायल का ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस फील्ड पर बमबारी और फिर ईरान का पलटवार, ये ऐसी घटनाएं हैं जिन्होंने पूरी दुनिया के बाजारों में खलबली मचा दी है. ऐसे में आज आसान भाषा में समझते हैं कि सात समंदर पार हो रही इस जंग का असर आपकी रसोई और गाड़ी के टैंक पर कैसे पड़ सकता है.

साउथ पार्स और रास लफान

साउथ पार्स दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र का हिस्सा है, जिसे ईरान और कतर शेयर करते हैं. ईरान के लिए ये सिर्फ एक गैस फील्ड नहीं बल्कि उसकी इकोनॉमी की रीढ़ है. यहां से ईरान की 70% गैस निकलती है. देश की 90% घरेलू एनर्जी की जरूरत यहीं से पूरी होती है. इजरायल ने पहली बार किसी ऐसे ठिकाने को निशाना बनाया है जो सीधे तौर पर जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) के उत्पादन से जुड़ा है. इस हमले के जवाब में ईरान ने कतर के ‘रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी’ पर मिसाइलें दाग दीं. अब आप सोचेंगे कि कतर का इसमें क्या कसूर? दरअसल, रास लफान दुनिया की सबसे बड़ी लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी (LNG फैसिलिटी है. ये पूरी दुनिया की 20% गैस सप्लाई संभालती है. इस हमले से कतर की क्षमता 17% तक गिर गई है और इसे फिर से पूरी तरह ठीक होने में 3 से 5 साल लग सकते हैं.

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दुनिया पर मंडराया खतरा

रूस-यूक्रेन वॉर के बाद यूरोप ने रूसी गैस पर अपनी डिपेंडेंसी कम करने के लिए कतर का हाथ थामा था. अब कतर पर हुए हमले ने यूरोप के लिए ऊर्जा का संकट खड़ा कर दिया है. लेकिन बात सिर्फ गैस तक सीमित नहीं है. असली डर ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को लेकर है. ये समुद्र का वो पटला रास्ता है जहां से दुनिया का एक-तिहाई तेल गुजरता है. अगर ये रास्ता बंद होता है, तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. फिलहाल, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर तेल की कीमतें इसी तरह एक साल तक ऊंची रहीं, तो महंगाई (Inflation) बेकाबू हो सकती है. इसका सीधा असर खाने-पीने की चीजों, खाद और ट्रांसपोर्टेशन की कीमतों पर पड़ेगा.

भारत पर असर

गैस के मामले में कई देश आत्मनिर्भर हो सकते हैं, लेकिन तेल के मामले में कहानी अलग है. ऑस्ट्रेलिया जैसे देश, जो अपनी जरूरत का लगभग पूरा तेल इम्पोर्ट करते हैं, वहां खेती से लेकर सफर तक सब महंगा होने वाला है. किसानों को खाद की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे फसलों की बुवाई और कटाई प्रभावित हो रही है. वहीं, भारत जैसे बड़े इम्पोर्टर देशों के लिए भी ये सिचुएशन चिंताजनक है. जब इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल महंगा होता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ना लगभग तय हो जाता है. इससे न सिर्फ कार चलाना महंगा होता है, बल्कि ट्रक और जहाजों का कियारा बढ़ने से हर छोटी-बड़ी चीज की कीमत बढ़ जाती है.

क्या होगा आगे?

फिलहाल इजरायल ने ईरान के एनर्जी बेसेस पर और हमले न करने की बात कही है, लेकिन माहौल अब भी तनावपूर्ण है. ये वॉर दुनिया को एक बार फिर याद दिला रही है कि हम एनर्जी के लिए कितने सेंसिटिव रास्तों पर डिपेंड करते हैं. मिडिल ईस्ट की ये चिंगारी अगर शांत नहीं हुई, तो आने वाले दिनों में आम आदमी का बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है. अब देखना ये है कि दुनिया के बड़े-बड़े नेता इस एनर्जी वॉर को रोकने के लिए क्या कदम उठाते हैं.

News Source: PTI

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