Kanwar Yatra Beginning: महादेव को प्रसन्न करने वाला पावन महीना सावन शुरू हो गया है. शुक्रवार से सावन की शुरुआत हो गई है और 3 अगस्त को पहला सोमवार है. भगवान शिव के भक्त इस पूरे महीने व्रत रखते हैं, मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र व धतूरा अर्पित कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. मान्यता है कि सावन का महीना भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय होता है, इसी वजह से देशभर के शिवालयों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं.
सावन के साथ ही कांवड़ यात्रा की भी शुरुआत हो जाती है, जिसका इंतजार शिवभक्त पूरे साल करते हैं. भगवा वस्त्र पहने, कंधे पर जल लिए और हर-हर महादेव का नारा लगाते हुए जाने वाले कांवड़ियों के अंदर भरपूर जोश होता है. इस दौरान दिल्ली से लेकर यूपी, बिहार और उत्तराखंड तक भक्तों की भीड़ रहती है. जगह-जगह श्रद्धालुओं के लिए सेवा शिविर लगाए जाते हैं, जहां भोजन, पानी, दवा और आराम की व्यवस्था की जाती है. कई भक्त सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी कर अपनी श्रद्धा और आस्था का परिचय देते हैं. हालांकि कांवड़ यात्रा के महत्व के बारे में हर किसी को जानकारी नहीं होती. बदलते हुए जमाने के साथ लोग धार्मिक ज्ञान को धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं. ऐसे में हमें यह जरूर जानना चाहिए कि कांवड़ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई, इसका महत्व क्या है और इसके नियम क्या हैं. इस खबर में आपको कांवड़ यात्रा के बारे में हर जानकारी मिलेगी.

क्या है कांवड़ यात्रा और उसका महत्व
कांवड़ यात्रा सावन के महीने में भगवान शिव के भक्तों द्वारा की जाने वाली कठिन पैदल धर्मिक यात्रा है. सावन में भगवान शिव के भक्त गंगा किनारे जाते हैं. वहां नहाने के बाद, वे कलश में गंगा जल भरते हैं. फिर उस कलश को कांवड़ से बांधकर अपने कंधे पर लटकाते हैं और शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए अपने इलाके के शिव मंदिर में ले जाते हैं. कांवड़ एक बांस या लकड़ी का डंडा होता है जिसे रंग-बिरंगे बैनर, झंडे, धागे और चमकीले फूलों से सजाया जाता है. कांवड़ के दोनों सिरों से गंगा जल से भरा कलश लटका होता है.
कांवड़ यात्रा को सनातन धर्म में सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि तपस्या माना जाता है. सावन के महीने में शिवलिंग पर जल अर्पित करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सारी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं. नंगे पाव चलना और सात्विक नियमों का पालन करना व्यक्ति के अहंकार, लोभ और सुख-सुविधाओं के मोह को समाप्त कर देते हैं. कांवड़ यात्रा से मन को शांति मिलती है.
कांवड़ यात्रा के नियम
कांवड़ यात्रा के नियम बहुत ही कड़े होते हैं, जिनका सख्ती से पालन किया जाता है. पवित्र नदी से जल भरने के बाद सबसे जरूरी नियम यह है कि गंगा जल से भरी कांवड़ को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए. अगर यात्रा के दौरान आराम करने की जरूरत हो, तो कांवड़ को किसी स्टैंड या पेड़ की टहनी से लटका दिया जाता है. यात्रा के दौरान, भक्तों को पूरी तरह से सात्विक जीवन जीना होता है, जिसमें मांस, शराब, प्याज, लहसुन, तंबाकू और किसी भी दूसरे तामसिक खाने या नशीली चीजों से पूरी तरह दूर रहना होता है. भक्त पूरी यात्रा के दौरान बेल्ट, जूते, चप्पल या पर्स जैसी चमड़े की किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं करते हैं. कांवड़िए नंगे पैर यात्रा करते हैं और रास्ते में गुस्सा या गाली-गलौज नहीं करते, बल्कि हर समय “बम बम भोले” का नारा लगाते हैं.
कहां-कहां होती हैं कांवड़ यात्रा
- कांवड़ यात्रा मुख्य रूप से यूपी, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली एनसीआर में होती है.
- पश्चिमी यूपी, दिल्ली और हरियाणा में भक्त मुख्य रूप से हरिद्वार (हर की पौड़ी), ऋषिकेश, गोमुख और गंगोत्री से गंगाजल भरकर लाते हैं और अपने इलाके के शिव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं.
- बिहार और झारखंड में, भक्त बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज में गंगा से जल भरते हैं. सुल्तानगंज से जल भरकर, भक्त लगभग 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं. यह यात्रा झारखंड के देवघर में मशहूर ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर में जलाभिषेक के साथ खत्म होती है.
- यूपी में कांवड़िए प्रयागराज (संगम), वाराणसी (काशी) और अयोध्या (सरयू नदी) से पवित्र जल भरते हैं. इसके बाद श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, बाराबंकी में लोधेश्वर महादेव और स्थानीय शिव मंदिरों में जल चढ़ाते हैं.
- मध्य प्रदेश में भक्त नर्मदा नदी से जल भरते हैं. इसके बाद उज्जैन में महाकालेश्वर और श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में जल चढ़ाते हैं.

कौन था पहला कांवड़िया
कांवड़ यात्रा की शुरुआत की बात करें, तो पहला कांवड़िया भगवान परशुराम को माना जाता है. हालांकि अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण और श्रवण कुमार को भी दुनिया का पहला कांवड़िया कहा जाता है.
भगवान परशुराम की कथा (सबसे प्रमुख मान्यता)
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने अपने पिता के आदेश पर अपनी मां रेणुका का सिर काट दिया था. इस बड़े पाप का प्रायश्चित करने और मोक्ष पाने के लिए उन्होंने भगवान शिव की कड़ी तपस्या की. माना जाता है कि भगवान परशुराम उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर से एक कांवड़ में पवित्र गंगा जल लाए थे और बागपत के पास पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग पर जलाभिषेक किया था. तब से सावन के महीने में कांवड़ लाने और भगवान शिव को जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई.
लंका के राजा रावण की कहानी
जब समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला, तो भगवान शिव ने पूरे ब्रह्मांड को बचाने के लिए उसे पी लिया. विष पीने से उनका गला नीला पड़ गया, जिससे उनका नाम नीलकंठ पड़ गया. विष के असर से शिव का शरीर तेज गर्मी और दर्द से जलने लगा. अपने आराध्य की तकलीफ कम करने के लिए, भगवान शिव के परम भक्त रावण ने कांवड़ में गंगा जल भरा और पुरा महादेव मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए पैदल यात्रा की. गंगा जल के स्पर्श से महादेव के शरीर की जलन शांत हुई और इसलिए कई लोग रावण को पहला कांवड़िया मानते हैं.
श्रवण कुमार की कहानी
अन्य मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जाने के लिए पालकी जैसी कांवड़ बनाई थी. वह अपने माता-पिता को इस कांवड़ पर अपने कंधों पर बिठाकर हरिद्वार ले गए और उन्हें गंगा में नहलाया. इस घटना को कांवड़ यात्रा की शुरुआत माना जाता है.

कितने तरह की होती है कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा मुख्य रूप से तीन तरह की होती है
साधारण कांवड़: इसमें भक्त आराम-आराम से चलते हैं और गंगा जल भरकर अपने शिव मंदिर तक लाते हैं. जरूरत पड़ने पर वे यात्रा के दौरान रुककर आराम भी कर सकते हैं.
डाक कांवड़: इसे सबसे मुश्किल कांवड़ माना जाता है. इसमें कांवड़िए बिना रुके तेज गति से दौड़ते या चलते हैं और 24 घंटे के अंदर जल चढ़ाते हैं. इस दौरान कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है. अगर एक कांवड़िया थक जाता है तो भागते हुए दूसरा कांवड़िया उससे जल ले लेता है.
खड़ी कांवड़: इस तरह की कांवड़ को भी जमीन पर नहीं रखा जाता है. जब भक्त आराम करते हैं, तो दूसरे लोग कांवड़ को अपने कंधों पर ले जाते हैं या किसी स्टैंड पर लटका देते हैं.
भगवान शिव की पूजा के नियम
सुबह जल्दी उठें, नहाएं और साफ कपड़े पहनें. शिव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने बैठें, हाथ में जल लें और व्रत का संकल्प लें. सबसे पहले शिवलिंग पर जल चढ़ाएं, फिर दूध, दही, घी, शहद और चीनी (पंचामृत) से अभिषेक करें और आखिर में इसे फिर से शुद्ध गंगाजल या साफ पानी से अभिषेक करें. इसके बाद, शिवलिंग पर सफेद चंदन से त्रिपुंड बनाएं और अक्षत (बिना टूटे चावल के दाने), भस्म और इत्र चढ़ाएं. इसके बाद महादेव की पसंदीदा चीजें जैसे बेलपत्र, धतूरा और भांग चढ़ाएं. भगवान शिव के सामने धूप और दीया जलाएं. फल या मिठाई चढ़ाएं. अब शांत मन से बैठकर “ॐ नमः शिवाय” या “महामृत्युंजय मंत्र” का कम से कम 108 बार जाप करें. पूजा के बाद भगवान शिव की आरती करें और अनजाने में हुई किसी भी गलती के लिए क्षमा मांगें.
शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर और केतकी के फूल नहीं चढ़ाए जाते, इस बात का विशेष ध्यान रखें. अगर आप व्रत कर रहे हैं तो सात्विक खाना खाएं. व्रत के दौरान गुस्से, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहें.
सावन के सभी सोमवार
पहला सोमवार: इसे नए शुभ काम शुरू करने और भगवान शिव का आशीर्वाद पाने के लिए शुभ माना जाता है. इस साल सावन का पहला सोमवार 3 अगस्त को है.
दूसरा सोमवार: माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख, शांति और जीवन में सकारात्मकता आती है. सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को है.
तीसरा सोमवार: 17 अगस्त को नाग पंचमी का महापर्व भी है. इस दिन भगवान शिव के आभूषण नाग देवता की पूजा की जाती है.
चौथा सोमवार: यह सावन का अंतिम सोमवार है, जो 24 अगस्त को है. इस दिन जलाभिषेक के साथ कांवड़ यात्रा पूरी होती है.
सावन का महीना भगवान शिव के प्रति भक्ति, संयम और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है. इस पूरे महीने, भक्त शिव पूजा, मंत्र जाप, व्रत और कांवड़ यात्रा के जरिए अपनी आस्था दिखाते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद मांगते हैं.
सावन में क्यों नहीं खानी चाहिएं ये 10 चीज़ें? जानें आस्था, आयुर्वेद और सेहत से जुड़ी बड़ी वजह
