Foods avoided during Sawan: सावन का महीना आते ही सिर्फ मौसम ही नहीं बदलता, बल्कि लोगों की खानपान की आदतों में भी बड़ा बदलाव देखने को मिलता है. चारों तरफ हरियाली, रिमझिम बारिश, शिव मंदिरों में गूंजते हर हर महादेव के जयकारे और सोमवार के व्रत, इस महीने को और खूबसूरत बना देते हैं. यही वजह है कि सावन का महीना आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर माना जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सावन में कई घरों की रसोई से कुछ खास चीजें अचानक गायब क्यों हो जाती हैं? दरअसल, सदियों से भारत में सावन के महीने में कुछ खाने की चीज़ों से परहेज करने की परंपरा चली आ रही है. इसके पीछे सिर्फ धार्मिक कारण या आस्था ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद, मौसम और सेहत से जुड़ी कई बड़ी वजह भी हैं. पुराने समय में जब फ्रिज, मॉर्डन खेती का तरीका और फूड सेफ्टी जैसी सुविधाएं नहीं थीं, तब लोगों ने मौसम के हिसाब से अपने खानपान में बदलाव किया. धीरे-धीरे यही आदतें हमारी धार्मिक परंपरा का बड़ा हिस्सा बन गईं. हालांकि हर राज्य और हर परिवार के नियम अलग-अलग हो सकते हैं. लेकिन देशभर में कुछ खाने की चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें सावन के महीने में आमतौर पर नहीं खाया जाता. लेकिन इसके पीछे की वजह क्या है, उसे जानना बहुत जरूरी है.

हरी पत्तेदार सब्जियां
सावन का पावन महीना शुरू होते ही पालक, मेथी, सरसों, चौलाई जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां कई घरों में बननी बंद हो जाती हैं. इसके पीछे एक बहुत ही बेहद व्यावहारिक यानी प्रैक्टिकल वजह है. दरअसल, बारिश के मौसम में नमी ज्यादा होने की वजह से इन सब्जियों में कीड़े, घोंघे, छोटे लार्वा और बैक्टीरिया आसानी से पनप जाते हैं. कई बार ये पत्तों के बीच छिपे रहते हैं. इतना ही नहीं, अच्छी तरह साफ करने के बाद भी ये छोटे-छोटे कीड़े नजर ही नहीं आते. आयुर्वेद के अनुसार भी बरसात के मौसम में शरीर की पाचन शक्ति यानी अग्नि थोड़ी कमजोर हो जाती है. ऐसे में हरी पत्तेदार सब्जियां खाने से बचने की सलाह दी जाती है. उन सब्जियों को भी खाने से बचने की सलाह दी जाती है, जिन्हें साफ करना मुश्किल हो. अब भले ही सब्जियां पहले से ज्यादा सुरक्षित और साफ-सुथरी नज़र आती हों, लेकिन ये परंपरा आज भी कई परिवार निभाते हैं.
प्याज और लहसुन
अगर आपने कभी सावन में व्रत का खाना खाया है, तो आपने जरूर देखा होगा कि उसमें प्याज और लहसुन नहीं होते. वैसे, सिर्फ सावन व्रत ही नहीं, बल्कि किसी भी पूजा-पाठ के लिए बिना लहसुन और प्याज़ के ही खाना बनाया जाता है. वैसे, इसके पीछे की वजह स्वच्छता नहीं बल्कि आध्यात्मिक है. दरअसल, आयुर्वेद में प्याज और लहसुन को राजसिक और तामसिक भोजन माना जाता है. माना जाता है कि ये मन में उत्तेजना, गुस्सा, गलत इच्छाएं और बेचैनी बढ़ाते हैं. वहीं, सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति, ध्यान और आत्मसंयम का समय माना जाता है. इसलिए इस दौरान सात्विक खाना ही सबसे बेहतर माना जाता है. यानी वो शाकाहारी खाना जिसमें प्याज और लहसुन नहीं डला हो.
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मांसाहार
सावन में लाखों लोग मांस खाना पूरी तरह छोड़ देते हैं. हर साल सावन के महीने में मांस बेचने वालों का बिजनेस बहुत कम हो जाता है. कुछ लोग सिर्फ सावन के सोमवार के लिए मांसाहर छोड़ देते हैं. वहीं, बहुत से लोग सावन का पूरा 1 महीना मांस खाने से परहेज करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार ये महीना भगवान शिव को समर्पित है और इस दौरान जीव हत्या से बचना पुण्य माना जाता है. इसके अलावा वैज्ञानिक कारण भी है. दरअसल, बारिश के मौसम में बैक्टीरिया बहुत तेजी से बढ़ते हैं. पहले के समय में मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखना आसान नहीं था, जिससे फूड पॉइजनिंग का खतरा काफी बढ़ जाता था. यही वजह है कि धीरे-धीरे मांस से दूरी एक धार्मिक परंपरा बन गई.

मछली
कई राज्यों में सावन के महीने में मछली खाना भी वर्जित माना जाता है. इसके पीछे पर्यावरण संरक्षण की सोच भी छिपी हुई है. मानसून का समय ज्यादातर मीठे पानी की मछलियों का प्रजनन काल होता है. अगर इस दौरान बड़े पैमाने पर मछलियां पकड़ी जाएं तो उनकी संख्या तेजी से घट सकती है. इसी वजह से आज भी कई राज्यों में मानसून के दौरान मछली पकड़ने पर अस्थायी रोक लगाई जाती है. यानी ये परंपरा प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने का भी मैसेज देती है.
अंडा
अंडा प्रोटीन से भरपूर होता है, लेकिन सावन में इसे भी कई लोग नहीं खाते. ज्यादातर हिंदू परिवार अंडे को मांसाहारी भोजन की श्रेणी में रखते हैं. वहीं, सावन के पावन महीने में हल्का, सात्विक और शुद्ध भोजन करने की परंपरा चली आ रही है. इसलिए अंडे की जगह दूध, दही, पनीर, फल, मेवे, सिंघाड़े का आटा और कुट्टू जैसे ऑप्शन अपनाए जाते हैं. ये बॉडी को पूरा पोषण भी देते हैं और व्रत की परंपरा के हिसाब से सही भी माने जाते हैं.
शराब
सावन को शरीर और मन की शुद्धि करने का महीना कहा जाता है. इस दौरान लोग शराब पीना लगभग पूरी तरह छोड़ देते हैं. ऐसी मान्यता है कि नशा इंसान का ध्यान पूजा-पाठ और आध्यात्मिक साधना से भटका देता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बारिश के मौसम में शराब हमारे पाचन पर असर डाल सकती है. इसके अलावा ये शरीर में पानी की कमी भी बढ़ा सकती है. जब लोग व्रत रखते हैं या हल्का खाना खाते हैं, तब शराब से दूरी रखना सेहत के लिए भी बेहतर माना जाता है.

तली-भुनी चीजें
बारिश का मौसम आते ही भारत में ज्यादातर लोगों को पकौड़े, समोसे और कचौड़ी खाने का मन जरूर करता है. लेकिन सावन में कई लोग इन चीजों से भी दूरी बना लेते हैं. आयुर्वेद के अनुसार बरसात में पाचन शक्ति थोड़ी कमजोर रहती है. ऐसे में ज्यादा तेल और मसाले वाला खाना पेट पर ज्यादा दबाव डालता है. यानी खाना पचाने के लिए हमारी बॉडी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. ज्यादा तला-भुना खाने से गैस, एसिडिटी, अपच और भारीपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसी वजह से सावन में उबला, भाप में पका या हल्का खाना खाने की ही सलाह दी जाती है.
फर्मेंट यानी खमीर वाली चीज़ें
कुछ परिवार सावन में इडली, डोसा का बैटर, कुछ तरह के अचार और खमीर से बनी खाने की चीजों से भी परहेज करते हैं. दरअसल, बारिश के मौसम में नमी और गर्मी की वजह से फर्मेंटेशन बहुत तेजी से होता है. पहले जब रेफ्रिजरेटर नहीं होते थे, तब इस तरह की खाने की चीज़ें जल्दी खराब हो जाती थीं. ऐसे में उन्हें खाने से बीमार होने का खतरा बढ़ जाता था. इसी वजह से ताजा बना खाना खाने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी कई घरों में निभाई जाती है.
बैंगन
बैंगन का नाम इस लिस्ट में देखकर कई लोग हैरान हो सकते हैं. दरअसल, मानसून के समय बैंगन में कीड़े लगने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है. कई बार छोटे-छोटे कीड़े बैंगन के अंदर ही पनपने लग जाते हैं. बाहर से देखने पर इसका पता भी नहीं चलता. हालांकि, आज आधुनिक खेती की वजह से स्थिति काफी बेहतर है. लेकिन पुराने समय से चली आ रही ये मान्यता आज भी कई परिवारों में कायम है. आज भी सावन के महीने में लोग बैंगन खाना पसंद नहीं करते.

मशरूम
बरसात का मौसम मशरूम उगने का सबसे अच्छा समय होता है. लेकिन यही वजह है कि सावन में कई लोग इसे खाने से भी बचते हैं. पहले के समय में लोग जंगलों और खेतों से जंगली मशरूम इकट्ठा किया करते थे. इनमें कौन सा मशरूम खाने लायक है और कौन जहरीला, इसकी पहचान करना कोई आसान काम नहीं था. गलत मशरूम खाने से गंभीर बीमारी या फिर जान का खतरा भी हो सकता था. इसलिए सुरक्षित रहने के लिए लोगों ने सावन में मशरूम न खाने की परंपरा बना ली. आज बाजार में मिलने वाले मशरूम सुरक्षित होते हैं, फिर भी कई श्रद्धालु सावन में सात्विक भोजन करने की परंपरा की वजह से इन्हें नहीं खाते.
आज भी मानते हैं नियम
आज के समय में खेती करने के तरीके बदल चुके हैं. फ्रिज, साफ-सफाई और आधुनिक फूड सेफ्टी की वजह से पहले जैसी समस्याएं काफी कम हो गई हैं. फिर भी लाखों लोग सावन में इन परंपराओं का पालन करते हैं. इसके पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि अनुशासन, संयम और शरीर को हल्का रखने की सोच भी जुड़ी है. सावन का महीना लोगों को ये मैसेज देता है कि मौसम के हिसाब से खानपान बदलना भी एक अच्छी लाइफस्टाइल का ही हिस्सा है. अगर कोई सेहत की वजह से इन चीजों को खाता है या डॉक्टर की सलाह पर खास डाइट फॉलो कर रहा है, तो उसे अपनी जरूरत के हिसाब से फैसला लेना चाहिए. वैसे भी, धार्मिक परंपराएं व्यक्तिगत आस्था का विषय हैं और हर परिवार इन्हें अपने तरीके से निभाता है.
यानी देखा जाए तो, सावन में कुछ खाने की चीज़ों से परहेज करने की परंपरा सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है. इसमें आयुर्वेद की समझ, मौसम के हिसाब से लाइफस्टाइल, पर्यावरण संरक्षण और अच्छी सेहत का बैलेंस देखने को मिलता है. शायद यही वजह है कि सदियों पुरानी ये परंपराएं आज भी भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा बनी हुई हैं.
