Hrishikesh Mukherjee: हिंदी सिनेमा में कुछ डायरेक्टर्स ऐसे हुए हैं, जिन्होंने बड़े-बड़े सेट, महंगे कपड़े और आसमान छूते सपनों के बजाय आम आदमी की जिंदगी को ही अपनी फिल्म का हीरो बना दिया. ऋषिकेश मुखर्जी उन्हीं फिल्म मेकर्स में से एक थे. उनके कैमरे में कभी दफ्तर का बाबू नजर आया, कभी घर की छोटी-सी नोकझोंक, कभी पति-पत्नी का अहंकार तो कभी जिंदगी से लड़ता हुआ कोई मुस्कुराता हुए एक इंसान. आज की जेनरेशन भले ही ऋषिकेश मुखर्जी के बारे में कम जानती हो, लेकिन एक टाइम था जब हिंदी सिनेमा में उनका नाम ही काफी था. 30 सितंबर को ऋषिकेश मुखर्जी की जयंती है. करीब 50 तक फिल्में डायरेक्ट करने वाले ऋषिकेश दा ने अपने बहेतरीन करियर में ‘आनंद’, ‘सत्यकाम’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘चुपके चुपके’, ‘मिली’ और ‘गोल माल’ जैसी फिल्में बनाई. इन फिल्मों के ज़रिए उन्होंने हिंदी सिनेमा को ऐसा अंदाज दिया, जिसमें ड्रामा भी था, कॉमेडी भी थी और सबसे बढ़कर आम आदमी की जिंदगी की सच्चाई थी. ऐसे में आज फिल्मी पर्दा उठाते हैं और याद करते हैं उनकी कुछ बेहतरीन फिल्मों को, जिन्होंने हिंदी सिनेमा की तस्वीर ही बदल दी.

सत्यकाम
साल था 1969 और पर्दे पर आए धर्मेंद्र. लेकिन ये धर्मेंद्र वाला आम मसाला अवतार नहीं था. यहां वो बने थे सत्यप्रिय आचार्य, एक ऐसा इंसान जिसके लिए सच और ईमानदारी कोई डायलॉग नहीं बल्कि जिंदगी का एक ऐसा रूल थे, जिसे वो किसी के लिए भी नहीं तोड़ते थे. सत्यप्रिय चाहता है कि दुनिया भी उसी तरह साफ-सुथरी हो जैसे उसके सिद्धांत हैं. हालांकि, असली दुनिया में उसे बार-बार समझ आता है कि ईमानदारी का रास्ता इतनी भी आसान नहीं होता, जितना वो सोचता है. यही वजह है कि समाज की गलतियां, समझौते और मजबूरियां उसके आदर्शों से बार-बार टकराती रहती हैं. ऋषिकेश मुखर्जी ने इस कहानी के जरिए समाज की उन बुराइयों पर वार किया, जिनसे वो खुद परेशान थे. फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में बेस्ट फीचर फिल्म इन हिंदी का सम्मान मिला. यानी बिना किसी गोलीबारी और बड़े एक्शन के भी फिल्म लोगों और पुरस्कारों दोनों पर भारी पड़ सकती है. वैसे, ऋषिकेश मुखर्जी के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म में धर्मेंद्र के अलावा संजीव कुमार, शर्मिला टेगौर, अशोक कुमार और सारीका जैसे कलाकार भी हैं.

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आनंद
अब आते हैं उस फिल्म पर, जिसने हंसते-हंसते पूरे देश को रुला दिया. उस फिल्म का नाम है ‘आनंद’. साल 1971 में रिलीज़ हुई इस फिल्म में राजेश खन्ना बने आनंद सहगल और अमिताभ बच्चन बने डॉक्टर भास्कर. कहानी एक ऐसे इंसान की है जिसे पता है कि उसकी जिंदगी बहुत लंबी नहीं है. यानी वो जल्द ही एक बीमारी की वजह से मरने वाला है. लेकिन आनंद का फलसफा बिल्कुल अलग है कि, जब जिंदगी छोटी है तो उसे दुख में क्यों गंवाया जाए? वहीं, डॉक्टर भास्कर जिंदगी और मौत को बहुत सीरियस तरीके से देखते हैं. आनंद की दोस्ती धीरे-धीरे उनके नजरिए को बदल देती है. “बाबू मोशाय…” से शुरू होने वाली आनंद की बातें आज भी सिनेमा लवर्स के दिलों में जिंदा हैं. फिल्म के गाने और डायलॉग तब भी हिट थे और आज भी हैं. ऋषिकेश मुखर्जी की इस फिल्म को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इसके अलावा फिल्मफेयर में भी फिल्म को कई अवॉर्ड्स से नवाज़ा गया. साथ ही राजेश खन्ना की इस फिल्म ने लोगों को एक और बात सिखाई कि, जिंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए. वैसे भी लाइफ कितनी लंबी है, इससे ज्यादा जरूरी है कि वो कितनी खूबसूरती से जी गई है.

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बावर्ची
साल 1972 में ऋषिकेश मुखर्जी ने दिखाया कि कभी-कभी घर का सबसे बड़ा विलेन कोई इंसान नहीं, बल्कि घरवालों की आपसी खींचतान ही होती है. उनकी फिल्म बावर्ची बहुत ही सिंपल होने के बाद भी बहुत बड़ी सीख दे देती है. इस फिल्म में राजेश खन्ना बने रघु, जो एक परिवार में बावर्ची बनकर पहुंचते हैं. घर में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, काम को लेकर बहस और एक-दूसरे से नाराजगी पहले दिन से ही रघु को नज़र आ जाती है. पूरा परिवार जैसे अपनी ही जिंदगी की अलग कहानी में फंसा हुआ है. फिर आता है रघु. खाना बनाने वाला ये आदमी सिर्फ खाना नहीं पकाता, बल्कि रिश्तों में भी स्वाद भर देता है. धीरे-धीरे परिवार समझने लगता है कि साथ रहने का मतलब सिर्फ एक छत के नीचे रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे का हाथ थामना भी है. जया भादुड़ी, असरानी, ए.के. हंगल और दुर्गा खोटे जैसे कलाकारों से सजी ये फिल्म उस दौर में बड़ी ब्लॉकबस्टर हिट रही. फिल्म में कैफी आज़मी और मदन मोहन के म्यूज़िक ने चार चांद लगाने का काम किया.

अभिमान
बावर्ची की रिलीज के एक साल बाद यानी 1973 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की ‘अभिमान’. इसमें अमिताभ बच्चन और जया बच्चन ने पति-पत्नी का रोल किया. अमिताभ ने सुबीर का किरदार निभाया, जो एक सक्सेसफुल सिंगर है. वहीं, उसकी पत्नी उमा की आवाज भी बहुत ही ज्यादा खूबसूरत है. शुरुआत में सुबीर खुद उमा के हुनर को दुनिया के सामने लाना चाहता है. लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब उमा की पॉपुलैरिटी सुबीर से आगे निकल जाती है. यहां से शुरू होती है फिल्म की असली कहानी. प्यार के बीच धीरे-धीरे अहंकार आने लगता है. जलन और असुरक्षा की एंट्री हो जाती है. इस फिल्म में ऋषिकेश मुखर्जी ने पति-पत्नी के रिश्ते में सफलता और बराबरी से पैदा होने वाली मुश्किलों को बहुत ही सिंपल तरीके से दिखाया है. फिल्म ये सवाल भी पूछती है कि अगर आपका साथी आपसे ज्यादा सफल हो जाए तो क्या आपका प्यार उतना ही मजबूत रहेगा? या उससे जलन होने लगेगी. खासकर अगर पत्नी पति से करियर में अच्छा करती है, तो क्या पति उसकी कामयाबी को संभाल पाता है? वैसे, फिल्म की कहानी के साथ-साथ एस डी बर्मन के म्यूज़िक ने भी लोगों का खूब दिल जीता था. वैसे, ‘अभिमान’ फिल्म को दो फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले थे. पहला जया बच्चन को बेस्ट एक्ट्रेस के लिए और दूसरा एस डी बर्मन को बेस्ट म्यूज़िकि डायरेक्टर के लिए.
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मिली
साल 1975 में ऋषिकेश दा की फिल्म आई ‘मिली’. इसमें जया बच्चन ने एक ऐसी लड़की का किरदार निभाया, जिसकी मुस्कान के पीछे जिंदगी का बहुत बड़ा दर्द छिपा है. मिली बहुत खुशमिजाज है, लोगों से घुलती-मिलती है और अपने आसपास खुशियां बांटती है. लेकिन उसे एक बहुत गंभीर बीमारी है. यानी जिस लड़की को देखकर बाकी लोग मुस्कुराते हैं, उसकी अपनी जिंदगी मुश्किलों से भरी है. अमिताभ बच्चन भी फिल्म में हैं. ऋषिकेश मुखर्जी ने बीमारी, प्यार, उम्मीद और जिंदगी की गहराई को बिना भारी भरकम भाषणों या डायलॉग्स के बहुत ही सेंसिटिव तरीके से पेश किया. यही उनकी फिल्मों की असली ताकत थी. वो बीमारी में भी इंसान देखते थे, रिश्तों में भी कहानी और रोजमर्रा की जिंदगी में भी सिनेमा. यानी ऋषिकेश मुखर्जी का डायरेक्शन और एस डी बर्मन का म्यूज़िक इस बार भी पर्दे पर कमाल कर गया. वैसे, इस फिल्म के लिए भी जया बच्चन को फिल्मफेयर में बेस्ट एक्ट्रेस के लिए नॉमिनेशन मिला था. हालांकि, वो अवॉर्ड जीत नहीं पाई थीं.

चुपके चुपके
उसी साल यानी 1975 में ही ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म चुपके चुपके रिलीज हुई. ये फिल्म मिली से बिल्कुल अलग थी. हालांकि, ऋषिकेश मुखर्जी ने यहां भी अपने अंदाज़ बरकरार रखा. इस बार कहानी पत्नी पत्नी और जीजा पर थी. धर्मेंद्र और शर्मिला टेगौर ने पत्नी पत्नी का रोल निभाया है. जीजा जी बने हैं ओम प्रकाश. सुलेखा और पीरामल, दोनों मिलकर जीजा को बेवकूफ बनाते हैं. इस बीच कहानी कई मज़ेदार मोड़ लेती है. फिल्म में धर्मेंद्र और शर्मिला के अलावा असरानी, अमिताभ बच्चन और जया बच्चन भी हैं. इस बार भी एस डी बर्मन के गानों ने फिल्म को हिट कराने में बड़ा रोल प्ले किया. अब के सजन सावन में, गाना आज भी लोगों को पसंद आता है. वैसे, आज ये फिल्म बॉलीवुड की क्लासिक कॉमेडी मूवीज में शामिल है.

आज भी क्यों जिंदा है उनका सिनेमा?
इसका सीधा सा जवाब है कि, उनकी फिल्मों में हम खुद को देखते हैं. कभी ‘बावर्ची’ का परिवार अपना लगता है, कभी ‘अभिमान’ का रिश्ता, कभी ‘आनंद’ की जिंदगी और कभी ‘मिली’ की मुस्कान और कभी ‘चुपके चुपके’ की मज़ाक मस्ती. ऋषिकेश मुखर्जी ने हर बार साबित किया कि सुपरहीरो हमेशा आसमान से नहीं उतरता. कभी वो घर की रसोई में बावर्ची बनकर आता है, कभी अस्पताल में डॉक्टर का दोस्त बन जाता है और कभी बड़ी बीमारी से लड़ते हुए भी जिंदगी को गले लगा लेता है. वैसे, ऋषिकेश मुखर्जी ने गोलमाल और खूबसूरत जैसी फिल्में भी बनाई हैं. ये फिल्में भी लोगों को खूब पसंद आई थीं. ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा लोगों की इसलिए भी पसंद आता था, क्योंकि उन्होंने आम लोगों की जिंदगी को खास बना दिया. उनके लिए पर्दे पर हीरो बनने के लिए बंदूक या सुपरपावर जरूरी नहीं थी. बस एक अच्छा दिल, सच्चा रिश्ता और जिंदगी को समझने वाली नजर ही काफी थी. यही वजह है कि आज भी उनकी फिल्में उतनी ही सच्ची और प्यारी लगती हैं.
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