Red Fort: दिल्ली की गलियों में अगर इतिहास को महसूस करना हो तो लाल किले से बेहतर जगह शायद ही कोई हो. लाल बलुआ पत्थर की ऊंची दीवारें, विशाल दरवाजे, संगमरमर के महल, नक्काशीदार मेहराब और खूबसूरत बागीचे इसे सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि बीते दौर की ज़िंदा कहानी बना देते हैं. पुरानी दिल्ली के दिल में खड़ा लाल किला आज भी हर उस इंसान को अपनी तरफ खींचता है, जो भारत के इतिहास, वास्तुकला और संस्कृति को करीब से देखना चाहता है. दिल्ली का ये मशहूर किला यूनेस्को की विश्व धरोहर लिस्ट में भी शामिल है. कभी ये मुगल साम्राज्य की सत्ता का केंद्र था और आज ये स्वतंत्र भारत की पहचान का प्रतीक है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री इसी किले से देश को संबोधित करते हैं. यानी लाल किले ने सिर्फ बादशाहों का दौर नहीं देखा, बल्कि भारत के मॉर्डन इतिहास के कई अहम अध्यायों का भी साक्षी रहा है.

क्यों बनवाया था लाल किला?
लाल किले की कहानी मुगल बादशाह शाहजहां से जुड़ी है. शाहजहां ने 1639 में अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली ले जाने का फैसला किया. उन्होंने एक नई राजधानी बसाने की प्लानिंग बनाई, जिसे आज हम शाहजहानाबाद के नाम से जानते हैं. इसी नई राजधानी के बीच में एक बड़े रॉयल पैलेस के तौर पर लाल किले को बनवाना शुरू किया गया. ये किला सिर्फ रहने की जगह नहीं था. ये मुगल सत्ता, रॉयल लाइफस्टाइल और एडमिनिस्ट्रेशन का सेंटर था. करीब 200 सालों तक मुगल बादशाहों का घर रहने वाले इस महल में शाही दरबार लगते थे, बड़े फैसले लिए जाते थे और देश-विदेश से आने वाले मेहमानों का स्वागत होता था. वैसे, इस किले की पहचान इसकी लाल बलुआ पत्थर से बनी विशाल दीवारों से होती है. इसी वजह से इसे ‘लाल किला’ कहा गया. इसके साथ ऐतिहासिक सलीमगढ़ किला भी जुड़ा हुआ है, जो पूरे परिसर को और ज्यादा शानदार बनाता है.
मुगल वास्तुकला का शानदार नमूना
लाल किले की खूबसूरती को सिर्फ उसकी लाल दीवारों से नहीं समझा जा सकता. इसके अंदर पहुंचते ही वास्तुकला की एक अलग दुनिया दिखाई देती है. यहां इस्लामी वास्तुकला के साथ फारसी, तिमूरी और भारतीय परंपराओं का खूबसूरत कॉम्बिनेशन देखने को मिलता है. महल के अलग-अलग हिस्सों में संगमरमर की नक्काशी, मेहराब, खूबसूरत छतें और बारीक सजावट दिखाई देती है. कहा जाता है कि लाल किले के डिजाइन में फेमस वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी की भूमिका थी, जिन्हें ताजमहल की वास्तुकला से भी जोड़ा जाता है. किले के शाही हिस्सों में बहने वाली नहर-ए-बहिश्त, यानी ‘स्वर्ग की धारा’, इसकी खूबसूरती को और बढ़ाती थी. पानी की ये व्यवस्था अलग-अलग पर्सनल महलों और मंडपों को जोड़ती थी. मुगल शासकों के लिए पानी, बाग और महल सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि शाही खूबसूरती का हिस्सा थे.

लाहौरी गेट से गुज़रती असली कहानी
लाल किले की जर्नी आमतौर पर लाहौरी गेट से शुरू होती है. ये नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसका फेस लाहौर की दिशा की तरफ है. ये बड़ा सा एंट्री गेट आज भी किले की खूबसूरती को बयां करता है. गेट के अंदर जाते ही मीना बाजार या छत्ता चौक आता है. कभी ये शाही बाजार हुआ करता था, जहां राजपरिवार और दरबार से जुड़े लोग खरीदारी करते थे. आज भी यहां रंग-बिरंगे कपड़े, हस्तशिल्प, जूतियां, कढ़ाई वाले बैग, शॉल और कई तरह की ट्रेडिशनल चीज़ें देखने को मिलती हैं. यानी इतिहास देखने निकले हैं तो थोड़ी खरीदारी भी हो जाए. इसके आगे नौबत खाना आता है. पुराने टाइम में यहां नगाड़े और संगीत बजाकर शाही मेहमानों के आने की जानकारी दी जाती थी. आज इसकी ऊपरी मंजिल में इंडियन वॉर मेमोरियल म्यूजियम स्थित है.
दीवान-ए-आम से दीवान-ए-खास तक
लाल किले के सबसे खास हिस्सों में दीवान-ए-आम शामिल है. ये वो जगह थी जहां बादशाह आम लोगों और अधिकारियों से मुलाकात करते थे. यानी कभी यहां शाही दरबार लगता था और फरियादी अपनी बात बादशाह तक पहुंचाते थे. इसके बाद किले का रॉयल और प्राइवेट हिस्सा शुरू होता है. यहां मुमताज महल और रंग महल जैसे खूबसूरत पैलेस हैं. मुमताज महल का रिश्ता शाहजहां की पत्नी मुमताज महल से जोड़ा जाता है. आज यहां लाल किला पुरातत्व संग्रहालय भी मौजूद है. रंग महल शाही महिलाओं के लिए बनाया गया था. इसके आसपास की सजावट उस समय की रॉयल लाइफस्टाइल की झलक देती है. इसके सामने खास महल है, जो बादशाह का प्राइवेट स्पेस था. इसके बाद आता है दीवान-ए-खास, जहां बहुत खास और प्राइवेट चर्चाएं होती थीं. सफेद संगमरमर से बना ये मंडप लाल किले की सबसे खूबसूरत संरचनाओं में से एक है.

शाही हमाम से मोती मस्जिद तक
लाल किले में सिर्फ महल और दरबार ही नहीं थे. यहां रॉयल लोगों की रोज की जरूरतों के लिए भी कई सुविधाएं मौजूद थीं. हमाम यानी शाही स्नानागार उस समय की विलासिता और वास्तुकला का शानदार उदाहरण है. इसके अलावा किले में एक बावली भी है, जो प्राचीन जल प्रबंधन और भारतीय इंजीनियरिंग की याद दिलाती है. किले की मोती मस्जिद अपनी खूबसूरती के लिए खास पहचान रखती है. इसके अलावा हीरा महल भी परिसर की खूबसूरती बढ़ाता है. इतिहास और वास्तुकला में इंटरेस्ट रखने वालों के लिए शाह बुर्ज और हयात बख्श बाग भी बड़ा अट्रैक्शन हैं. हयात बख्श बाग के आसपास सावन और भादों मंडप औऱ जफर महल जैसे हिस्से अलग ही कहानी सुनाते हैं.
2.4 किलोमीटर लंबी दीवार
लाल किले की सबसे पहली और सबसे खास चीज इसकी विशाल सुरक्षा दीवारें हैं. किले के चारों तरफ करीब 2.4 किलोमीटर लंबी दीवार बनी हुई है. इसमें बुर्ज और निगरानी टावर बनाए गए थे. दिल्ली की तरफ वाली दीवारों के कुछ हिस्से करीब 108 फीट तक ऊंचे हैं. वहीं, नदी की तरफ की दीवारें लगभग 59 फीट ऊंची हैं. दिलचस्प बात ये है कि लाल किले की बनावट पूरी तरह से एक जैसी नहीं है. इसका आकार अष्टकोणीय है, यानी 8 कोनों वाला किला. इसका उत्तर-दक्षिण हिस्सा ज्यादा लंबा है. यानी मुगल वास्तुकारों ने सुंदरता के साथ-साथ सुरक्षा और भौगोलिक स्थिति का भी पूरा ध्यान रखा था. लाल किले से कई दिलचस्प किस्से और कहानियां भी जुड़ी हुई हैं. एक मान्यता के अनुसार किले का बाहरी हिस्सा कभी सफेद रंग में था. बाद में अंग्रेजों ने इसे लाल रंग में रंग दिया. इसके अलावा दिल्ली के दूसरी ऐतिहासिक जगहों से लाल किले को जोड़ने वाली गुप्त सुरंगों की कहानियां भी सुनने को मिलती हैं. हालांकि, ऐसी कई बातें कहानियों का हिस्सा हैं, लेकिन यही रहस्य लाल किले को और ज्यादा सस्पेंस से भर देते हैं.

सबसे बड़ी खासियत
लाल किले की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसने भारत के इतिहास के कई दौर अपनी आंखों के सामने देखे हैं. करीब दो शताब्दियों तक ये मुगल सत्ता का सेंटर रहा. मुगल साम्राज्य के उत्थान से लेकर उसके कमजोर पड़ने तक की कहानी इस किले से जुड़ी हुई है. बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान भी लाल किले मज़बूती से डटा रहा. आजादी के बाद इसका जलवा आज तक बरकरार है. हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं. इस तरह मुगल दौर का ये शाही किला आज के भारत के लोकतांत्रिक उत्सव का भी प्रतीक बन गया है.
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शाम को बदल जाता है अंदाज
अगर आप लाल किले को सिर्फ दिन में घूमकर लौट आए तो आपका एक्सपीरियंस थोड़ा अधूरा रह सकता है. यहां होने वाला ‘जय हिंद’ साउंड एंड लाइट शो इतिहास को रोशनी, संगीत और कहानी के जरिए ज़िंदा करता है. शाम के टाइम ये शो लाल किले के इतिहास और इसके अलग-अलग दौर को समझने का एक दिलचस्प ज़रिया है. इसके अलावा जनवरी के आसपास होने वाला भारत पर्व भी यहां का खास अट्रैक्शन है. इसमें देश के अलग-अलग राज्यों की संस्कृति, हस्तशिल्प, हथकरघा, पारंपरिक प्रस्तुतियां और खान-पान देखने को मिलता है. यानी लाल किला सिर्फ पत्थरों और दीवारों की बिल्डिंग नहीं, बल्कि भारत की अलग-अलग संस्कृतियों का मंच भी है.

लाल किला घूमने के बाद कहां जाएं?
अगर आप लाल किला देखने आए हैं तो आसपास की पुरानी दिल्ली को एक्सप्लोर करना बिल्कुल न भूलें. पास में ही जामा मस्जिद है, जो भारत की ऐतिहासिक मस्जिदों में गिनी जाती है. इसका बड़ा सा आंगन हजारों लोगों को एक साथ समेट सकता है. इसके बाद चांदनी चौक की गलियों में घूमना अपने आप में एक अलग एक्सपीरियंस है. यहां मसाले, कपड़े, घर का सामान और पुरानी दिल्ली का फेमस स्ट्रीट फूड कल्चर आपका इंतजार करता है. इतिहास देखने के बाद अगर कुछ टेस्टी खाने का मन हो जाए तो चांदनी चौक शानदार जगह है. वैसे भी, पुरानी दिल्ली की खासियत सिर्फ बाजार और इमारतें नहीं हैं. ये अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के कॉम्बिनेशन की भी खूबसूरत मिसाल है. यहां गुरुद्वारा सीस गंज साहिब, गौरी शंकर मंदिर, श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर, फतेहपुरी मस्जिद और सेंट्रल बैपटिस्ट चर्च जैसी धार्मिक और ऐतिहासिक जगह भी हैं. महात्मा गांधी की स्मृति से जुड़ा राजघाट भी दिल्ली की इस जर्नी को एक अलग फील दे सकता है.
इतिहास से मिलने का मौका
लाल किले को देखने का मतलब सिर्फ एक पुरानी इमारत देखना नहीं है. ये भारत के इतिहास के कई अध्यायों से आमने-सामने होने जैसा है. यहां शाहजहां के शाही सपनों की झलक मिलती है, मुगल वास्तुकला की बारीकी दिखाई देती है, पुराने बाजारों की रौनक महसूस होती है और आज़ाद भारत की लोकतांत्रिक परंपरा भी नजर आती है. लाल बलुआ पत्थर की दीवारों से लेकर संगमरमर के शाही महलों तक, हर हिस्सा अपने अंदर एक कहानी समेटे है. यही वजह है कि दिल्ली आने वाले किसी भी इंसान के लिए लाल किला सिर्फ एक टूरिस्ट स्पॉट नहीं, बल्कि भारत की विरासत से मुलाकात का एक शानदार मौका है.
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